कोटा हादसे के बाद राजस्थान अलर्ट: शहरी निर्माण सुरक्षा और अवैध इमारतों पर राज्यव्यापी कार्रवाई की माँग
स्मार्ट हलचल| कोटा में हाल ही में हुई तीन मंज़िला इमारत दुर्घटना ने एक बार फिर शहरी भारत में निर्माण सुरक्षा, अवैध निर्माण और प्रशासनिक लापरवाही की गंभीर सच्चाई को उजागर कर दिया है। इस हादसे से व्यथित होकर भारत सरकार के अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS), मुंबई से अर्बन व रीजनल प्लानिंग में प्रशिक्षित एलुमनाई और पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट डॉ. नयन प्रकाश गांधी ने राजस्थान सरकार को एक विस्तृत पॉलिसी ड्राफ्ट पत्र प्रेषित किया है। यह पत्र सीधे माननीय मुख्यमंत्री को संबोधित है और इसमें कोटा हादसे को राज्यव्यापी शहरी नीति सुधार का आधार बनाने की माँग की गई है।
डॉ. गांधी ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि कोटा हादसा कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि वर्षों से चल रही अवैध निर्माण प्रवृत्ति, कमजोर निरीक्षण तंत्र और जवाबदेही की कमी का परिणाम है। हादसे में हुई जनहानि ने यह सिद्ध कर दिया है कि नगर निगम स्तर पर निर्माण अनुमति, गुणवत्ता नियंत्रण और नियमित निरीक्षण व्यवस्था में गंभीर चूक हुई है। उन्होंने नगर निगम कोटा के उन अधिकारियों पर प्रशासनिक और विधिक कार्रवाई की माँग की है, जिनकी भूमिका इस इमारत की अनुमति और निगरानी से जुड़ी थी।
पत्र में विशेष रूप से यह आग्रह किया गया है कि कोटा शहर में जहाँ-जहाँ नगर निगम की अनुमति के बिना अवैध निर्माण हुआ है, अथवा बिना तकनीकी स्वीकृति के तीन-चार मंज़िला इमारतें खड़ी की गई हैं, उनका तत्काल संरचनात्मक और गुणवत्ता ऑडिट कराया जाए। साथ ही, ऐसे निर्माणों पर कड़ी पेनल्टी लगाकर भविष्य के लिए एक सख़्त नज़ीर पेश की जाए।
डॉ. गांधी ने कोटा को एक छात्र-प्रधान शहर बताते हुए कहा है कि राजीव गांधी नगर, महावीर नगर, विज्ञान नगर, तलवंडी, कुन्हाड़ी और जवाहर नगर जैसे इलाकों में हज़ारों छात्र मुख्य सड़कों और चौराहों के आसपास बहुमंज़िला हॉस्टलों और पीजी में रहते हैं। ऐसे क्षेत्रों में भवन सुरक्षा केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं हो सकती। यहाँ स्थित इमारतों को हाई-रिस्क कैटेगरी में चिन्हित कर नियमित और अनिवार्य निरीक्षण आवश्यक है।अपने पॉलिसी नोट में उन्होंने कई ठोस सुझाव दिए हैं, जिनमें तीन मंज़िल या उससे अधिक सभी भवनों के लिए तृतीय-पक्ष तकनीकी जाँच, छात्र आवासों के लिए अलग स्टूडेंट हाउसिंग सेफ्टी कोड, डिजिटल बिल्डिंग रजिस्टर और निरीक्षण ट्रैकिंग सिस्टम की स्थापना शामिल है। उन्होंने यह भी ज़ोर दिया कि लापरवाही की स्थिति में केवल भवन मालिक या ठेकेदार ही नहीं, बल्कि अभियंता और संबंधित अधिकारी की संयुक्त जवाबदेही तय की जाए।
डॉ. गांधी का कहना है कि दुर्भाग्यवश शहरी निकायों की सक्रियता अक्सर हादसे के बाद ही दिखाई देती है, जबकि नीति का उद्देश्य दुर्घटना-पूर्व रोकथाम होना चाहिए। कोटा की घटना को केवल स्थानीय स्तर तक सीमित न रखते हुए, मुख्यमंत्री स्तर से राज्यव्यापी विशेष निरीक्षण अभियान चलाया जाना चाहिए, ताकि राजस्थान के सभी शहरी क्षेत्रों में मुख्य मार्गों, सार्वजनिक स्थलों और छात्र आवास इलाकों में स्थित भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
उन्होंने अपने पत्र के अंत में कहा कि शहरी विकास का अर्थ केवल तेज़ और ऊँचा निर्माण नहीं होता। यदि विकास सुरक्षित नहीं है, तो वह भविष्य के लिए बोझ बन जाता है। कोटा का हादसा राजस्थान की शहरी नीति को पुनर्परिभाषित करने का अवसर है, जहाँ सुरक्षा, गुणवत्ता और जवाबदेही को विकास के केंद्र में रखा जाए। उनका मानना है कि यदि आज सख़्त और त्वरित नीतिगत निर्णय लिए गए, तो यह त्रासदी आने वाले समय में नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक निर्णायक मोड़ बन सकती है।

