सुख-सुविधाएं देकर माता-पिता के उपकारों से उऋण नहीं हो सकते, उनके जीवन का सहारा बनें : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

तेले तपस्वियों के सामूहिक पारणे में उमड़ा श्रद्धा का भाव, तप की हुई अनुमोदना

पुनित चपलोत
भीलवाड़ा // माता-पिता के उपकारों का ऋण केवल उन्हें सुख-सुविधाएं उपलब्ध कराने या ‘मां’ कहकर पुकारने भर से नहीं चुकाया जा सकता। उन्होंने हमें जन्म देने के साथ वह शरीर दिया, जिसके सहारे हम जीवन और धर्म को समझ रहे हैं। उनके उपकारों से पूर्णतः उऋण होना कठिन है, लेकिन उन्हें धर्म का सहारा देना, उनकी साधना में सहयोगी बनना और जीवन को धर्म की ओर ले जाना ही संतान का फर्ज है। यह बात श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने शांतिभवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में धर्मचक्र तप के तेले तपस्वियों के पारणे पर साधुवाद एवं अनुमोदना करते हुए कही।
युवाचार्यश्री ने कहा कि हम किसी चीज को किस नजरिए से देखते हैं, उसका अर्थ उसी से तय होता है। हिमालय की ऊंचाई जमीन से नहीं, समुद्र तल से मापी जाती है। कोई व्यक्ति मानचित्र पर स्केल लगाकर उसकी ऊंचाई कुछ सेंटीमीटर बताए तो उसका उत्तर अपने पैमाने पर सही हो सकता है, लेकिन प्रश्न का आशय उससे कहीं बड़ा था। यही अंतर दृष्टि का है। यदि हमारा पैमाना छोटा है तो हिमालय भी छोटा दिखाई देगा। जीवन में दृष्टिकोण को व्यापक बनाना होगा, तभी व्यक्ति अपने ऊपर हुए उपकारों की वास्तविक ऊंचाई को समझ पाएगा।
युवाचार्यश्री ने कहा कि माता-पिता ने उस समय हमारी देखभाल की, जब हम अपने लिए कुछ भी करने में समर्थ नहीं थे। उन्होंने हमें संभाला, हमारी तकलीफ को अपनी तकलीफ माना और बिना किसी स्वार्थ के हमारा पालन-पोषण किया। संतान के प्रति उनका समर्पण किसी सौदे या अपेक्षा पर आधारित नहीं था। इसलिए माता-पिता को सुख-सुविधाएं उपलब्ध करा देने मात्र से उनके उपकारों से उऋण होने का दावा नहीं किया जा सकता। उन्होंने हमें जो शरीर दिया है, वह उनकी ओर से मिली अमूल्य संपत्ति है। इस शरीर और जीवन को सार्थक बनाना ही उनके उपकारों के प्रति हमारा दायित्व है।
उन्होंने कहा कि माता-पिता की सेवा केवल उनकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं होनी चाहिए। संतान का वास्तविक फर्ज है कि वह उन्हें धर्म का आलंबन दे। उन्हें संतों का सान्निध्य प्रदान कराए, धर्मसभा में आने का अवसर उपलब्ध कराए और साधना से जुड़ने के लिए अनुकूल वातावरण दे। जिसने हमें जीवन का आधार दिया, उसके जीवन को धर्म के आधार से जोड़ना ही वह मार्ग है, जिससे संतान अपने माता-पिता के उपकारों के ऋण से उऋण हो सकती है।
माता-पिता की तरह जीवन में ऐसे अनेक उपकारी भी होते हैं, जिन्होंने हमें ज्ञान, साधन या धर्म का मार्ग दिया। उनके उपकारों का प्रत्युपकार केवल सुविधा या सहायता लौटाने से नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उन्हें भी उसी मार्ग पर संभालने से होता है। पंतक मुनि का प्रसंग सुनाते हुए युवाचार्यश्री ने बताया कि शैलक राजर्षि के साधना-जीवन में जब प्रमाद आया और उनकी साधुचर्या शिथिल पड़ गई, तब साथ के साधु वहां से चले गए, लेकिन पंतक मुनि अपने उपकारी का साथ छोड़कर नहीं गए। वे उनके साथ बने रहे। उनके सान्निध्य से शैलक राजर्षि को अपने प्रमाद का बोध हुआ और वे पुनः साधना में प्रवृत्त हुए। जिसने हमें धर्म में आगे बढ़ाया, उसके जीवन में कभी प्रमाद आए तो उसका साथ छोड़ देना नहीं, बल्कि उसे फिर धर्म में स्थिर करने का प्रयास करना ही उसके उपकारों के ऋण से उऋण होने का मार्ग है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि माता-पिता ने शरीर दिया, समाज और उपकारियों ने साधन दिए और गुरु ने जीवन को दिशा दी। इनके उपकारों को अपनी सीमित दृष्टि से मापना हिमालय की ऊंचाई को मानचित्र के कुछ सेंटीमीटर में समेटने जैसा है। इसलिए दृष्टि को व्यापक बनाएं और उपकारों की वास्तविक ऊंचाई को पहचानें। जिनके कारण हम आज यहां तक पहुंचे हैं, उनके प्रति अपना फर्ज निभाते हुए उन्हें भी धर्म,साधना और आत्म कल्याण की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास करें। यही वह मार्ग है, जिससे मनुष्य अपने उपकारियों के ऋण से उऋण हो सकता है।
सभा से पूर्व साध्वी चिंतनश्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी शक्ति व्यर्थ नहीं गंवानी चाहिए। अपनी सामर्थ्य का उपयोग आत्मकल्याण और धर्मसाधना में लगाकर जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
शांतिभवन के मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि धर्मचक्र तप के अंतर्गत तेले तप करने वाले 300 से अधिक तपस्वियों के सामूहिक पारणे शांतिभवन में श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुए। पारणे के लाभार्थी सुशील कुमार एवं जितेश चपलोत परिवार ने तपस्वियों के पारणे का लाभ लिया। इस अवसर पर श्रीसंघ संरक्षक नवरतन बंब, अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़, चातुर्मास संयोजक कंवरलाल सूरिया सहित महावीर युवक मंडल, शांति जैन महिला मंडल, अंबेश युवक मंडल एवं अन्य मंडलों के सदस्यों ने तपस्वियों के तप की अनुमोदना करते हुए पारणों की व्यवस्थाओं में सेवा प्रदान की।