युवाचार्यश्री सहित 17 संतवृंद-साध्वीवृंद का चातुर्मास मंगल प्रवेश आज
पुनित चपलोत
भीलवाड़ा // भक्तामर स्तोत्र की आराधना धर्म आराधना की आधारशिला है। यह साधना साधक को परमात्मा से जोड़ते हुए उसके भीतर निहित अनंत सामर्थ्य को अभिव्यक्त करने की शक्ति प्रदान करती है।
यह उद्गार श्रमण संघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषि जी ने चातुर्मास मंगल प्रवेश की पूर्व बेला में वर्धमान कॉलोनी स्थित अंबेश स्वाध्याय भवन में आयोजित भक्तामर स्तोत्र की सामूहिक आराधना एवं साधना के द्वितीय दिवस श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भक्तामर स्तोत्र की रचना न तो चमत्कार दिखाने के लिए हुई और न ही किसी लौकिक सिद्धि के प्रदर्शन के लिए। यह आचार्य मानतुंग की परमात्मा के प्रति अगाध श्रद्धा, निष्कलुष भक्ति, आत्मानुभूति और साधना का अमर स्तवन है। तीर्थंकर प्रभु की भक्ति, स्तुति, उपासना और आराधना साधक के अंतर्मन में निहित आध्यात्मिक चेतना एवं अनंत सामर्थ्य को जागृत करने का सशक्त माध्यम है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि आचार्य मानतुंग ने विपरीत परिस्थितियों को कभी बाधा नहीं माना, बल्कि प्राप्त एकांत और समय को परमात्मा की आराधना का श्रेष्ठ अवसर बना दिया। उन्होंने समय को व्यतीत नहीं किया, बल्कि साधना में रूपांतरित किया और उसी साधना से भक्तामर स्तोत्र जैसी कालजयी आध्यात्मिक कृति का प्राकट्य हुआ। उन्होंने कहा कि जीवन में समय सबसे बड़ी संपदा है। जो व्यक्ति समय को धर्म, स्वाध्याय और आत्मचिंतन से जोड़ लेता है, वही अपने भीतर निहित दिव्य सामर्थ्य का साक्षात्कार कर पाता है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मंथन से नवनीत प्राप्त होता है और विविध पुष्पों के पराग से निर्मित प्राकृतिक मधु अपने भीतर औषधीय गुणों का अमूल्य भंडार समेटे रहता है, उसी प्रकार भक्तामर स्तोत्र महान आचार्यों की तपस्या,साधना,अनुभूति और आध्यात्मिक मंथन का अमृत स्वरूप है। इसकी प्रत्येक गाथा साधक को आत्मबल, श्रद्धा, संयम और आध्यात्मिक उत्कर्ष की दिशा में प्रेरित करती है।
श्रद्धालुओं को आह्वान करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि चातुर्मास आत्मा के भीतर धर्म की प्रतिष्ठा का महापर्व है। यह चार महीनों का साधनाकाल जीवन को भीतर से रूपांतरित करने का दिव्य अवसर है। जप, स्वाध्याय, आराधना और संयम यदि इस काल में जीवन के संस्कार बन जाएँ, तो उनका प्रकाश सम्पूर्ण जीवन-पर्याय को आलोकित करता है। चातुर्मास की सार्थकता बाह्य अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि साधना को विचार, व्यवहार, संस्कार और चरित्र का स्वाभाविक स्वरूप बनाने में है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि जिस प्रकार रोटी पर लगाया गया थोड़ा-सा घी उसकी कोमलता बनाए रखता है, उसी प्रकार जीवन में नियमित धर्म आराधना, स्वाध्याय और साधना का छोटा-सा भी संस्कार व्यक्ति के विचारों, आचरण और व्यक्तित्व को सात्त्विक, संतुलित एवं आनंदमय बनाए रखता है।
शांतिभवन के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़ ओर मंत्री नवरतनमल भलावत ने जानकारी देते हुए बताया कि युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी का भीलवाड़ा में यह प्रथम चातुर्मास है। रविवार 19 जुलाई को प्रातः 7:30 बजे वर्धमान कॉलोनी स्थित अंबेश स्वाध्याय भवन से विशाल चातुर्मास मंगल प्रवेश शोभायात्रा प्रारंभ होगी, जो महाराणा टॉकीज, नेताजी सुभाष मार्केट एवं गोल प्याऊ चौराहे से होते हुए शांतिभवन पहुँचेगी। युवाचार्यश्री के साथ यशोदिप्ती मधुकंवरजी,उपप्रवर्तिनी दिव्य ज्योतिजी,महासती सुचेताजी,साध्वी पियूष दर्शनाजी सहित 17 संतवृंद -साध्वीवृंद का चातुर्मास मंगल प्रवेश होगा। मंगल प्रवेश समारोह में युवाचार्यश्री का अभिनंदन किया जाएगा। इस अवसर पर देश के विभिन्न प्रांतों से हजारों श्रद्धालु भीलवाड़ा पहुँच चुके हैं, जो चातुर्मास मंगल प्रवेश के साक्षी बनेंगे। समारोह में मेवाड़ गौरव रविन्द्र मुनिजी की विशेष उपस्थिति भी रहेगी।
