शिक्षा संकट की राजनीति या राजनीति का शिक्षा संकट? छह दशक बाद शिक्षा व्यवस्था पर कांग्रेस का आत्मस्वीकार?

दखल…..

स्मार्ट हलचल।भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर राहुल गांधी के तीखे प्रहार ने एक नई बहस को जन्म दिया है। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जिस व्यवस्था की नींव नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक की कांग्रेस सरकारों ने रखी, उसकी कमियां राहुल गांधी को 2026 में ही क्यों दिखाई दीं?भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियां वास्तविक हैं, लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न राजनीतिक ईमानदारी का है। जिस व्यवस्था को कांग्रेस ने दशकों तक राष्ट्र निर्माण का आधार बताया, आज उसी को राहुल गांधी ‘रिजेक्शन सिस्टम’ कह रहे हैं। आखिर यह परिवर्तन व्यवस्था में आया है या दृष्टिकोण में?

राहुल पारीक

स्मार्ट हलचल।कोटा में आयोजित छात्र संवाद कार्यक्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को “रिजेक्शन सिस्टम” और “एक्सटॉर्शन मशीन” की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि भारतीय एजुकेशन सिस्टम बच्चों को कुचल रहा है, केवल पैसा वसूल रहा है और युवाओं के सपनों को तोड़ रहा है। यह बयान राजनीतिक दृष्टि से भले आकर्षक प्रतीत हो, किंतु इसके साथ कई गंभीर प्रश्न भी खड़े होते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि भारतीय शिक्षा व्यवस्था इतनी ही दोषपूर्ण, शोषणकारी और विफल थी, तो राहुल गांधी और उनकी पार्टी को इसका अहसास होने में छह दशक से अधिक का समय क्यों लगा?
राहुल गांधी जिस शिक्षा व्यवस्था को आज कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, उसका बड़ा हिस्सा उन्हीं सरकारों के कालखंड में विकसित हुआ, जिनका नेतृत्व कांग्रेस ने किया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस ने लगभग 55 वर्षों तक केंद्र की सत्ता संभाली। यदि आज की शिक्षा व्यवस्था केवल “रिजेक्शन सिस्टम” है, तो क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं है कि कांग्रेस स्वयं अपने द्वारा निर्मित व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा रही है?

नेहरू से मनमोहन तक: कांग्रेस का शिक्षा मॉडल
स्वतंत्रता के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था का पुनर्निर्माण पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) और वैज्ञानिक शिक्षा की मजबूत आधारशिला इसी काल में रखी गई। उस समय कांग्रेस ने इसे आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया था।
1968 में इंदिरा गांधी सरकार ने देश की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की। 1986 में राजीव गांधी सरकार ने दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रस्तुत की, जिसमें शिक्षा के विस्तार, तकनीकी आधुनिकीकरण और ग्रामीण प्रतिभाओं को अवसर देने के लिए नवोदय विद्यालय जैसी योजनाओं को शामिल किया गया। 1992 में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने उसी नीति में व्यापक संशोधन किए। 2009 में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून लागू कर शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया।
आज यदि राहुल गांधी कह रहे हैं कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था बच्चों को कुचल रही है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या वे नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की शिक्षा नीतियों को भी विफल मानते हैं?

तब सब ठीक था, आज सब गलत कैसे हो गया?
राहुल गांधी लगभग दो दशकों से सक्रिय राजनीति में हैं। वे सांसद है, कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे, पार्टी अध्यक्ष रहे और देश के प्रमुख विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित हुए। इस दौरान देश में अनेक भर्ती परीक्षाएं हुईं, पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं, बेरोजगारी पर बहस हुई, शिक्षा सुधारों की मांग उठी, लेकिन तब राहुल गांधी ने शायद ही कभी शिक्षा व्यवस्था को “एक्सटॉर्शन मशीन” कहा हो। जब उत्तरदायित्व निर्धारण की बात आती है, तो सबसे प्रत्यक्ष और प्रामाणिक उदाहरण राजस्थान का सामने आता है, जहां स्वयं कांग्रेस की सरकार रही। अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के पांच वर्षीय कार्यकाल (2018–2023) में राज्य में कुल उन्नीस परीक्षाओं के पर्चे लीक होने की घटनाएं दर्ज हुईं। फिर ऐसा क्या हुआ कि वर्ष 2026 में अचानक उन्हें पूरी व्यवस्था ही दोषपूर्ण दिखाई देने लगी?
क्या यह वास्तविक चिंता है या राजनीतिक अवसर? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोटा में दिया गया उनका भाषण समस्याओं के वर्णन से भरा हुआ था, लेकिन समाधान का स्पष्ट खाका उसमें कहीं दिखाई नहीं दिया।इसके विपरीत, केंद्र की मोदी सरकार ने एक कठोर एंटी-पेपर लीक कानून अधिनियमित कर इस अनियंत्रित अव्यवस्था पर विधिक नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया।केंद्र सरकार ने NEET पेपर लीक के मामले में मुद्दे को छिपाने या बचाव की मुद्रा में जाने के बजाय तुरंत कार्रवाई की — परीक्षा रद्द की और दोषियों को पकड़ने के लिए सख्त कदम उठाए।

उपलब्धियों को क्यों भुला दिया गया?
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में अनेक कमियां हैं। पेपर लीक, परीक्षा अनियमितता, कौशल और रोजगार के बीच का अंतर, मानसिक दबाव और प्रतियोगी परीक्षाओं का तनाव वास्तविक समस्याएं हैं। लेकिन क्या यही पूरी तस्वीर है?
इसी शिक्षा व्यवस्था ने भारत को विश्वस्तरीय वैज्ञानिक दिए। इसी व्यवस्था ने डॉक्टर, इंजीनियर, न्यायाधीश, प्रशासक, प्रोफेसर, उद्यमी और शोधकर्ता तैयार किए। आज दुनिया की अग्रणी तकनीकी कंपनियों का नेतृत्व भारतीय मूल के पेशेवर कर रहे हैं। भारतीय डॉक्टर विश्वभर में प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान से लेकर डिजिटल अर्थव्यवस्था तक भारत की उपलब्धियां इसी शिक्षा व्यवस्था से निकली प्रतिभाओं के बल पर संभव हुई हैं।
यदि व्यवस्था केवल “रिजेक्शन सिस्टम” होती, तो क्या भारत आज विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर खड़ा होता? क्या भारतीय युवा वैश्विक मंचों पर अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे होते?
व्यवस्था की कमियों पर चर्चा आवश्यक है, लेकिन उसकी उपलब्धियों को पूरी तरह नकार देना वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता।

केवल शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार है?
राहुल गांधी ने कहा कि एक हजार विद्यार्थियों में से 12 विद्यार्थियों को सरकारी नौकरी मिलती है। लेकिन क्या इसका कारण केवल शिक्षा व्यवस्था है?
भारत में सरकारी पदों की संख्या सीमित है, जबकि प्रतियोगियों की संख्या करोड़ों में है। इसके अतिरिक्त जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक ढांचा, रोजगार सृजन, निजी क्षेत्र की भूमिका, तकनीकी परिवर्तन और आरक्षण व्यवस्था जैसे अनेक कारक भी चयन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।
शिक्षा-व्यवस्था की समालोचना करते समय एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू सदैव अनछुआ रह जाता है — आरक्षण-व्यवस्था की भूमिका। प्रत्येक वर्ष लाखों विद्यार्थी नीट जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं, परंतु सीमित सीटों में से कितनी सीटें वास्तविक मेरिट के आधार पर भरी जाती हैं, इस संवेदनशील प्रश्न पर खुला और निर्भीक विमर्श कदाचित ही होता है।
यदि लाखों उम्मीदवारों में कुछ हजार का चयन होता है, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक संरचना का विषय है। आश्चर्यजनक रूप से राहुल गांधी ने इन जटिल प्रश्नों पर कोई गंभीर विमर्श प्रस्तुत नहीं किया। केवल “सिस्टम बर्बाद है” कहकर पल्ला झाड़ लेना, समस्या की संपूर्ण और संतुलित तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता।

 

छात्र हित या राजनीतिक समय-चयन?
इस पूरे कार्यक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू उसका समय था। नीट परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण अवसर से कुछ ही दिन पूर्व कोटा में इस प्रकार का राजनीतिक संवाद आयोजित करना अनेक अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए चिंता का विषय बना।
प्रश्न यह है कि यदि उद्देश्य वास्तव में छात्र हित था, तो यह संवाद परीक्षा के बाद क्यों नहीं आयोजित किया गया? क्या परीक्षा से ठीक पहले विद्यार्थियों के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास, आशंका और तनाव बढ़ाने वाली बातें करना उचित था?कोटा को ही केंद्र क्यों बनाया गया, जबकि कोटा का नाम प्रत्यक्षतः पर्चा-लीक प्रकरण से नहीं जुड़ा?क्या यह जनसंपर्क कार्यक्रम 21 जून की परीक्षा संपन्न होने के पश्चात आयोजित नहीं किया जा सकता था?
कोटा में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थी वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा कक्ष तक पहुंचते हैं। ऐसे समय में उन्हें प्रेरणा, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। लेकिन राहुल गांधी का पूरा संवाद अधिकतर निराशा, असंतोष और अविश्वास के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई दिया।

युवाओं को प्रश्न नहीं, समाधान चाहिए
युवाओं को यह बताना आसान है कि व्यवस्था गलत है। कठिन कार्य यह बताना है कि सही व्यवस्था कैसी होगी।
यदि वर्तमान शिक्षा मॉडल विफल है, तो उसका विकल्प क्या है? यदि परीक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है, तो नई प्रणाली क्या होगी? यदि कोचिंग संस्कृति समस्या है, तो उसका समाधान क्या है? यदि शिक्षा रोजगार नहीं दे रही, तो रोजगार सृजन का मॉडल क्या होगा?
कोटा के मंच से राहुल गांधी ने अनेक प्रश्न उठाए, लेकिन उन प्रश्नों के उत्तर देने वाला कोई ठोस रोडमैप प्रस्तुत नहीं किया।

प्रश्न राहुल गांधी से भी…
भारतीय शिक्षा व्यवस्था आलोचना से परे नहीं है। सुधार की आवश्यकता आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। लेकिन किसी व्यवस्था का मूल्यांकन केवल उसकी कमियों के आधार पर नहीं किया जाता। उसकी उपलब्धियों, योगदान और ऐतिहासिक विकास को भी समान महत्व देना होता है।
राहुल गांधी को शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठाने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में यह उनका दायित्व भी है। किंतु उतना ही आवश्यक यह भी है कि वे यह स्पष्ट करें कि जिन सरकारों ने दशकों तक इस व्यवस्था को आकार दिया, उनकी भूमिका पर उनका क्या दृष्टिकोण है।
आज देश के युवाओं के मन में सबसे बड़ा प्रश्न यही है—यदि शिक्षा व्यवस्था इतनी ही खराब थी, तो राहुल गांधी की नींद इतनी देर से क्यों खुली? और यदि अब खुली है, तो क्या वे केवल असंतोष का विमर्श देंगे या सुधार का कोई ठोस, व्यावहारिक और विश्वसनीय रोडमैप भी प्रस्तुत करेंगे? युवाओं को भय नहीं, भविष्य चाहिए। उन्हें निराशा नहीं, दिशा चाहिए। और राजनीति का वास्तविक दायित्व भी यही है।