दुःख आए तो टूटना नहीं, भीतर की शक्ति को जगाना ही तीर्थंकर भक्ति है — युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

पुनित चपलोत
भीलवाड़ा // मनुष्य परमात्मा से प्रार्थना करता है कि मेरे जीवन से दुःख दूर कर दो, लेकिन तीर्थंकरों की साधना हमें इससे भी बड़ी प्रार्थना करना सिखाती है,दुःख रहे तो भी मुझे इतना मजबूत बना दो कि मैं उसके सामने टूटूं नहीं। यह उद्बोधन श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने शांतिभवन में आयोजित जाप के महत्व पर केंद्रित धर्मसभा में व्यक्त करते हुए कहा कि तीर्थंकरों की भक्ति पीड़ा से भागने का मार्ग नहीं, बल्कि पीड़ा के बीच अपनी आत्मशक्ति को पहचानने और उसे जागृत करने की साधना है।
उन्होंने कहा कि जीवन में सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं। मनुष्य स्वाभाविक रूप से चाहता है कि दुःख दूर हो जाए, लेकिन धर्म हमें केवल दुःख से मुक्ति की कामना करना नहीं सिखाता, बल्कि दुःख के बीच स्वयं को संभालना सिखाता है। कष्ट हमारे हाथ में नहीं होते, लेकिन कष्टों के सामने हमारा मन कैसा रहे, यह हमारे पुरुषार्थ और साधना पर निर्भर करता है। यही वह बिंदु है, जहां धर्म जीवन की परिस्थितियों को बदलने से आगे बढ़कर मनुष्य के भीतर परिवर्तन का कार्य करता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि कई बार व्यक्ति सोचता है कि मैंने इतना धर्म किया, फिर मेरे जीवन में दुःख क्यों आया? यह समझना आवश्यक है कि धर्म कष्ट आने से रोकने का आश्वासन नहीं देता। कर्मों के परिणामस्वरूप जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियां आती रहती हैं, लेकिन धर्म उन परिस्थितियों के बीच मनुष्य को संभालने की शक्ति देता है। कर्म अपना फल दे सकते हैं, लेकिन धर्म उस फल को सहने का सामर्थ्य देता है। परिस्थिति मनुष्य को झुका सकती है, लेकिन आत्मशक्ति उसे भीतर से टूटने नहीं देती।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस सुख की तलाश बाहर करता है, तीर्थंकरों ने उसी सुख का स्रोत अपने भीतर खोजा। बाहरी सुख वस्तु, व्यक्ति और परिस्थिति पर निर्भर होता है, इसलिए उसके साथ अस्थिरता जुड़ी रहती है, लेकिन आत्मा में स्थित आनंद किसी बाहरी सहारे का मोहताज नहीं। तीर्थंकरों का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सच्चा आनंद परिस्थितियों की अनुकूलता में नहीं,आत्मचेतना के जागरण में है। उनकी आराधना का अर्थ केवल उनके नाम का स्मरण करना नहीं, बल्कि उस चेतना को अपने भीतर जगाना है, जिसने उन्हें संसार के सुख-दुःख से ऊपर उठकर आत्मसिद्धि की ओर अग्रसर किया।
युवाचार्यश्री ने कहा कि जैन परंपरा के 24 तीर्थंकर समान रूप से पूजनीय हैं। भगवान महावीर वर्तमान तीर्थंकर परंपरा के अंतिम तीर्थंकर होने के कारण हमारे वर्तमान साधना-पथ के मार्गदर्शक हैं, लेकिन भगवान महावीर का स्मरण करते हुए हम उस संपूर्ण तीर्थंकर परंपरा को नमन करते हैं, जिसने स्वयं साधना करके सिद्धि प्राप्त की और जीवमात्र के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने स्वयं चलकर मार्ग बनाया, तभी हमारे भीतर भी उस मार्ग पर चलने का विश्वास और साहस जागा।
उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों का जाप इसी आत्मजागरण की साधना है। आदिनाथ प्रभु का स्मरण मनुष्य में कर्तव्यनिष्ठा, कर्मण्यता और पुरुषार्थ को जगाता है। नेमिनाथ प्रभु का जीवन बताता है कि करुणा केवल किसी दूसरे जीव के प्रति संवेदना नहीं, बल्कि अपने भीतर की निर्मलता और प्रसन्नता का आधार भी है। पार्श्वनाथ प्रभु सत्य के प्रति निर्भीक रहने और विरोध के बीच भी सत्य का साथ न छोड़ने की प्रेरणा देते हैं। भगवान महावीर विपरीत परिस्थितियों में भी साधना और लक्ष्य से विचलित न होने का आत्मबल प्रदान करते हैं। शांतिनाथ प्रभु शांति, संतुलन, त्याग और शरणागत की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करने की प्रेरणा देते हैं।
युवाचार्यश्री ने कहा कि इन तीर्थंकरों का स्मरण तभी जीवनदायी बनता है, जब उनके जीवन का कोई गुण हमारे अपने जीवन में दिखाई देने लगे। आदिनाथ का स्मरण हमारे कर्तव्य को जगा दे, नेमिनाथ का स्मरण हमारे भीतर करुणा भर दे, पार्श्वनाथ का स्मरण सत्य के लिए खड़े होने का साहस दे और महावीर का स्मरण कठिन समय में भी लक्ष्य से दृष्टि हटने न दे, तभी जाप केवल उच्चारण नहीं रहता, वह साधना बन जाता है।
उन्होंने कहा कि जाप का वास्तविक उद्देश्य शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उन शब्दों के माध्यम से अपने भीतर सोई हुई शक्ति को जगाना है। जाप परमात्मा को बदलने की साधना नहीं, स्वयं को बदलने की साधना है। जब श्रद्धा से किया गया स्मरण हमारी दृष्टि बदलने लगे, भावों को निर्मल करने लगे और जीवन जीने के ढंग में परिवर्तन आने लगे, तब समझना चाहिए कि जाप भीतर उतर रहा है। सामूहिक आराधना से वातावरण पवित्र होता है, लेकिन उसकी वास्तविक सार्थकता उस परिवर्तन में है, जो व्यक्ति के भीतर जन्म लेता है।
युवाचार्यश्री ने स्पष्ट कहा कि भक्ति की पहचान केवल आंखों में आए आंसू नहीं, बल्कि उन आंसुओं के बाद भी भीतर जीवित रहने वाला साहस है। साधना का अर्थ यह नहीं कि जीवन में तूफान कभी आए ही नहीं, साधना तो यह है कि तूफान आएं, लेकिन भीतर का दीपक बुझने न पाए। तीर्थंकरों का जीवन इसी अडिग आत्मबल का संदेश देता है परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मनुष्य अपनी आत्मशक्ति को जागृत करके उनसे ऊपर उठ सकता है।
उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों ने हमें दुःख से बचने का नहीं, दुःख के बीच भी अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर आगे बढ़ने का मार्ग दिया है। इसलिए परमात्मा के सामने हमारी प्रार्थना केवल इतनी न हो कि मेरे जीवन में दुःख न आएं; प्रार्थना यह भी हो कि यदि दुःख आए तो मेरा विश्वास न डगमगाए, यदि संकट आए तो मेरा साहस न टूटे और यदि परिस्थितियां प्रतिकूल हों तो मेरी आत्मशक्ति मंद न पड़े। क्योंकि जब भीतर की शक्ति जाग जाती है, तब दुःख जीवन की अंतिम सच्चाई नहीं रहता वह आत्मजागरण की एक सीढ़ी बन जाता है।
शांतिभवन के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद चीपड़ एवं मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि धर्मसभा से पूर्व तपस्वी धवल ऋषिजी, यशो दिप्ती मधुकंवरजी,उपप्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी महासती सुचेताजी एवं साध्वी पियूषदर्शनाजी ने सामूहिक जाप करवाया। जाप में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं के साथ शहर के विभिन्न श्रीसंघों के श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। इस अवसर पर अनेक भाई-बहनों ने उपवास, आयंबिल आदि तप के प्रत्याख्यान युवाचार्यश्री से ग्रहण किए।