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टिकिट वितरण में हो पारदर्शिता, टिकट कोई पारिवारिक सम्पत्ति नही जो विरासत में दी जाये

महेंद्र नागोरी

भीलवाड़ा / नगर परिषद सहित राजस्थान के 90 नगरीय निकायों के चुनाव के लिए दोनों प्रमुख दलों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में टिकट वितरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।दोनों पार्टियों के प्रभारी विभिन्न इलाकों में जाकर बैठक ले रहे हैं महज केवल यह कहने को हैं। प्रत्याशी की ग्राउंड रिपोर्ट महज अपने दफ्तरों में ही बैठकर ली जा रही हैं। राजनीतिक दल इस बात का दावा कर रहे हैं कि ईमानदार,स्थानीय एवं पार्टी के प्रति वफादार कार्यकर्ताओं को ही टिकट जाएगा। लेकिन जमीन से जुड़ा कार्यकर्ता इस बात को मानता और जानता है कि यह सब कहने और सुनने की बातें हैं। हकीकत में टिकट वितरण में भाई भतीजावाद, लेनदेन, बड़े नेताओं की चाटुकारिता जैसे मुद्दे ज्यादा प्रभावी होते हैं। क्या नीचे लिखे कुछ बिंदुओं पर कोई पार्टी टिकट वितरण की नीति बना सकती है। अगर नहीं तो फिर उन्हें इस बात का ढोल नहीं पीटना चाहिए कि वह पार्षद के रूप में जनता के बीच जनसेवक उतारना चाहती है। किसी भी ऐसे दावेदार को टिकट नहीं दिया जाए, जो दो या इससे ज्यादा बार पार्षद रह चुका है। आखिर दूसरे कार्यकर्ताओं को मौका क्यों नहीं मिलना चाहिए? किसी भी दावेदार को उसका वार्ड बदलकर दूसरे वार्ड से टिकट नही दिया जाए।
आखिर वार्ड के जो कार्यकर्ता 5 साल तक टिकट पाने की आस में वहां काम करते हैं,उसकी उपेक्षा क्यों हो? किसी भी नेता या पूर्व पार्षद की पत्नी,बेटी को इसलिए टिकट नहीं दिया जाए, क्योंकि उसका वार्ड महिला के लिए आरक्षित हो गया है । आखिर क्यों ऐसे नेताओं को दोहरा लाभ मिले कि जब वार्ड आरक्षित ना हो तो खुद टिकट हथिया लें और आरक्षित हो जाए तो अपने परिवार की किसी महिला को मैदान में उतार दें और अगर वह जीत जाए तो नगर परिषद या निगम में उसकी जगह खुद नेतागिरी करते फिरें। सालों से ये नजारा लोग देख रहे हैं, कभी इस पर भी तो रोक लगाने की पार्टियां हिम्मत दिखाएं।
किसी भी सामान्य वार्ड से आरक्षित वर्ग के व्यक्ति को टिकट नहीं दिया जाए। आखिर ऐसा करके क्यों दोनों प्रमुख कांग्रेस और भाजपा,सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों का हक मारते हैं। जिस वर्ग के लिए जो वार्ड आरक्षित है वहां से उसी वर्ग का उम्मीदवार क्यों न उतारा जाए। ऐसे किसी परिवार से, जिसमें कोई भी एक बार पार्षद रह लिया, उस परिवार से किसी को टिकट नहीं दिया जाए। आखिर चुनाव का टिकट है, कोई पारिवारिक संपत्ति नहीं जो विरासत में मिल जाएं। जो भी नेता टिकट वितरण प्रक्रिया में शामिल हो उनके किसी भी निकट रिश्तेदार को मैदान में ना उतारा जाए।आखिर जिन्हें उम्मीदवारों का चयन करना है, वह क्यों दूसरों को अपनों के ऊपर वरीयता देंगे। ऐसे दावेदारों को टिकट नहीं दिया जाए, जो पार्टी के खिलाफ बयानबाजी करते रहते हैं या दल बदल कर टिकट पाने के लिए इधर-उधर हो जाते हैं।आखिर जो अपनी पार्टी का सगा नहीं हुआ,वह मतदाता का सगा कैसे होगा। यूं राजनीति में ईमानदार होना दुर्लभ होता जा रहा है, लेकिन फिर भी उन लोगों को टिकट से दूर रखना जाए, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं या जो घोटालों में शामिल रहे हैं। आखिर क्यों ऐसे लोगों को मौका देकर पार्टियां भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का रूप देती है।

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