गोरा बादल स्टेडियम का ‘सर्वांगीण विकास’ कहीं यातायात का सर्वनाश न बन जाए।
चित्तौड़गढ़।स्मार्ट हलचल| जिले के ऐतिहासिक गोरा बादल स्टेडियम के सर्वांगीण विकास को लेकर जिला प्रशासन और हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड के बीच एमओयू तो बड़े उत्साह से साइन कर लिया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या कागज़ों पर चमकता यह ‘आधुनिक स्टेडियम’ ज़मीनी हकीकत में चित्तौड़गढ़ शहर के लिए भविष्य की सबसे बड़ी यातायात चुनौती बन जाएगा?
जिस गोरा बादल स्टेडियम को राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए विकसित करने की बात कही जा रही है, उसके आसपास की भौगोलिक और तकनीकी परिस्थितियों पर यदि नज़र डाली जाए तो यह ‘विकास’ कम और ‘व्यवधान’ अधिक नज़र आता है।
एमओयू साइन, लेकिन डीपीआर की आत्मा गायब?
खेल विशेषज्ञों और शहरी नियोजन से जुड़े जानकारों का कहना है कि किसी भी राज्य या राष्ट्रीय स्तर के क्रिकेट स्टेडियम के लिए डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) सबसे अहम दस्तावेज होती है। इसी डीपीआर में यह तय होता है कि—
स्टेडियम तक पहुँचने वाली सड़कों की न्यूनतम चौड़ाई कितनी हो
दर्शकों के लिए कितनी पार्किंग अनिवार्य है
खिलाड़ियों, वीआईपी, मीडिया और आम दर्शकों के लिए अलग-अलग आवाजाही कैसे होगी
आपात स्थिति में निकासी (इमरजेंसी एग्ज़िट) की क्या व्यवस्था होगी
भारतीय मानकों के अनुसार, 20–25 हजार दर्शकों की क्षमता वाले स्टेडियम के लिए कम से कम 30 से 45 मीटर चौड़ी पहुँच सड़कें, सैकड़ों चारपहिया और हजारों दुपहिया वाहनों की पार्किंग, तथा खुला बफर एरिया अनिवार्य माना जाता है।
गोरा बादल स्टेडियम: जगह कम, सपने बड़े
विडंबना यह है कि जिस स्थान पर गोरा बादल स्टेडियम स्थित है, वहां पहले से ही—संकरी सड़कें, घनी आबादी, सीमित पार्किंग और रोज़ाना का भारी यातायात मौजूद है। ऐसे में यदि यहां राज्य या राष्ट्रीय स्तर का मुकाबला हुआ तो सवाल यह है कि दर्शक अपने वाहन कहां खड़े करेंगे?
क्या मैच के दिन पूरा चित्तौड़गढ़ जाम में तब्दील हो जाएगा?
सीएसआर फंड, लेकिन शहर की कीमत पर?
हिन्दुस्तान जिंक द्वारा सीएसआर मद से स्टेडियम का विकास निस्संदेह एक सराहनीय पहल है, लेकिन क्या सीएसआर फंड का उपयोग ऐसे स्थान पर करना उचित है, जहां तकनीकी मानकों की अनदेखी भविष्य में शहरवासियों के लिए परेशानी का सबब बन जाए?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्टेडियम के लिए पर्याप्त भूमि, चौड़ी सड़कें और नियोजित पार्किंग नहीं है, तो यह परियोजना आने वाले वर्षों में विकास का प्रतीक नहीं बल्कि प्रशासनिक अदूरदर्शिता का उदाहरण बन सकती है।
हंसी का पात्र न बन जाए ‘आधुनिक स्टेडियम’
शहरवासियों के बीच यह चर्चा आम हो चली है कि कहीं ऐसा न हो कि करोड़ों रुपये के सीएसआर फंड से बना स्टेडियम तो खड़ा हो जाए, लेकिन-मैच के दिन दर्शक पैदल चलने को मजबूर हों, एम्बुलेंस ट्रैफिक में फंसी रहे और पूरा शहर ‘मैच देखो या जाम झेलो’ की स्थिति में आ जाए यदि ऐसा हुआ तो यह स्टेडियम खेल प्रतिभाओं से अधिक सोशल मीडिया मीम्स और व्यंग्य लेखों का विषय बन सकता है।
अब भी वक्त है- जानकारों का मानना है कि अभी भी समय है कि जिला प्रशासन और हिन्दुस्तान जिंक- स्थान की पुनर्समीक्षा करें। भारतीय खेल अवसंरचना मानकों के अनुसार डीपीआर को सार्वजनिक करें। सड़क चौड़ीकरण, पार्किंग और ट्रैफिक प्लान को प्राथमिकता दें ताकि गोरा बादल स्टेडियम वास्तव में चित्तौड़गढ़ की पहचान बने, न कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी ट्रैफिक जाम की विरासत।

