बारिश में अधजली रह जाती हैं चिताएं, श्मशान तक पहुंचने का रास्ता भी नहीं
700 मतदाताओं वाले गांव में सड़क, शेड और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव
रिपोर्टर सुरज वर्मा
स्मार्ट हलचल।शाहपुरा तहसील की डाबला चांदा ग्राम पंचायत के मालखेड़ा गांव में आज भी ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति गांव के श्मशान घाट की है, जहां मृतकों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार करना भी ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
ग्रामीणों के अनुसार गांव से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित श्मशान घाट तक जाने के लिए कोई पक्का रास्ता नहीं है। अतिक्रमण के कारण मार्ग बेहद संकरा हो चुका है और बरसात के दिनों में कीचड़ व जलभराव के चलते पूरी तरह दुर्गम बन जाता है। कई स्थानों पर एक-एक फीट तक कीचड़ भर जाने से शवयात्रा निकालना भी मुश्किल हो जाता है।
बारिश में अधूरी रह जाती हैं अंतिम क्रियाएं
श्मशान घाट पर टीन शेड या किसी स्थायी छायादार व्यवस्था का अभाव है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दौरान कई बार अंतिम संस्कार के समय बारिश शुरू हो जाती है, जिससे चिताएं पूरी तरह नहीं जल पातीं और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इससे मृतक के परिजनों की भावनाएं गहरे स्तर पर आहत होती हैं।
खेतों के बीच से निकलती है अंतिम यात्रा
श्मशान तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को खेतों के बीच बने संकरे रास्तों से गुजरना पड़ता है। फसल खड़ी होने पर स्थिति और गंभीर हो जाती है। ट्रैक्टर या अन्य वाहन ले जाना लगभग असंभव हो जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि पहले यह क्षेत्र चारागाह भूमि था, लेकिन अतिक्रमण कर खेत बना दिए गए, जिससे रास्ता भी प्रभावित हो गया है।
बबूल के कांटे और दुर्गम मार्ग बने मुसीबत
रास्ते में जगह-जगह बबूल के कांटे और झाड़ियां फैली हुई हैं। ऐसे में अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे भी भारी परेशानी झेलने को मजबूर हैं।
पेयजल संकट भी बना बड़ी समस्या
ग्रामीणों ने बताया कि चंबल जल परियोजना की पाइपलाइन होने के बावजूद नियमित जलापूर्ति नहीं हो रही है। कभी चार दिन तो कभी एक सप्ताह बाद पानी मिलता है। मजबूरी में लोगों को लगभग तीन किलोमीटर दूर रेहड़ गांव से अपने साधनों से पानी लाना पड़ता है।
कई बार शिकायत, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई
ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान घाट तक पक्का रास्ता, अतिक्रमण हटाने, शेड निर्माण और पेयजल समस्या के समाधान के लिए कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन दिए जा चुके हैं, लेकिन वर्षों बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
