सार्वजनिक जांच-पड़ताल से क्यों डरता है आरएसएस?

(आलेख : सवेरा, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)

स्मार्ट हलचल।13 जून को कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को एक पत्र भेजा था। इसमें उन्होंने उनसे आरएसएस की ‘कानूनी हैसियत, पंजीयन, पदाधिकारियों, फंडिंग, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक गतिविधियों के लिए मिली मंज़ूरी’ के बारे में जानकारी मांगी थी। इस पर दो अजीब प्रतिक्रियाएं सामने आईं। एक प्रतिक्रिया खुद भागवत की थी। उन्होंने कहा कि उन्हें इस पत्र का जवाब देने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि “हिंदू धर्म पंजीकृत नहीं है। कई चीज़ें पंजीकृत नहीं होतीं,” और सरकार जानती है कि संघ का अस्तित्व है। उन्होंने यह कहकर ध्यान भटकाने की कोशिश की कि पंजीयन की ज़रूरत सिर्फ़ उन संस्थाओं को होती है, जो सरकार से फंड लेना चाहती हैं। भागवत के दिमाग में आरएसएस और हिंदू समाज एक ही हैं और वे अपने संगठन को हिंदुओं का एकमात्र प्रतिनिधि मानते हैं। लेकिन इसका संगठन के आय-व्यय, कानूनी हैसियत या कामकाज के तरीके को सार्वजनिक करने से क्या लेना-देना है?

इस पर हम बाद में विस्तार से बात करेंगे, लेकिन आईए एक और अजीब प्रतिक्रिया पर नज़र डालें, जो कर्नाटक के बीजापुर से सात बार भाजपा सांसद रहे रमेश चंदाप्पा जिगाजिनागी की तरफ़ से आई। एक कार्यक्रम में पत्रकारों ने उनसे खड़गे के पत्र के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, “एक दलित व्यक्ति को आरएसएस से क्यों पंगा लेना चाहिए? मेरा यही सवाल है, भाई। बस शांति और आराम से रहो…!” खड़गे दलित हैं और जिगाजिनागी भी। जब उनसे साफ़-साफ़ बताने को कहा गया, तो जिगाजिनागी ने कहा, “मेरी बात सुनिए। क्योंकि उनके [खड़गे के] पिता ने कांग्रेस पार्टी में कड़ी मेहनत की थी, इसलिए उन्होंने उनके लिए इंतज़ाम कर दिया। उन्हें लोगों के लिए काम करके अच्छा नाम कमाना चाहिए। जो कोई भी आरएसएस से झगड़ेगा, वह टिक नहीं पाएगा। धन्यवाद।” खबरों के मुताबिक, जिगाजिनागी पहले भी आरएसएस/भाजपा के दलित-विरोधी रवैये को लेकर उसकी आलोचना कर चुके हैं। साफ़ है कि खड़गे को जिगाजिनागी आरएसएस/भाजपा से न उलझने की चेतावनी दे रहे थे, क्योंकि दलित होने के नाते इसके बुरे नतीजे हो सकते थे। खड़गे के पत्र ने अचानक आरएसएस/भाजपा के अंदर की दरारों को उजागर कर दिया है – जिसकी पुष्टि एक अनुभवी भाजपा नेता ने भी की है।

आरएसएस के कामकाज के तरीकों, उसके फ़ंडिंग के स्रोतों और असली मक़सद के बारे में सवाल उठना कोई नई बात नहीं है। महात्मा गांधी की हत्या के समय से ही लोगों और सरकारों को यह एहसास रहा है कि यह एक रहस्यमयी और गुप्त संगठन है। इसकी पहचान इसके अर्ध-सैन्य (पैरा-मिलिट्री) कवायद और मार्च, एक गैर-निर्वाचित व्यक्ति (सरसंघचालक), जिसे आमतौर पर निवर्तमान प्रमुख द्वारा चुना जाता है, के नेतृत्व और पर्दे के पीछे कई तरह की हिंदू कट्टरपंथी गतिविधियों, जिसमें हिंसा भी शामिल है, में इसकी भूमिका से होती है। 1978 में सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेस (सीबीडीटी) के निर्देशों के तहत इसे आयकर से छूट दी गई थी। इसी वजह से इनकम टैक्स ट्रिब्यूनल के कई मामलों में – ख़ासकर बॉम्बे और पटना में – आरएसएस को आयकर के दावों के लिए ज़िम्मेदार नहीं माना गया। इसके पीछे आरएसएस का यह तर्क था कि उसका फ़ंड ‘गुरु दक्षिणा’ (गुरु को दी जाने वाली भेंट) है और ‘पारस्परिक सहयोग’ के सिद्धांत के कारण इसे टैक्स के दायरे से बाहर रखा गया है।

लेकिन इसके हाशिए पर रहने वाले दिनों के बाद से हालात बदल गए हैं। आइए देखें कि कैसे।

*क्या यह एक गैर-राजनैतिक, सांस्कृतिक संगठन है?*

आरएसएस के बारे में सबसे ज़्यादा और लगातार फैलाए जाने वाले मिथकों में से एक यह है कि यह एक गैर-राजनैतिक सांस्कृतिक संगठन है। यहाँ तक कि आरएसएस का संविधान भी यही कहता है। इसे सरदार पटेल के ज़ोर देने पर स्वीकृत किया गया था, जब महात्मा गांधी की हत्या में कथित भूमिका के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। आरएसएस सीधे तौर पर चुनाव नहीं लड़ता है, लेकिन राजनीति का मतलब सिर्फ़ चुनाव लड़ना नहीं होता – आरएसएस और उसके अनगिनत सहयोगी संगठन ऐसी विचारधारा को फैलाने के लिए कई तरह की गतिविधियाँ करते हैं, जो सीधे तौर पर राजनीतिक लक्ष्यों और महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी होती हैं। वह समाज को बदलना चाहता है और एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाना चाहता है, जो शायद मनुस्मृति जैसे हिंदू धार्मिक ग्रंथों के आधार पर चले, जिनमें कई दकियानूसी विचार हैं। यह उन सभी तबकों के प्रति नफ़रत फैलाता है, जो हिंदुत्व की उसकी संकीर्ण और प्रतिशोधी व्याख्या (जो ब्राह्मणवादी सिद्धांतों पर आधारित है) को नहीं मानते। खासकर, यह इस्लाम और ईसाई धर्म के प्रति दुश्मनी का भाव फैलाता है, हालाँकि अक्सर इसे घुमा-फिराकर या परोक्ष भाषा में कहा जाता है। इन और ऐसे ही अन्य विचारों को किन तरीकों से पूरा किया जाएगा? आरएसएस का दावा है कि यह लोगों के ‘चरित्र निर्माण’ के ज़रिए किया जाता है। लेकिन आरएसएस एक सदी से ऐसा कर रहा है और नतीजे कुछ खास नहीं दिखे हैं। दूसरा अनकहा तरीका राजनीतिक सत्ता हासिल करना है। इसने सबसे पहले 1950 में राजनीतिक क्षेत्र में अपना काम करने के लिए ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की। फिर, 1980 में जनसंघ को भाजपा में बदल दिया गया। इन खुले राजनीतिक साधनों के अलावा, इसने राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए धर्म का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया, जिसमें कई कट्टरपंथी और छद्म-राष्ट्रवादी नारों या मुद्दों का सहारा लिया गया।

मोदी के सत्ता में आने के साथ ही आरएसएस के कामकाज की परिस्थितियों में एक गुणात्मक बदलाव आया है। इसके प्रचारक (मुख्य पूर्णकालिक पदाधिकारी) और समर्पित सदस्य ऊँचे पदों पर पहुँचे हैं – खुद प्रधानमंत्री एक प्रचारक थे और उनके मंत्रिमंडल के कई सदस्य आरएसएस से जुड़े हैं। यही बात राज्य सरकारों के मामले में भी सच है, जहाँ भाजपा-शासित लगभग सभी राज्यों में चुने हुए आरएसएस पदाधिकारी मुख्यमंत्री और राज्य सरकार में मंत्री बने हैं।

आरएसएस ने सरकार और अपने बीच तालमेल बिठाने के लिए कई ‘समूह’ बनाए हैं, जैसे आर्थिक, शिक्षा आदि। आरएसएस के जो पदाधिकारी इसके सहयोगी संगठनों में काम करते हैं, वे सरकारी नीतियों पर सलाह देने, मार्गदर्शन करने और उन्हें लागू करने में सक्रिय रूप से शामिल रहते हैं। बदले में, केंद्र और राज्य सरकारें इन संगठनों की गतिविधियों के लिए उन्हें फंड देती हैं। ‘लोकलहर’ के पिछले लेखों में इन पहलुओं पर चर्चा की जा चुकी है। आरएसएस का यह दावा कि वह गैर-राजनैतिक संगठन है, एक ऐसा झूठ है, जिसकी पोल अब खुल चुकी है। और, अगर वह सार्वजनिक राजनैतिक कामकाज में शामिल है, तो उसके कामकाज के तरीकों, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, भारी मात्रा में पैसा जुटाने और खर्च करने, और असल में यह देखने के लिए कि क्या वह भारत के संविधान और देश के कानूनों के मुताबिक काम कर रहा है या नहीं, उसकी जांच-पड़ताल क्यों नहीं होनी चाहिए?

*संस्थानों में घुसपैठ*

आरएसएस की गतिविधियों का एक ऐसा पहलू, जिस पर कम ही बात होती है, वह है सरकारी और सामाजिक संस्थानों में उसकी लगातार और गुप्त घुसपैठ। मोदी सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस का सदस्य बनने पर लगी रोक हटा दी है। इसलिए, अब सरकारी कर्मचारियों का एक बड़ा समूह खुलकर सामने आ गया है। लेकिन बात सिर्फ़ इसी तबके तक सीमित नहीं है। न्यायिक अधिकारियों से लेकर विश्वविद्यालयों के कुलपतियों तक, और बड़े उद्योगपतियों से लेकर सेना के अधिकारियों तक, बहुत से लोगों ने यह बात ज़ाहिर की है कि वे लंबे समय से आरएसएस के सदस्य या समर्थक रहे हैं। कई अन्य लोगों ने शायद ऐसा न कहा हो, लेकिन उनके कामों और बयानों से साफ़ पता चलता है कि वे भी इसी श्रेणी में आते हैं।

मोदी के दौर में इस प्रक्रिया को बढ़ावा मिला है, क्योंकि सरकार द्वारा चलाए जा रहे लगभग हर संस्थान या संस्था में आरएसएस के सदस्यों को भरा गया है। वे सब मिलकर लोगों की मानसिकता को आकार देने और नीतियां तय करने में जबरदस्त ताकत और प्रभाव रखते हैं। वे अभी आरएसएस की विचारधारा को फैलाने और उसकी राजनीतिक ताकत को मजबूत करने में योगदान दे रहे हैं।

आरएसएस द्वारा संचालित संगठन हज़ारों स्कूल और कॉलेज चला रहे हैं, (इनमें सैनिक स्कूल भी शामिल हैं, जो सशस्त्र बलों में भर्ती के लिए ट्रेनिंग देते हैं)। वे ऐसी सामाजिक सेवा संस्थाएँ भी चला रहे हैं, जो सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को लागू करती हैं और लाखों लोगों तक पहुँचती हैं। वे उन धार्मिक ट्रस्टों का भी संचालन करते हैं जो मंदिरों और तीर्थयात्रा जैसी अन्य धार्मिक गतिविधियों को चलाने के लिए ज़िम्मेदार हैं।

जो संस्था इतनी सारी चीज़ों को नियंत्रित करती है, उसकी जांच-पड़ताल होनी चाहिए और उसकी जवाबदेही व पारदर्शिता की परख होनी चाहिए। अयोध्या के राम मंदिर में चल रहा घोटाला, जिसमें आरोप है कि रोज़ाना चढ़ावे में आने वाले नगद राशि और कीमती धातुओं की गिनती करने वाले लोगों ने 200 करोड़ रुपये का गबन किया है, यह दिखाता है कि किस तरह लोगों के भरोसे को तोड़ा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि मंदिर का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट में संघ परिवार के लोग भरे पड़े हैं। यही वजह है कि यह खबर लिखे जाने तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।

*जनता की सतर्कता ज़रूरी*

आखिरकार, हो सकता है कि आरएसएस खड़गे के पत्र को भी पहले की कोशिशों की तरह नज़रअंदाज़ कर दे। आरएसएस द्वारा भारत पर चुपके से कब्ज़ा करने की कोशिशों को रोकने का असली ज़रिया आम जनता की सतर्कता और दबाव ही है। आरएसएस को एक ‘डीप स्टेट’ (छिपी हुई सत्ता) के तौर पर देखा जाता है, जो पर्दे के पीछे से देश और उसके नेताओं को कठपुतली की तरह चलाता है। अभी उसमें इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अपनी मध्ययुगीन विचारधारा और ‘हिंदू राष्ट्र’ के सपनों के लिए खुलकर जनादेश मांगे। वह सही मौके का इंतज़ार करते हुए भाजपा और दूसरे संगठनों की आड़ में छिपा रहता है। जब तक उसकी गतिविधियों, उससे जुड़े संगठनों और सरकारी कामकाज व सामाजिक जीवन में उनकी घुसपैठ पर रोशनी नहीं डाली जाएगी, तब तक उसका दायरा फैलता ही रहेगा।