उनियारा में प्रशासनिक मर्यादा पर गम्भीर सवाल :
शिवराज बारवाल मीना
टोंक। स्मार्ट हलचल|उनियारा उपखंड में एक गंभीर प्रशासनिक विवाद ने सरकारी कार्यसंस्कृति व कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनियारा उपखण्ड अधिकारी कार्यालय में पदस्थ एसडीएम पूजा मीणा पर तहसील कार्यालय उनियारा में कार्यरत एक प्रशासनिक अधिकारी के साथ कथित अभद्र व्यवहार का आरोप लगा है। मामला अब केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं रह गया, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और पद की गरिमा से जुड़ा मुद्दा बन गया है।
——– “क्या वरिष्ठ अधिकारी को खड़ा रहने के लिए कहना सेवा आचरण के अनुरूप है?” ——-
तहसील कार्यालय उनियारा में कार्यरत प्रशासनिक अधिकारी देवेंद्र कुमार राव (पूर्व कार्यवाहक तहसीलदार, अलीगढ़) ने आरोप लगाया है कि :
* उन्हें किसी फाइल चर्चा के लिए एसडीएम कार्यालय में बुलाया गया।
* प्रतीक्षा के दौरान आगंतुकों हेतु रखी कुर्सी पर बैठने पर आपत्ति जताई गई।
* कथित रूप से कहा गया कि “मैंने आपको बैठने के लिए नहीं कहा।”
* यहां तक कि कार्यालय से बाहर जाने तक की बात कही गई।
* प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि कोई अधिकारी विधिवत बुलावे पर पहुंचता है, तो क्या उसे बैठने के लिए मौखिक अनुमति की आवश्यकता है? क्या यह व्यवहार प्रशासनिक शिष्टाचार की परिभाषा में आता है?
——- 39 साल की सेवा बनाम 5 साल का प्रशासनिक अनुभव ——-
देवेन्द्र कुमार राव 39 वर्ष की राजकीय सेवा पूरी कर चुके वरिष्ठ अधिकारी हैं और जून 2026 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। हाल ही में उन्हें प्रशासनिक अधिकारी पद पर पदोन्नति मिली है। दूसरी ओर, एसडीएम पूजा मीणा को वर्ष 2021 में पहली नियुक्ति मिली थी। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अनुभव और पदानुक्रम की संवेदनशीलता को दरकिनार किया गया?
——- कर्मचारी महासंघ की खुली चेतावनी ——
घटना से आक्रोशित राजस्थान मंत्रालयिक कर्मचारी महासंघ के प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलेक्टर कल्पना अग्रवाल को ज्ञापन सौंपकर स्पष्ट कहा है कि :
* यह मामला केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि समूचे मंत्रालयिक वर्ग की गरिमा का है।
* यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो चरणबद्ध आंदोलन पर विचार किया जाएगा।
* प्रशासनिक आचरण नियमों के तहत जवाबदेही तय की जाए।
——— बड़ा सवाल : क्या उपखंड स्तर पर बन रही है भय की संस्कृति? ——–
सूत्रों के अनुसार, कर्मचारियों में यह चर्चा है कि उपखण्ड स्तर पर संवाद का वातावरण तनावपूर्ण हो रहा है। यदि एक प्रशासनिक अधिकारी स्वयं को अपमानित महसूस करें, तो इसका सीधा प्रभाव राजस्व कार्यों, फाईल निस्तारण और जनसुनवाई पर पड़ सकता है।
——- प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि : ——
* एक एसडीएम केवल पदाधिकारी नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति का नेतृत्वकर्ता होता है।
* अनुशासन और अहंकार के बीच की रेखा बहुत पतली होती है।
* यदि व्यवहार मर्यादित नहीं रहा, तो शासन की छवि प्रभावित होती है।
——– जांच होगी या लीपापोती? ———
* अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं।
* क्या स्वतंत्र जांच अधिकारी नियुक्त होगा?
* सीसीटीवी फुटेज और स्टाफ के बयान लिए जाएंगे?
* जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
* या मामला केवल औपचारिक स्पष्टीकरण तक सीमित रह जाएगा?
——– दोनों पक्षों की स्थिति ——–
प्रशासनिक अधिकारी देवेन्द्र कुमार राव का कहना है :
“मैं 2019 के एक रिसीवरी प्रकरण की फाईल चर्चा के लिए एसडीएम के बुलाने पर गया था। एक अधिकारी का कुर्सी पर बैठना कोई अपराध नहीं है। जिस प्रकार का व्यवहार हुआ, वह पद की गरिमा के अनुरूप नहीं था।”
——– एसडीएम पूजा मीणा का कहना है : ——–
“दुर्व्यवहार का आरोप पूरी तरह गलत है। जांच हो जाएगी तो सच्चाई सामने आ जाएगी।”
——– निष्कर्ष : प्रशासनिक गरिमा की परीक्षा ———
यह प्रकरण टोंक जिले में प्रशासनिक आचरण और जवाबदेही की कसौटी बन चुका है। यदि एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के साथ वास्तव में अगर एसडीएम द्वारा ऐसा दुर्व्यवहार हुआ है तो यह गंभीर प्रश्न है? और यदि आरोप निराधार हैं, तो भी सच्चाई स्पष्ट करना जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है। अब देखना यह है कि जिला कलेक्टर स्तर पर इस मामले में पारदर्शी जांच होती है या नहीं — क्योंकि प्रशासनिक पद केवल अधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी प्रतीक है।










