1987 की गौरवशाली शुरुआत से करोड़ों के जीर्णोद्धार तक… आखिर क्यों नहीं लौट पाई पुरानी रौनक?
लेखक- श्रीकान्त सिंह शाक्य
लखीमपुर खीरी।स्मार्ट हलचल|लखीमपुर खीरी के शारदानगर रोड पर महेवागंज के निकट स्थित इन्दिरा मनोरंजन वन कभी जिले की सबसे खूबसूरत और लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में गिना जाता था। यह केवल एक पार्क नहीं था, बल्कि प्रकृति, वन्यजीव संरक्षण और पारिवारिक मनोरंजन का ऐसा केंद्र था, जहां हर रविवार और अवकाश के दिन हजारों लोगों की चहल-पहल रहती थी। बच्चों की किलकारियां, हिरणों की अठखेलियां, बोटिंग का रोमांच और हरियाली से भरा वातावरण इसकी पहचान हुआ करता था।
लेकिन समय के साथ यह पहचान धूमिल होती चली गई। उपेक्षा, रखरखाव की कमी और प्रशासनिक लापरवाही ने इस धरोहर को धीरे-धीरे वीरान बना दिया। करोड़ों रुपये खर्च कर इसके पुनर्जीवन का प्रयास किया गया, लेकिन आज फिर इसकी बदहाली चर्चा का विषय बनी हुई है।
*1987: जब रखा गया एक सुनहरे सपने का आधार*
वर्ष 1987 में वन विभाग ने लगभग 30 से 33 हेक्टेयर क्षेत्र में इन्दिरा मनोरंजन वन की स्थापना की। इसका उद्देश्य केवल लोगों को मनोरंजन उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि आम नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और वन्यजीवों के प्रति जागरूक करना भी था।
उस दौर में यह पार्क आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित था। यहां हिरणों के लिए विशाल बाड़ा बनाया गया था। सांप और अजगर जैसे जीवों के लिए अलग एनक्लोजर विकसित किए गए। बच्चों के लिए आकर्षक झूले लगाए गए, जगह-जगह सीमेंट की मजबूत बेंच और शेड बनाए गए, स्मृति वन और चेतना केंद्र विकसित किए गए। पार्क के बीच बहने वाली जलधारा पर लकड़ी का खूबसूरत पुल बनाया गया, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र था। वहीं बोटिंग की सुविधा इस पार्क को जिले का सबसे लोकप्रिय पिकनिक स्पॉट बनाती थी।
*मिनी जू के रूप में मिली अलग पहचान*
इन्दिरा मनोरंजन वन को केवल पार्क तक सीमित नहीं रखा गया। इसे मिनी जू (डियर पार्क) के रूप में भी पहचान मिली। यहां हिरणों सहित कई वन्यजीव रखे गए और इसका नाम केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के रिकॉर्ड में भी दर्ज हुआ। इससे यह स्थान जिले ही नहीं, आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया।
*जब शुरू हुई बदहाली की* कहानी
समय के साथ इस पार्क की देखरेख कमजोर पड़ने लगी। पर्याप्त बजट और नियमित रखरखाव के अभाव में सुविधाएं एक-एक कर खत्म होती चली गईं।
बच्चों के झूले टूट गए। लकड़ी का पुल जर्जर होकर समाप्त हो गया। बोटिंग पूरी तरह बंद हो गई। शेड और बेंच खंडहर में बदलने लगे। कई बार आई बाढ़ में हिरण बह जाने जैसी घटनाएं भी सामने आईं। सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होने से असामाजिक तत्वों का जमावड़ा बढ़ा और परिवारों ने यहां आना लगभग बंद कर दिया।
जो पार्क कभी जीवन से भरा रहता था, वह धीरे-धीरे सन्नाटे में डूब गया। लगभग दो दशकों तक यह धरोहर उपेक्षा का शिकार बनी रही।
*जनता की मांग पर जागी उम्मीद*
स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों ने लगातार पार्क के पुनर्जीवन की मांग उठाई। वर्षों की मांग के बाद वन विभाग ने लगभग पांच करोड़ रुपये के प्रस्ताव तैयार किए।
बाद में पर्यटन विभाग ने 3.25 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया और निर्माण कार्य की जिम्मेदारी सीएनडीएस (CNDS) को सौंप दी गई।
*करोड़ों रुपये से संवारा गया पार्क*
जीर्णोद्धार के दौरान पार्क को आधुनिक स्वरूप देने का दावा किया गया।
मुख्य प्रवेश द्वार का नवीनीकरण किया गया। नई बाउंड्री और सुरक्षा व्यवस्था विकसित की गई। हिरण बाड़े का पुनर्विकास हुआ। बोटिंग क्षेत्र की मरम्मत कराई गई। लकड़ी के पुराने पुल की जगह सीमेंट का मजबूत पुल बनाया गया। नए झूले, बैठने के लिए शेड और बेंच लगाए गए। नेचर ट्रेल, वॉच टॉवर, कैंटीन, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाएं भी विकसित की गईं।
उम्मीद जगी कि अब इन्दिरा मनोरंजन वन अपनी पुरानी पहचान वापस हासिल करेगा।
*2023 में दोबारा खुला, लेकिन…*
अप्रैल 2023 में निर्माण कार्य पूरा होने के बाद 1 जुलाई 2023 को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्र ‘टेनी’ ने इसका लोकार्पण किया। वर्षों बाद पार्क जनता के लिए खुला तो बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे। लोगों को लगा कि अब जिले को उसकी खोई हुई धरोहर वापस मिल गई है।
लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी।
*तीन महीने बाद ही उठने लगे सवाल*
लोकार्पण के कुछ ही महीनों बाद पार्क की गुणवत्ता और रखरखाव पर गंभीर सवाल उठने लगे।
नए झूले टूटने लगे। बेंच क्षतिग्रस्त हो गईं। आरओ और पेयजल व्यवस्था ठप पड़ गई। महिला शौचालय बंद हो गया। कई स्थानों पर साफ-सफाई और सुरक्षा व्यवस्था कमजोर दिखने लगी। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सुविधाओं के तेजी से खराब होने पर लोगों ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए।
*आज फिर खड़ा है बड़ा सवाल*
इन्दिरा मनोरंजन वन केवल एक पार्क नहीं, बल्कि लखीमपुर खीरी की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति से जोड़ने वाला केंद्र हो सकता है, लेकिन यदि रखरखाव और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई तो करोड़ों रुपये का निवेश भी बेकार साबित होगा।
आज जरूरत केवल नए निर्माण की नहीं, बल्कि नियमित रखरखाव, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, पारदर्शी निगरानी और जिम्मेदार प्रबंधन की है।
*आखिर जवाब कौन देगा?*
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि पार्क कुछ ही महीनों में बदहाल होने लगे तो यह केवल एक निर्माण परियोजना की विफलता नहीं, बल्कि सरकारी संसाधनों के उपयोग और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।
क्या प्रशासन, वन विभाग और जनप्रतिनिधि इस ऐतिहासिक पार्क को उसकी पुरानी गरिमा और पहचान वापस दिला पाएंगे? या फिर इन्दिरा मनोरंजन वन एक बार फिर उपेक्षा की भेंट चढ़ जाएगा?
यह सवाल केवल एक पार्क का नहीं, बल्कि हमारी प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण, सरकारी जवाबदेही और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी है।
