कुंड गेट और राजमहल के गेट पर उगी वनस्पति, रियासतकालीन धरोहरों के संरक्षण में लापरवाहीय पार्षद ने भी उठाया मुद्दा, जीव दया सेवा समिति ने की कार्रवाई की मांग
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|शाहपुरा की रियासतकालीन विरासत आज बदहाली के दौर से गुजर रही है। कभी शहर की सुरक्षा और शान के प्रतीक रहे परकोटे के गेट अब अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुंड गेट और राजमहल के गेट की जर्जर स्थिति, दीवारों पर उगी वनस्पति और रखरखाव के अभाव ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात यह हैं कि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो शाहपुरा के गौरवशाली अतीत के ये साक्ष्य अपना मूल स्वरूप खो सकते हैं।
पांच गेटों से घिरा था रियासतकालीन शहर
शाहपुरा की बसावट रियासतकालीन इतिहास से जुड़ी है। उस समय शहर की सुरक्षा के लिए चारों ओर परकोटा बनवाया गया था। आक्रमणकारियों और अनधिकृत प्रवेश को रोकने के उद्देश्य से इसमें पांच प्रमुख गेट बनाए गए थे। समय के साथ उचित देखभाल नहीं होने से अधिकांश गेट अपना अस्तित्व खो चुके हैं। वर्तमान में कुंड गेट, जिसे स्थानीय भाषा में नेहरों का गेट भी कहा जाता है, और कालिंजरी गेट जैसे प्रवेश द्वार ही इस ऐतिहासिक व्यवस्था की पहचान के रूप में बचे हैं।
गेट की छत पर पेड़-पौधे, संरचना को खतरा
शहर के प्रमुख आकर्षण कुंड गेट के ऊपर पेड़-पौधे, जंगली वनस्पति और खरपतवार उग आए हैं। इनकी जड़ें दीवारों और छत को नुकसान पहुंचा सकती हैं। समय पर सफाई और मरम्मत नहीं होने से संरचना कमजोर होने की आशंका है। गेट पर शाहपुरा स्टेट का राजचिह्न भी अंकित है, जिसमें दो शेरों के बीच राजचिह्न बना हुआ है। यह रियासतकालीन इतिहास की महत्वपूर्ण निशानी है, लेकिन इसकी मौजूदा स्थिति संरक्षण के प्रति उदासीनता को उजागर करती है।
ऊपर स्काउट-गाइड कार्यालय, नीचे दुकानें
कुंड गेट के ऊपरी हिस्से में स्काउट-गाइड संघ का कार्यालय है, जबकि नीचे दुकानें संचालित होती हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दुकानों का किराया संघ की ओर से वसूला जाता है, लेकिन परिसर के रखरखाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। संघ में मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी भी प्रभारी हैं। ऐसे में नियमित निरीक्षण और संरक्षण की व्यवस्था को लेकर जवाबदेही स्पष्ट करने की जरूरत है। नगर पालिका के एक निर्वाचित पार्षद ने भी अधिशासी अधिकारी को लिखित में इस समस्या से अवगत कराया है।
जीव दया सेवा समिति ने उठाई आवाज
जीव दया सेवा समिति के संयोजक अतू खां कायमखानी ने ऐतिहासिक गेटों की स्थिति पर चिंता जताते हुए नगर पालिका से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि ये गेट केवल पुराने निर्माण नहीं, बल्कि शाहपुरा की ऐतिहासिक पहचान हैं। राजमहल का गेट भी जर्जर अवस्था में है। समिति ने वनस्पति हटाने, विशेषज्ञों की देखरेख में मरम्मत कराने और संरक्षण की स्थायी व्यवस्था करने की मांग की है।
अब नगर पालिका और संबंधित विभागों को संयुक्त निरीक्षण कराकर जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। ऐतिहासिक निर्माणों की तकनीकी जांच, सुरक्षित सफाई और समयबद्ध मरम्मत जरूरी है। सवाल यह है कि प्रशासन इन धरोहरों को बचाने के लिए कब जागेगा? विरासत एक बार नष्ट हो गई तो उसे दोबारा उसी रूप में लौटाना संभव नहीं होगा।