मुकेश्या नंद महाराज ………………….
एक बेबाक राजनीतिक व्यंग्य # 10 — आकाश शर्मा
स्मार्ट हलचल|चित्तौड़गढ़, रावतभाटा, बेंगू, निम्बाहेड़ा, आकोला, बड़ीसादड़ी और कपासन नगर निकायों के इस रोमांचक चुनावी समर में मतदान संपन्न होने के बाद से ही शहर की फिजाओं में सिर्फ एक ही चर्चा गूंज रही है आखिरकार कल सुबह जब स्ट्रॉन्ग रूम के ताले खुलेंगे और मतपेटियां बाहर आएंगी, तो सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा ? मुकेश्यानंद महाराज की उस प्रतीकात्मक वाणी के छोर को थामें, आइए इस राजनीतिक पटल के और अधिक गहरे और धारदार फलक पर उतरते हैं ।
सियासी धुंध और बाबाजी की भविष्यवाणी
बाबाजी “वत्स… पूछ रहे हो कि किस पार्टी का उदय होगा और किस पर ग्रहण लगेगा ? तो सुनो, राजनीति का यह फलक कोई खुली किताब नहीं, बल्कि वह रहस्य है जो ईवीएम और मतपेटियों की उन बंद परतों में सांस ले रहा है, जो कल सुबह ठीक आठ बजे किसी जिन्न की तरह बाहर आएंगी और पूरे राजनीतिक आकाश में तबाही या सुकून का बवंडर खड़ा कर देंगी।” शहर की इन गलियों चाहे वह चित्तौड़गढ़ के ऐतिहासिक किले की छांव तले बसा शहरी क्षेत्र हो, रावतभाटा की औद्योगिक और कंक्रीट से घिरी बसाहट, बेंगू और निम्बाहेड़ा की राजनीतिक सरगर्मी से सुलगती सड़कें, या फिर आकोला, बड़ीसादड़ी और कपासन की चौपालें हर जगह बस एक ही कयास का दौर जारी है।
इस बार के पूरे राजस्थान निकाय चुनावों पर गौर करें तो कांग्रेस पार्टी ने तमाम अनुमानों को धता बताते हुए जैसी अप्रत्याशित बढ़त और आक्रामक तेवर दिखाए हैं, उसने सुस्त पड़े कार्यकर्ताओं में एक नया करंट दौड़ दिया है। ज़मीनी स्तर पर पार्टी ने खुद को जिस आक्रामकता के साथ पटल पर खड़ा किया है, उसने मुकाबले को एकतरफा होने से बचा लिया है।
दूसरी ओर, चित्तौड़गढ़ ज़िले में भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव महज़ एक स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि साख का वह संग्राम है जिसे हर कीमत पर बरकरार रखने के लिए सत्ता और संगठन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी का हर एक रणनीतिकार इस बात को अच्छे से समझता है कि ज़िले के इन सातों निकायों में वर्चस्व बनाए रखना आगामी संदेशों के लिए कितना अनिवार्य है।
विकास की गाथा या जोड़-तोड़ की राजनीति ?
कल सुबह आठ बजे के बाद जब परिणाम सामने आएंगे, तो दो ही रास्ते स्पष्ट होंगे या तो जनता ने किसी एक दल के पक्ष में स्पष्ट जनादेश देकर विकास की नई गाथा लिखने का मार्ग प्रशस्त किया होगा। या फिर त्रिशंकु या मिली-जुली स्थिति के चलते शहर की राजनीति एक बार फिर रिसॉर्ट पॉलिटिक्स, बाड़ेबंदी और जोड़-तोड़ के उस अंधेरे गलियारे में प्रवेश कर जाएगी, जहां सिद्धांतों की बलि चढ़ती है और केवल सौदेबाजी की गूंज सुनाई देती है।
बाबाजी की वह चेतावनी आज हर समझदार मतदाता के मन में कौंध रही है “शहर वासियों ने सही को चुना, तो विकास के नए आयाम रचे जाएंगे, नहीं तो…”
परिणाम बस कुछ घंटों की दूरी पर हैं। तब तक के लिए हर राजनीतिक दल के खेमे की सांसें थमी हुई हैं, और शहर की हवा में बस एक ही अनसुलझा प्रश्न तैर रहा है किसका भाग्य चमकेगा, और किस पर सियासी ग्रहण लगेगा ?