एजाज़ अहमद उस्मानी 
स्मार्ट हलचल|मेड़ता रोड स्थित संविधान स्तंभ की स्थापना 29 नवंबर 1949 को मेड़ता रोड के बस स्टैंड स्थित मेला मैदान में की गई थी। यह संविधान स्तंभ मेड़ता रोड की आन बान और शान का प्रतीक बना।यह वही ऐतिहासिक कालखंड था जब भारत का संविधान अपने अंतिम स्वरूप में ढल रहा था और देश स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक सशक्त, समावेशी एवं लोकतांत्रिक राष्ट्र के निर्माण की दिशा में अग्रसर था। उस समय देशभर में संविधान को लेकर जन-जन में उत्साह, जागरूकता और राष्ट्रनिर्माण की भावना प्रबल थी।
इस संविधान स्तंभ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों को भारतीय संविधान के महत्व से अवगत कराना तथा लोकतंत्र, समानता, न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे संविधान के मूल मूल्यों को स्थायी रूप से स्मरण कराना था। यह स्तंभ केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि उस युग की जनचेतना और राष्ट्र के प्रति नागरिक दायित्व का प्रतीक था। यह आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने के लिए स्थापित किया गया था कि संविधान ही देश की आत्मा है और लोकतंत्र की मजबूती उसकी रक्षा में निहित है।
दुर्भाग्यवश, समय के साथ इस ऐतिहासिक संविधान स्तंभ की उपेक्षा होती चली गई। मेड़ता रोड की जनता द्वारा इसके चारों ओर अस्थायी केबिन और अतिक्रमण खड़े कर दिए गए, जिससे यह स्तंभ धीरे-धीरे लोगों की नजरों से ओझल हो गया। इतना ही नहीं, इसके आसपास स्थानीय लोगों द्वारा कूड़ा-कचरा डालकर इस स्थान को कूड़ाघर के रूप में उपयोग किया जाने लगा, जिससे इस ऐतिहासिक धरोहर की गरिमा को गंभीर क्षति पहुँची। एक ऐसा स्मारक, जो संविधान और लोकतंत्र के सम्मान का प्रतीक था, उपेक्षा और अव्यवस्था का शिकार बन गया।
हालाँकि, हाल के समय में मेड़ता रोड नगर पालिका अधिकारी अधिशासी हरेंद्र चौधरी द्वारा जिम्मेदारी का परिचय देते हुए इस क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई है। इससे संविधान स्तंभ को राहत मिली है और वह पुनः दिखाई देने लगा है। यह कदम न केवल प्रशासनिक दृष्टि से सराहनीय है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास भी है।
अब आवश्यकता इस बात की है कि इस संविधान स्तंभ का सौंदर्यीकरण किया जाए, इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाने वाली सूचना पट्टिकाएँ लगाई जाएँ और आसपास स्वच्छता एवं संरक्षण की उचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। साथ ही, स्थानीय नागरिकों में इसके प्रति जागरूकता पैदा करना भी आवश्यक है, ताकि यह धरोहर भविष्य में फिर कभी उपेक्षा का शिकार न बने।
संविधान स्तंभ केवल पत्थर या संरचना नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों का जीवंत प्रतीक है। इसका संरक्षण करना हम सभी का नैतिक और संवैधानिक दायित्व है।













