पर्यावरण एवं धर्मप्रेमी श्री शंभूलाल जी आमेटा : सेवा, संस्कार, समाज और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित प्रेरणादायी जीवन

पर्यावरण एवं धर्मप्रेमी श्री शंभूलाल जी आमेटा : सेवा, संस्कार, समाज और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित प्रेरणादायी जीवन

श्रीमती अनुसूया आमेटा

श्री शंभूलाल जी आमेटा का जीवन समाजसेवा, धार्मिक आस्था, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक संगठन और जनकल्याण के प्रति समर्पण की प्रेरणादायी यात्रा है। उन्होंने अपने दीर्घ सामाजिक जीवन में विभिन्न संस्थाओं से जुड़कर अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया और समाज, धर्म एवं प्रकृति के संरक्षण से जुड़े अनेक कार्यों में सक्रिय योगदान दिया।

संक्षिप्त जीवन परिचय

श्री शंभूलाल जी आमेटा का जन्म 20 नवंबर 1940 को ग्राम फलवा, तहसील निम्बाहेड़ा, जिला चित्तौड़गढ़ में पूज्य पिताश्री स्वर्गीय गौतमलाल जी आमेटा एवं माताश्री स्वर्गीय गमेरी बाई जी के घर हुआ।

उनके जीवन की प्रारंभिक शिक्षा चित्तौड़गढ़ स्थित आर्य गुरुकुल में हुई। गुरुकुल के अनुशासित एवं संस्कारमय वातावरण ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। शिक्षा के साथ उन्हें यज्ञ-हवन, व्यायाम, कुश्ती एवं तीरंदाजी जैसी गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिला। इसी दौरान अनुशासन, सेवा, संयम, सहिष्णुता, परिश्रम और समय के सदुपयोग जैसे जीवन-मूल्यों के संस्कार प्राप्त हुए।

इसके बाद उन्होंने चित्तौड़गढ़ एवं उदयपुर में शिक्षा प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन से ही खेलकूद, ए.सी.सी., श्रमदान तथा विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय रुचि रही। यही सक्रियता आगे चलकर उनके सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की आधारशिला बनी।

श्री आमेटा ने अपने दीर्घ सामाजिक जीवन में अनेक सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सेवा संस्थाओं से जुड़कर विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। बाणमाता विकास समिति, मूण्डला महादेव समिति, आमेटा ब्राह्मण समाज, राजस्थान ब्राह्मण महासभा, विप्र फाउंडेशन सहित विभिन्न संस्थाओं में उन्होंने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री, कोषाध्यक्ष, प्रवक्ता एवं अन्य महत्वपूर्ण दायित्वों पर रहकर सेवा की।

उनके जीवन का मूल मंत्र सदैव ईमानदारी, परिश्रम, सेवा, सहयोग और मानव कल्याण रहा है।

जीवन का लक्ष्य

श्री शंभूलाल जी आमेटा ने मानव सेवा को ही ईश्वर सेवा मानते हुए समाज, राष्ट्र, संस्कृति एवं पर्यावरण के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन किया।

उनकी सोच रही है कि समाज में आपसी प्रेम, भाईचारा, सद्भाव, संस्कार और सहयोग की भावना मजबूत हो। जरूरतमंद व्यक्ति को समय पर सहायता मिले, धार्मिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण हो तथा युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक जिम्मेदारियों से जुड़े।

उनका मानना रहा है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक सफलता उसके पद अथवा प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसके जीवन और प्रयासों से कितने लोगों को लाभ मिला तथा समाज और प्रकृति के लिए उसने कितना सकारात्मक योगदान दिया।

समाज एवं धर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान

श्री शंभूलाल जी आमेटा का सामाजिक एवं धार्मिक जीवन विभिन्न सेवा कार्यों से जुड़ा रहा है। बाणमाता मंदिर क्षेत्र में पानी, बिजली, सीढ़ियों तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं के विकास के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण प्रयास किए।

मूण्डला महादेव मंदिर के अधूरे निर्माण कार्य को पूर्ण करवाने तथा 12 मई 1984 को मूर्ति प्रतिष्ठा एवं रुद्र यज्ञ महोत्सव के आयोजन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने यात्रियों के लिए भोजन, पानी, विश्राम तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था में सहयोग किया। नदी एवं बावड़ियों की स्वच्छता, श्रमदान, धार्मिक आयोजन, सामाजिक जागरूकता एवं समाज सुधार जैसे कार्यों में भी वे सक्रिय रहे।

धार्मिक स्थलों के विकास को जनसहयोग से जोड़ना और सेवा कार्यों को सामूहिक सहभागिता के माध्यम से आगे बढ़ाना उनके सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताओं में रहा।

समाज की विरासत को संजोने का महत्वपूर्ण प्रयास — “समाज दर्पण”

श्री शंभूलाल जी आमेटा के जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में “समाज दर्पण” पुस्तक का स्वयं लेखन एवं प्रकाशन विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

उन्होंने आमेटा ब्राह्मण समाज के इतिहास, तेरह गोत्रों, पूर्वजों तथा देश-विदेश में निवास करने वाले समाजजनों की जानकारी को एकत्रित कर उसे व्यवस्थित रूप में पुस्तक का स्वरूप दिया।

“समाज दर्पण” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि आमेटा ब्राह्मण समाज के इतिहास, पहचान और सामाजिक विरासत को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण प्रयास है। इस पुस्तक के माध्यम से समाज की पिछली पीढ़ियों की जानकारी को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का कार्य हुआ है।

इतिहास और समाज की जानकारी को संकलित कर उसे स्थायी दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करना श्री शंभूलाल जी आमेटा की दूरदर्शिता और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

वरिष्ठ नागरिकों के बीच सकारात्मक विचार, सामाजिक सहभागिता एवं अनुभवों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की दिशा में भी उन्होंने कार्य किया।

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान

श्री शंभूलाल जी आमेटा के व्यक्तित्व का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष उनका प्रकृति और पर्यावरण के प्रति गहरा समर्पण है।

जोगणिया माता में नक्षत्र वाटिका एवं नवग्रह वाटिका

जोगणिया माता क्षेत्र में नक्षत्र वाटिका एवं नवग्रह वाटिका का निर्माण उनके पर्यावरण प्रेम और दूरदर्शी सोच का शानदार उदाहरण है।

धार्मिक आस्था को प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने वाली यह पहल अपने आप में विशिष्ट है। इन वाटिकाओं ने जोगणिया माता क्षेत्र की सुंदरता बढ़ाने के साथ लोगों को प्रकृति से जुड़ने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने का कार्य किया है।

यह कार्य श्री शंभूलाल जी आमेटा की पर्यावरण के प्रति सोच और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित एवं स्वच्छ वातावरण तैयार करने की भावना को दर्शाता है।

मेनाल से जोगणिया माता मार्ग पर पौधारोपण

मेनाल से जोगणिया माता मार्ग के दोनों ओर पौधारोपण का कार्य भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल रही है।

सड़क के दोनों ओर लगाए गए पौधे आने वाले वर्षों में विकसित होकर क्षेत्र में हरित पट्टी का स्वरूप ले सकते हैं। इससे क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता बढ़ने के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

जोगणिया माता से बेगूं मार्ग पर सघन वृक्षारोपण

जोगणिया माता से बेगूं मार्ग के दोनों ओर दो कतारों में सघन वृक्षारोपण को बढ़ावा देने का प्रयास भी उनके प्रकृति प्रेम का प्रमाण है।

यह प्रयास केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय विरासत साबित हो सकता है। समय के साथ विकसित होने वाले ये वृक्ष इस क्षेत्र को अधिक हरित, सुंदर और पर्यावरण की दृष्टि से समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

प्रकृति के प्रति उनका यह दृष्टिकोण इस विचार को मजबूत करता है कि धार्मिक स्थलों का विकास केवल भवनों और सुविधाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके आसपास के प्राकृतिक वातावरण को संरक्षित एवं समृद्ध करना भी समाज की जिम्मेदारी है।

ऐसा कौन-सा कार्य है, जिसके लिए समाज उन्हें लंबे समय तक याद करेगा?

श्री शंभूलाल जी आमेटा के जीवन में अनेक ऐसे कार्य हैं, जिन्हें समाज लंबे समय तक स्मरण करेगा।

इनमें सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में “समाज दर्पण” का स्वयं लेखन एवं प्रकाशन शामिल है। समाज के इतिहास, तेरह गोत्रों, पूर्वजों तथा देश-विदेश में निवास करने वाले समाजजनों की जानकारी को एकत्रित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना समाज की ऐतिहासिक एवं सामाजिक विरासत को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण कार्य है।

इसके साथ ही जोगणिया माता में नक्षत्र वाटिका एवं नवग्रह वाटिका का निर्माण उनके जीवन के विशिष्ट कार्यों में शामिल है। यह कार्य धार्मिक आस्था, प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है।

बाणमाता एवं मूण्डला महादेव जैसे धार्मिक स्थलों के विकास में जनसहयोग को जोड़ना, मंदिरों एवं तीर्थस्थलों पर आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करवाने में सहयोग करना, सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों को व्यवस्थित करना तथा स्वच्छता एवं जल संरक्षण के कार्यों में योगदान देना भी उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल हैं।

मेनाल से जोगणिया माता तथा जोगणिया माता से बेगूं मार्ग पर वृक्षारोपण एवं हरित क्षेत्र विकसित करने के प्रयास पर्यावरण के लिए उनका महत्वपूर्ण योगदान हैं। आने वाले वर्षों में जब ये वृक्ष बड़े होकर क्षेत्र को हराभरा बनाएंगे, तब यह कार्य उनके पर्यावरण प्रेम की स्थायी पहचान बनेगा।

उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि उन्होंने पद और प्रतिष्ठा को लक्ष्य न बनाकर सेवा को प्राथमिकता दी।

उनके कार्यों से समाज में आया प्रभाव एवं परिवर्तन

श्री शंभूलाल जी आमेटा के प्रयासों से अनेक धार्मिक एवं सामाजिक स्थलों पर पानी, बिजली, सड़क, सीढ़ियां, स्वच्छता तथा यात्रियों के लिए आवश्यक सुविधाओं के विकास को गति मिली।

उनके कार्यों ने जनसहयोग के माध्यम से सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों को आगे बढ़ाने की भावना को मजबूत किया। विभिन्न संस्थाओं से जुड़े रहकर उन्होंने अलग-अलग वर्गों के लोगों को एक साथ लाने तथा सामूहिक रूप से समाजहित के कार्य करने में योगदान दिया।

नदी एवं बावड़ी स्वच्छता अभियानों तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यों के माध्यम से जल एवं प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया।

“समाज दर्पण” के माध्यम से समाज के इतिहास, परंपराओं और सामाजिक पहचान को सुरक्षित रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान हुआ।

इन सभी प्रयासों का व्यापक प्रभाव यह रहा कि समाज में सेवा, सहयोग, संगठन, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूती मिली।

प्रेरणा का स्रोत

श्री शंभूलाल जी आमेटा के सामाजिक जीवन की नींव बचपन में ही पड़ गई थी। आर्य गुरुकुल की शिक्षा और संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को सेवा, अनुशासन, संयम, परिश्रम, सहिष्णुता एवं मानव कल्याण की भावना से जोड़ा।

उनके माता-पिता के संस्कार, संतों एवं गुरुओं का सानिध्य तथा समाज के वरिष्ठजनों का मार्गदर्शन उनके जीवन के प्रमुख प्रेरणास्रोत रहे।

किसी व्यक्ति, धार्मिक स्थल अथवा सामाजिक व्यवस्था को किसी समस्या से जूझते देखकर वे अपनी क्षमता के अनुसार समाधान में सहयोग करने का प्रयास करते रहे। उनका विश्वास रहा कि यदि किसी कार्य से समाज, धर्म, प्रकृति या किसी जरूरतमंद व्यक्ति का भला हो सकता है तो उसमें अपनी भूमिका निभाने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

“लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।”

भविष्य की योजनाएं एवं संकल्प

श्री शंभूलाल जी आमेटा का प्रयास जीवन के आगामी समय में भी समाज, राष्ट्र, संस्कृति एवं पर्यावरण की सेवा में निरंतर योगदान देने का रहा है।

  1. युवा पीढ़ी को संस्कार, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारियों से जोड़ना।
  2. जल, पर्यावरण, नदियों, बावड़ियों एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए जनजागरण करना।
  3. धार्मिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और विकास में सहयोग करना।
  4. समाज के इतिहास, संस्कृति एवं परंपराओं को पुस्तकों एवं दस्तावेजों के माध्यम से सुरक्षित रखना।
  5. वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव एवं ज्ञान का समाजहित में उपयोग करने के लिए सामाजिक मंचों को मजबूत करना।
  6. जरूरतमंदों, यात्रियों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा कार्यों को बढ़ावा देना।
  7. जनसहयोग से ऐसे कार्यों को आगे बढ़ाना, जिनका लाभ वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को भी मिले।
  8. वृक्षारोपण एवं पर्यावरण संरक्षण के कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाकर क्षेत्र को अधिक हरित एवं सुंदर बनाने में योगदान देना।

जीवन-दर्शन

श्री शंभूलाल जी आमेटा का जीवन इस विचार का उदाहरण है कि व्यक्ति की पहचान उसके पद और प्रतिष्ठा से अधिक उसके कर्मों से बनती है।

उनका विश्वास है कि मनुष्य संसार से धन-संपत्ति साथ लेकर नहीं जाता। उसके अच्छे कर्म, समाज के लिए किए गए कार्य और लोगों के जीवन में लाई गई सकारात्मकता ही उसकी वास्तविक विरासत होती है।

उनकी जीवन-यात्रा का सार इन शब्दों में कहा जा सकता है—

“जीवन मिला है तो ऐसे कार्य करें कि हमारे जाने के बाद भी हमारे अच्छे कर्म समाज के लिए प्रेरणा बने रहें।”

श्री शंभूलाल जी आमेटा के जीवन का एक महत्वपूर्ण संदेश है—

“पद और प्रतिष्ठा स्थायी नहीं होते, लेकिन सेवा और अच्छे कर्मों की स्मृति लंबे समय तक जीवित रहती है।”

समाजसेवा, धार्मिक आस्था, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक संगठन और जनसहयोग के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान को देखते हुए उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए सेवा और समर्पण की प्रेरणादायी मिसाल है।


— लेखिका
श्रीमती अनुसूया आमेटा