उकरूंद में फूटा जनाक्रोश: ग्रामीणों के विरोध के आगे झुका पीडब्ल्यूडी, 24 घंटे में ही उखाड़नी पड़ी 50 लाख की सीसी सड़क

घटिया निर्माण का आरोप, ठेकेदार-एईएन की मिलीभगत पर उठे सवाल, तीन साल पुरानी स्वीकृति के बाद भी नहीं मिली गुणवत्तापूर्ण सड़क

नीरज मीणा

मंडावर।स्मार्ट हलचल /दौसा जिले के मंडावर उपखंड क्षेत्र के ग्राम उकरूंद में 50 लाख रुपये की लागत से बन रही सीसी सड़क अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई है। कारण यह है कि जिस सड़क को ग्रामीणों के वर्षों के इंतजार के बाद बनाया जा रहा था, उसे निर्माण के महज एक दिन बाद ही विभाग को जेसीबी लगाकर हटाना पड़ गया। ग्रामीणों के तीखे विरोध, धरने जैसे हालात और लगातार उठ रहे सवालों के बाद विभाग को पीछे हटना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम ने पीडब्ल्यूडी विभाग की कार्यप्रणाली, निर्माण गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
गांव उकरूंद में प्रजापत ढाणी से कमल मीणा के मकान तक बनने वाली सीसी सड़क की स्वीकृति करीब तीन वर्ष पहले जारी हुई थी। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि सड़क बनने से वर्षों पुरानी आवागमन की समस्या दूर होगी, लेकिन जब निर्माण कार्य शुरू हुआ तो ग्रामीणों ने मौके पर पहुंचकर निर्माण सामग्री और कार्य की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए।
ग्रामीणों ने कहा— सड़क नहीं, भ्रष्टाचार की नींव डाली जा रही थी
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य में उपयोग की जा रही सीमेंट गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतर रही थी। कंक्रीट मिश्रण में सीमेंट के जमे हुए डेले साफ दिखाई दे रहे थे। लोगों का दावा है कि पुरानी और एक्सपायरी सीमेंट का उपयोग किया जा रहा था तथा सीमेंट की मात्रा भी कम रखी गई थी।
इसके अलावा सड़क निर्माण में प्रयुक्त बजरी को भी घटिया गुणवत्ता का बताया गया। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सड़क के बीच-बीच में लगाए जाने वाले पाइप तक नहीं डाले जा रहे थे। ऐसे में लोगों को आशंका थी कि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद सड़क कुछ ही समय में टूट-फूट का शिकार हो जाएगी।
मौके पर नहीं था कोई जिम्मेदार अधिकारी
ग्रामीणों का कहना है कि जब निर्माण कार्य चल रहा था तब मौके पर विभाग का कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं था। पूरा काम ठेकेदार के कर्मचारियों के भरोसे चल रहा था। जब ग्रामीणों ने पीडब्ल्यूडी के एईएन चंद्रप्रकाश को मौके पर बुलाने की मांग की तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
यही वह क्षण था जब ग्रामीणों का आक्रोश फूट पड़ा। बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर जमा हो गए और निर्माण कार्य को रुकवा दिया। लोगों ने ठेकेदार और विभागीय अधिकारियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की तथा उच्चाधिकारियों को शिकायत भेजकर तत्काल जांच की मांग की।
ग्रामीणों की एकजुटता के आगे झुकना पड़ा विभाग को
शनिवार को शुरू हुआ विवाद रविवार तक इतना बढ़ गया कि विभाग को खुद ही निर्माणाधीन सड़क को हटाने का निर्णय लेना पड़ा। जेसीबी मशीनों की मदद से एक दिन पहले बनाई गई सड़क को तोड़ा गया। यह दृश्य देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर मौजूद रहे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सड़क निर्माण पूरी तरह मानकों के अनुरूप हुआ होता तो विभाग को इतनी बड़ी कार्रवाई करने की जरूरत नहीं पड़ती। सड़क का हटाया जाना अपने आप में इस बात का संकेत माना जा रहा है कि निर्माण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए थे।
तीन साल की देरी, फिर भी गुणवत्ता पर समझौता!
ग्रामीणों में सबसे ज्यादा नाराजगी इस बात को लेकर है कि जिस सड़क की स्वीकृति तीन वर्ष पहले मिल चुकी थी और जिसका निर्माण जनवरी 2024 तक पूरा हो जाना चाहिए था, वह अब तक अधूरी है। वर्षों तक इंतजार करने के बाद जब काम शुरू हुआ तो उसमें भी गुणवत्ता को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नहीं होने के कारण बरसात के दिनों में लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार मरीजों, विद्यार्थियों और किसानों को भी आवागमन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।
अवकाश के दिन निर्माण शुरू होने से बढ़े संदेह
पूरे मामले का एक और पहलू लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि आखिर सड़क निर्माण का कार्य शनिवार और रविवार जैसे अवकाश के दिनों में ही क्यों शुरू किया गया? लोगों का मानना है कि छुट्टियों के दौरान निगरानी कम रहने का फायदा उठाकर निर्माण कार्य में मनमानी करने की कोशिश की गई।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि स्थानीय लोग सजग नहीं होते तो घटिया निर्माण का यह मामला सामने ही नहीं आता और करोड़ों नहीं तो लाखों रुपये की सरकारी राशि व्यर्थ चली जाती।
दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो होगा बड़ा आंदोलन
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं की गई तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। ग्रामीणों ने ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने, संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने तथा सड़क का पुनः गुणवत्तापूर्ण निर्माण करवाने की मांग की है।
क्षेत्र में बना चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा
उकरूंद की यह सड़क अब केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि सरकारी कार्यों में गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही का बड़ा सवाल बन गई है। एक दिन में बनी सड़क का अगले ही दिन उखाड़ा जाना पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग इसे ग्रामीण जागरूकता की जीत और प्रशासनिक निगरानी की बड़ी विफलता के रूप में देख रहे हैं।
अब क्षेत्रवासियों की नजर इस बात पर टिकी है कि विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है, जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और जनता के पैसों से बनने वाली सड़क आखिर कब गुणवत्ता के साथ तैयार होकर लोगों को राहत दे पाएगी।