संसार को नहीं, स्वयं को जीतने वाला बनता है जिनेश्वर परमात्मा : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

पुनित चपलोत
भीलवाड़ा // संसार पर विजय प्राप्त करना संभव है, लेकिन अपने मन, इंद्रियों, इच्छाओं और विकारों को जीतना अत्यंत कठिन है। जिनेश्वर परमात्मा ने किसी बाहरी शक्ति या व्यक्ति को पराजित नहीं किया, बल्कि भीतर के विषय-विकारों, राग-द्वेष और कषायों पर विजय प्राप्त कर जिनेश्वर पद पाया।यह विचार शांतिभवन में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषि जी ने रविवार को ‘नमो जिनाणं, जिय भयाणं’ के सामूहिक जाप के पश्चात आयोजित धर्म सभा में व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जब तक बाहरी विषयों और आकर्षणों से जुड़ा रहता है, तब तक उसकी आंतरिक साधना प्रभावी नहीं हो सकती। इंद्रियां अपने विषयों की ओर आकर्षित होती हैं और यही आकर्षण राग- द्वेष, मोह तथा कषायों को जन्म देता है। इसलिए परमात्मा ने पहले इंद्रियों और विषयों के आकर्षण को साधा, फिर भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त की।
उन्होंने कहा कि आत्मविजय की यात्रा बाहर से भीतर की ओर जाने वाली आध्यात्मिक यात्रा है। तीर्थंकर परमात्माओं द्वारा राजपाट, सुख-सुविधाओं और वैभव का त्याग कर संयम एवं प्रव्रज्या स्वीकार करना इसी आत्मसाधना का प्रमाण है। यदि सांसारिक आकर्षणों के बीच पूर्णतः निर्विकार रहना सहज होता, तो उन्हें राजवैभव त्यागने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
युवाचार्यश्री ने कहा कि तीर्थंकरों का त्याग संसार से पलायन नहीं, बल्कि चेतना को बाहरी विषयों से हटाकर आत्मस्वरूप की ओर मोड़ने का पुरुषार्थ था। उन्होंने बाहरी सुखों का त्याग कर आत्मचेतना जागृत की और संसार के समक्ष मुक्ति का मार्ग प्रस्तुत किया।
‘जिय भयाणं’ का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि इसका भाव केवल बाहरी भय से बचना नहीं, बल्कि भय के मूल कारणों पर विजय प्राप्त करना है। परिस्थितियां अनुकूल होने के बाद भी मनुष्य भीतर से आशंकित रह सकता है, लेकिन जिसने मन, इच्छाओं, आसक्तियों और विकारों को साध लिया, उसके भीतर भय का आधार समाप्त होने लगता है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा साधना के मार्ग पर जितना भीतर बढ़े, उतना ही उनका आत्मसामर्थ्य प्रकट हुआ। आत्मविजय के साथ निर्भयता बढ़ती गई। भय का वास्तविक अंत परिस्थितियां बदलने से नहीं, बल्कि चेतना जागृत करने से होता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि स्वयं पर विजय की दिशा में बढ़ने वाले व्यक्ति के भीतर सहज प्रसन्नता का उदय होता है। यह धन, पद, प्रतिष्ठा या बाहरी उपलब्धियों से मिलने वाला क्षणिक आनंद नहीं, बल्कि भीतर के संघर्ष, विकारों और अस्थिरता को साध लेने से प्राप्त स्थायी आनंद है। परमात्मा के आभामंडल से अनुभव होने वाला आह्लाद इसी आंतरिक प्रसन्नता की अभिव्यक्ति है। जिसने स्वयं को जीत लिया, उसका आनंद व्यक्तित्व और व्यवहार के माध्यम से दूसरों को भी प्रभावित करता है।
उन्होंने कहा कि भयभीत व्यक्ति भीतर से सिकुड़ता और स्वयं को छिपाने लगता है। भय उसके व्यक्तित्व और चिंतन को संकुचित कर देता है। इसके विपरीत सद्वृत्ति वाला व्यक्ति प्रकाश-अंधकार, एकांत और सार्वजनिक जीवन—हर परिस्थिति में अपने स्वभाव में स्थिर रहता है। भय व्यक्ति को छिपाता है, जबकि आत्मविजय उसे सहज और निर्भय बनाती है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि परमात्मा और महापुरुषों ने आत्मशुद्धि के अनेक साधन दिए हैं। आवश्यकता केवल उन्हें जानने की नहीं, बल्कि जीवन में उतारने की है। आत्मविजय, इंद्रिय-संयम, निर्भयता, आंतरिक प्रसन्नता तथा सभी जीवों के प्रति क्षमा और मैत्री का भाव मनुष्य को बहिरात्मा से अंतरात्मा और अंततः परमात्मा की ओर अग्रसर करता है।
धर्मसभा से पूर्व संतवृंद एवं साध्वीवृंद ने सामूहिक जाप कराया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
शांतिभवन के मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि सोमवार से प्रतिदिन सुबह 8:45 से 10 बजे तक युवाचार्यश्री एवं साध्वीवृंद के प्रवचन होंगे। वहीं, तपस्या के क्रम में धर्मचक्र तप भी प्रारंभ होगा।