सुरेन्द्र सिंह चान्देसरा
स्मार्ट हलचल|राजस्थान में नशे के कारोबार को लेकर जो भ्रम लंबे समय से पाला जा रहा था ऑपरेशन ‘विष्णुगढ़’ ने उसे बेरहमी से तोड़ दिया है। समाज में खुद को एक सम्मानित व्यापारी के रूप में पेश करने वाला रमेश जो धोरीमन्ना में ग्रेनाइट मार्बल का कारोबारी बताया जाता था दरअसल MD ज़हर के अंतरराज्यीय नेटवर्क का अहम किरदार निकला।ग्रेनाइट और मार्बल की दुकानों की चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा छिपा था जिसकी जड़ें कोलकाता हावड़ा पुणे और महाराष्ट्र तक फैली हुई थीं। रमेश ने व्यापार धर्म रिश्तेदारी और सामाजिक प्रतिष्ठा हर चीज़ को ढाल बनाकर नशे का साम्राज्य खड़ा किया।
जांच में सामने आया कि रमेश के रिश्तेदार पश्चिम बंगाल के हावड़ा और कोलकाता में स्टील की दुकानों की आड़ में रहते थे। इन्हीं दुकानों के बहाने उसका लगातार कोलकाता आना-जाना था। वहीं से केमिकल्स की सप्लाई ट्रैवल एजेंटों का नेटवर्क और फर्जी पहचान तैयार की गई। हावड़ा में जावेद ब्रदर्स नाम की दुकान से जुड़ा सुराग इस पूरे नेटवर्क का टर्निंग पॉइंट बना।
टीम ने कामगार बनकर हावड़ा में डेरा डाला किराये पर दुकान ली, स्थानीय युवकों से दोस्ती की और गंगासागर तक रमेश की हर मूवमेंट को ट्रैक किया। धार्मिक यात्रा सिर्फ आस्था नहीं थी वह गिरफ्तारी से बचने का सबसे सुरक्षित कवर थी।
रमेश खुद को कभी केमिस्ट्री का जानकार कभी केमिकल ट्रेडर और कभी बड़ा व्यापारी बताता रहा। अपार्टमेंट में लोग उसे इज़्ज़त देते रहे, बच्चे उससे “मार्गदर्शन” लेते रहे और उसी घर से नशे का नेटवर्क ऑपरेट होता रहा। उसकी लंबी टीम की इस पूरे खेल में सहयोगी भूमिका में सामने आईं।
राजस्थान के जोधपुर, बाड़मेर और सिरोही में पकड़ी गई MD फैक्ट्रियों का सीधा लिंक रमेश से जुड़ा मिला। महाराष्ट्र से सीखा गया सस्ता MD फॉर्मूला ब्रोमीन कास्टिक सोडा, हाइड्रोक्लोरिक एसिड, टॉल्यून और एथिल अल्कोहल 5 से 7 दिन में तैयार माल। एक किलो पर करीब एक लाख की लागत और बाज़ार में ₹30 लाख की कीमत। मुनाफ़ा करोड़ों में नुकसान पूरे समाज का।
वाहन चोरी से शुरू हुआ रमेश का आपराधिक सफर ड्रग्स, हथियार, मारपीट और संगठित अपराध तक पहुंच गया। महज़ 31 साल की उम्र में उसके खिलाफ राजस्थान गुजरात महाराष्ट्र तेलंगाना और कर्नाटक में दर्जनों मुकदमे दर्ज हैं। राजस्थान में ही 15 से अधिक केस। टॉप 10 फरार अपराधी बनने के बाद वह लगातार राज्य बदलता रहा।
गिरफ्तारी से बचने के लिए रमेश ने 12 ज्योतिर्लिंगों और 4 धामों की यात्रा की। पकड़े जाने से ठीक एक दिन पहले वह जगन्नाथपुरी से लौटकर गंगासागर जाने की तैयारी में था लेकिन एजेंसियों ने उसका पूरा नक्शा पढ़ लिया था। आईजी विकास कुमार के अनुसार
फाइनेंसिंग के लिए महाराष्ट्र से बड़े निवेशक, सप्लाई के लिए गुजरात महाराष्ट्र रूट ट्रकों में छिपा माल और राजस्थान में फैक्ट्रियां यह सब किसी छोटे अपराधी का खेल नहीं था। यह पूरी तरह संगठित योजनाबद्ध और संरक्षित अपराध था।
ग्रेनाइट मार्बल व्यापारी की नक़ाब में बैठा रमेश सिर्फ़ पुलिस को नहीं समाज को भी धोखा दे रहा था।
ऑपरेशन विष्णुगढ़ ने यह साफ कर दिया है कि नशे का यह कारोबार गलियों का अपराध नहीं बल्कि सूट बूट दुकान और धर्म की आड़ में पलता हुआ एक खतरनाक साम्राज्य है।













