ऊटी की कोटा जनजाति के व्यक्ति ने लगाया 16 साल तक आर्थिक और जातीय उत्पीड़न का आरोप, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग पहुंचा मामला

तमिलनाडु की विशेष रूप से कमजोर जनजाति (PVTG) के सदस्य ने कहा- मेहनताना, कमीशन और विकास कार्यों के 47.60 लाख रुपये नहीं मिले, जातिसूचक अपमान और धमकी भी दी गई

✍️ राकेश मीणा

ऊटी (नीलगिरि)/नई दिल्ली। स्मार्ट हलचल|तमिलनाडु के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ऊटी (नीलगिरि) की कोटा जनजाति, जिसे राज्य की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) में शामिल किया गया है, के एक सदस्य ने 16 वर्षों तक आर्थिक शोषण और जातीय उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का दरवाजा खटखटाया है। आयोग ने शिकायत स्वीकार करते हुए डायरी नंबर 73078/IN/2026 जारी कर मामले को दर्ज कर लिया है।

शिकायतकर्ता आर. दामोदरन ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2009 से 2025 तक उन्होंने एक निजी व्यक्ति की नीलगिरि जिले के बंदीशोलाई और मेट्टुपालयम क्षेत्र स्थित भूमि और संपत्तियों की देखरेख, विकास तथा बिक्री संबंधी कार्य पूरी निष्ठा से किए। इसके बदले उन्हें प्रतिमाह मानदेय, विकास कार्यों का खर्च और भूमि बिक्री पर कमीशन देने का वादा किया गया था, लेकिन वर्षों तक काम लेने के बाद भी भुगतान नहीं किया गया।

16 वर्षों तक सेवा, फिर भी नहीं मिला मेहनताना

शिकायत के अनुसार दामोदरन ने अपनी निजी पूंजी लगाकर भूमि विकास, रखरखाव और अन्य कार्य कराए। भुगतान नहीं मिलने के कारण उन्हें लगातार उधार लेना पड़ा और वे भारी कर्ज में डूब गए। उन्होंने दावा किया है कि विकास कार्यों पर लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद उन्हें न तो निर्धारित मानदेय मिला और न ही कमीशन का भुगतान किया गया।

47.60 लाख रुपये की बकाया राशि का दावा

शिकायत पत्र में 16 वर्षों का मानदेय, भूमि बिक्री का कमीशन, विकास कार्यों पर किया गया खर्च और यात्रा व्यय सहित कुल 47.60 लाख रुपये बकाया होने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने कई बार भुगतान की मांग की, लेकिन हर बार उन्हें टाल दिया गया।

जातिसूचक अपमान और जान से मारने की धमकी का आरोप

दामोदरन ने आयोग को बताया कि जब उन्होंने अपने बकाया की मांग की तो उन्हें उनकी जनजातीय पहचान को लेकर कथित रूप से अपमानित किया गया। आरोप है कि आरोपी ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए उनकी सामाजिक पहचान का मजाक उड़ाया और जान से मारने की धमकी भी दी। शिकायत में कहा गया है कि इन घटनाओं के कारण वे लंबे समय तक भय के माहौल में रहे और तत्काल पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करा सके।

सेवा से हटाया, संपर्क भी तोड़ दिया

शिकायतकर्ता का आरोप है कि लगातार भुगतान मांगने के बाद उन्हें देखरेख की जिम्मेदारी से हटा दिया गया और संपत्तियों की जिम्मेदारी किसी अन्य व्यक्ति को सौंप दी गई। इसके बाद आरोपी ने उनसे संपर्क भी समाप्त कर दिया।

आयोग से एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग

पीड़ित ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से अनुरोध किया है कि मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराने, निष्पक्ष जांच कराने तथा आर्थिक शोषण और जातीय उत्पीड़न के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाएं।

जनजातीय अधिकारों पर फिर उठे सवाल

यह मामला केवल एक व्यक्ति की शिकायत तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे यह प्रश्न भी उठ रहा है कि दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले कमजोर जनजातीय समुदायों के लोगों को यदि लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक शोषण का सामना करना पड़े, तो उन्हें समय पर न्याय और कानूनी सहायता कैसे उपलब्ध कराई जाए।