(विवेक रंजन श्रीवास्तव)
स्मार्ट हलचल|लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव हैं, लेकिन उसकी विश्वसनीयता केवल मतदान प्रतिशत से नहीं, चुनाव की निष्पक्षता से तय होती है। मतदाता की उँगली पर लगी स्याही लोकतंत्र का प्रमाणपत्र तभी है, जब उसके विवेक पर किसी प्रलोभन, भय, दबाव या दुष्प्रचार की छाया न हो।
चुनाव की निष्पक्षता का आकलन केवल मतदान केंद्रों की व्यवस्था, सुरक्षा बलों की तैनाती और मतगणना की पारदर्शिता से नहीं किया जा सकता। असली प्रश्न यह है कि क्या सभी प्रत्याशियों को समान अवसर मिले? क्या धनबल और बाहुबल की भूमिका सीमित रही? क्या सरकारी संसाधनों का उपयोग सत्तारूढ़ दल के लाभ के लिए नहीं हुआ? क्या मीडिया ने सभी पक्षों को समुचित स्थान दिया? क्या मतदाता तक पहुँचने वाली सूचनाएँ तथ्यपरक थीं, अथवा सोशल मीडिया के शोर में सत्य कहीं दब गया?
आज एआई और चुनावी तकनीक ने प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाया है, लेकिन तकनीक अपने आप में निष्पक्षता की गारंटी नहीं है। एल्गोरिदम मतदाताओं को प्रभावित करने वाला टूल बन चुका है, यह कई विदेशी चुनावों में सिद्ध हो रहा है। पारदर्शिता, स्वतंत्र जाँच और जनविश्वास के बिना कोई भी व्यवस्था संदेह से परे नहीं हो सकती। इसी प्रकार, हारने वाले प्रत्येक दल का आरोप प्रमाण नहीं होता, किंतु प्रत्येक गंभीर शिकायत की निष्पक्ष जाँच आवश्यक है। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अविश्वास नहीं, जवाबदेही की माँग है।
निष्पक्ष चुनाव का अर्थ केवल यह नहीं कि मतदाता अपना वोट डाल सके, बल्कि यह भी कि वह बिना भय और भ्रम के अपना निर्णय ले सके। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, प्रशासन की तटस्थता, राजनीतिक दलों का अनुशासन और नागरिकों की जागरूकता इस निष्पक्षता के चार आधार हैं।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि चुनाव हुए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या चुनाव में जनमत को निर्भय होकर अभिव्यक्त होने का पूरा अवसर मिला? लोकतंत्र में सत्ता का बहुमत से मिलना आवश्यक है, पर उस बहुमत की विश्वसनीयता निष्पक्ष प्रक्रिया से ही आती है। चुनाव की असली जीत किसी दल की विजय नहीं, जनता के विश्वास की रक्षा है।