अच्छी बारिश की कामना से जुड़ा अनूठा आयोजन, दाल-बाटी-चूरमा के सामूहिक भोज से निभाई जाती है सदियों पुरानी परंपरा
स्मार्ट हलचल, आकोला। मेवाड़ अंचल की समृद्ध लोक संस्कृति में ‘गांव बाहर भोज’ (गांव-बारो) एक ऐसा पारंपरिक उत्सव है, जो केवल सामूहिक भोजन तक सीमित नहीं बल्कि प्रकृति, आस्था, सामाजिक एकता और पारिवारिक रिश्तों का अनूठा संगम माना जाता है। अच्छी वर्षा और समृद्ध फसल की कामना के साथ गांव-ढाणी और मजरे में आज भी यह परंपरा कई स्थानों पर जीवित है।करीब तीन-चार दशक पहले तक यह आयोजन गांव की सीमा से बाहर खेतों, खलिहानों, कुओं के पास या बरगद, पीपल, नीम, इमली और खेजड़ी जैसे छायादार वृक्षों के नीचे सामूहिक रूप से आयोजित किया जाता था। गांव के बुजुर्गों की सहमति से दिन तय होता और कई परिवार मिलकर दाल-बाटी-चूरमा का सामूहिक भोज तैयार करते थे।
इस परंपरा की शुरुआत गांव के खेड़ा देवता और लोक देवी-देवताओं के लिए चंदा एकत्रित कर भोग लगाने से होती थी। निर्धारित दिन गांव के भोपे, हजूरिये और दमामी ढोल-नगाड़ों के साथ देवस्थानों पर पूजा-अर्चना करते थे। गांव का संवदिया दो दिन पहले पूरे गांव में घूमकर आयोजन और रतजगे की सूचना देता था।
इसके बाद गांव बाहर भोज के लिए बहनों, बेटियों और रिश्तेदारों को न्योता भेजा जाता था। आयोजन से एक दिन पहले ही रिश्तेदार गांव पहुंचने लगते थे। सुबह तड़के सभी लोग भोजन सामग्री लेकर खेतों की ओर निकलते, जहां कंडों की आग पर बाटियां सेंकी जातीं और पंचमेल दाल तैयार की जाती थी। उस समय घर का शुद्ध देसी घी और गुड़ से बना चूरमा इस भोज का प्रमुख आकर्षण होता था। ढाक (पलाश) के पत्तों से वहीं पत्तल और दोने तैयार किए जाते थे।
भोजन शुरू होने से पहले देवताओं को भोग लगाया जाता, पशु-पक्षियों और चींटियों के लिए भी अन्न निकाला जाता तथा महिलाएं लोकगीत गाकर अच्छी वर्षा और खुशहाली की कामना करती थीं। इसके बाद पूरा गांव एक साथ बैठकर प्रेम और भाईचारे के साथ भोजन करता था।
समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप बदल गया है। अब अधिकांश परिवार खेतों के बजाय अपने घरों में ही सीमित रूप से यह आयोजन करने लगे हैं। शुद्ध देसी घी और गुड़ की जगह बाजार का घी और चीनी ने ले ली है, जिससे पारंपरिक स्वाद और आत्मीयता में भी बदलाव आया है।
लोक संस्कृति से जुड़े जानकारों का मानना है कि ‘गांव बाहर भोज’ केवल सामूहिक भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, पारिवारिक मेल-मिलाप, प्रकृति के प्रति आस्था और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का महत्वपूर्ण माध्यम है। बदलते दौर में भी इस परंपरा का संरक्षण आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी रहें।
