खामोर सहित एक दर्जन से अधिक गांवों की परिवहन व्यवस्था हुई ‘लापता’सड़कें बनती रहीं,चुनाव होते रहे, लेकिन गांवों तक नहीं लौटी बसें… फिर चुनाव आने वाले हैं।
आजादी के बाद आज तक इन गांवों में में रोडवेज बस नहीं आई,निजी बसे भी 2 दशक से ओझल है।
शाहपुरा@स्मार्ट हलचल|देश को आज़ादी के 79 वर्ष होने आए हैं,लेकिन खामोर सहित आस पास के गांवों के हजारों ग्रामीण आज भी नियमित सार्वजनिक बस सेवा जैसी बुनियादी सुविधाओ से वंचित हैं।केन्द्र एवं राज्य की सरकार भले ही शहरों सहित ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के लिए नित नई योजनाएं निकालकर गांवों में सुविधा मुहैया कराने के प्रयास कर रहीं हो,लेकिन आज भी कई घनी आबादी एवं बड़े क्षेत्रफल वाले ऐसे गांव हैं,जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।हम जिस गांव की बात कर रहे वह खामोर हैं,लोकतंत्र में चुनाव हर पांच वर्ष में आते हैं।जनप्रतिनिधि गांव गांव पहुंचते हैं।विकास के वादे किए जाते हैं।नई योजनाओं की घोषणाएं होती हैं।लेकिन भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा-फूलियाकलां क्षेत्र के खामोर सहित दर्जनों गांवों के लिए पिछले करीब 20 वर्षों से सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा आज भी वहीं खड़ा है बस सेवा।चुनाव आते रहे,सरकारें बदलती रहीं,विधायक और सांसद बदलते रहे,लेकिन दर्जनों गांवों के हजारों आबादी को नियमित सार्वजनिक परिवहन आज तक नसीब नहीं हो सका।यह केवल एक बस का मुद्दा नहीं है। यह उस ग्रामीण भारत की कहानी है,जहां विकास के दावे और जमीनी हकीकत आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।एक समय था जब शाहपुरा–तहनाल– शंभूपुरा–सूरजपुरा–बिलिया–खामोर–नई राज्यास–धनोप–फूलियाकलां–केकड़ी मार्ग पर निजी बसें नियमित रूप से चलती थीं। घरटा–सेमलिया–शाहपुरा–खामोर मार्ग पर भी बसें संचालित होती थीं। भीलवाड़ा और गुलाबपुरा के लिए भी सीधी बस सेवा उपलब्ध थी। इन्हीं बसों से किसान मंडियों तक पहुंचते थे, विद्यार्थी कॉलेज जाते थे, मरीज अस्पताल पहुंचते थे और छोटे व्यापारी अपना कारोबार करते थे।कई लोग जिला मुख्यालय ओर उपखंड तक पहुंचते थे।लेकिन समय के साथ एक-एक कर सभी बसें बंद होती चली गईं। आज पूरे क्षेत्र में सार्वजनिक परिवहन की स्थिति लगभग शून्य है। हजारों लोग निजी वाहनों, महंगे किराए और असुविधाजनक साधनों पर निर्भर हैं। जिन परिवारों के पास निजी वाहन नहीं हैं, उनके लिए शहर तक पहुंचना आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।सबसे अधिक परेशानी विद्यार्थियों, महिलाओं, बुजुर्गों, मरीजों, दिव्यांगजनों और गरीब परिवारों को उठानी पड़ रही है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं को रोजाना अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। इलाज के लिए जाने वाले मरीजों को समय पर वाहन नहीं मिल पाता। किसानों को मंडियों तक पहुंचने में दिक्कत होती है और छोटे व्यापारियों की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र में विकास की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं,वहीं परिवहन व्यवस्था सिकुड़ती चली गई।कंवलियास से खामोर होते हुए धनोप तक एमडीआर सड़क बन चुकी है। क्षेत्र में गिट्टी क्रेशर संचालित हैं,खनन गतिविधियां हैं और कॉपर माइंस की संभावनाएं भी सामने हैं। इसी मार्ग से प्रसिद्ध त्रिदेव महादेव तथा धनोप शक्तिपीठ जाने वाले हजारों श्रद्धालु हर वर्ष गुजरते हैं। इसके बावजूद बस सेवा बहाल नहीं हो सकी।ग्रामीणों का कहना है कि यदि नियमित बसें शुरू हो जाएं तो गांवों की तस्वीर बदल सकती है।बस स्टैंड फिर आबाद होंगे। छोटे दुकानदारों,सब्जी विक्रेताओं, चाय-नाश्ते की दुकानों,होटल, स्टेशनरी और अन्य व्यवसायों को नया जीवन मिलेगा। युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा और गांवों की आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी।ग्रामीण बताते हैं कि वर्षों से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के समक्ष बस सेवा बहाल करने की चर्चाएं कर मांग रखी जाती रही है।उनका कहना है कि हर चुनाव में विकास की बातें होती हैं,लेकिन परिवहन जैसा मूलभूत विषय हर बार पीछे छूट जाता है। अब जब एक बार फिर चुनावी तैयारियां शुरू हो रही हैं,लोगों की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या इस बार यह दो दशक पुरानी मांग पूरी होगी।40 हजार से अधिक लोगों की यह मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं,बल्कि समान अवसर की मांग है। सार्वजनिक परिवहन केवल बस नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, व्यापार और सामाजिक विकास की जीवनरेखा है। यदि किसी क्षेत्र को वर्षों तक इससे वंचित रखा जाता है तो उसका असर केवल यात्राओं पर नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य पर पड़ता है।खामोर ग्राम पंचायत के अधीन सात राजस्व गांव हैं, इसके साथ ही आसपास के दर्जनों गांवों में आज तक रोडवेज बस की सुविधा नहीं हैं।खामोर गांव के एक तरफ मात्र 7 किमी दूर डाबला गांव से रोडवेज बसे गुजरती है वहीं दूसरी तरफ 8 किमी भीम उनियारा राष्ट्रीय राजमार्ग 148 डी नई राज्यास से बसे गुजरती है ग्रामीणों को बारिश हो या सर्दी या तपती गर्मी में मेहमानों ओर स्कूली बच्चों या जिला अस्पताल जाने वाले लोगों को डाबला से बस या नई राज्यास से शाहपुरा होकर भीलवाड़ा जिला मुख्यालय जाना पड़ता है।इस महंगाई की मार के बीच जहां पेट्रोल महंगा है वहां ग्रामीणों को निजी साधन से जिला मुख्यालय या तहसील मुख्यालय तक जाना पड़ता है जहां एक दिन में आमजन के काम पूरे नहीं होते 2 या तीन चक्कर काटने पड़ते हैं तब जाकर काश्तकारों के काम होते हैं ओर 300 से 400 रुपए पेट्रोल के 2 से 3 बार चक्कर काटने में लग जाते हैं।खामोर गांव के कई बुजुर्गों ने कहा की हमारी उम्र अस्सी से नब्बे वर्ष के आसपास हैं एवं जिंदगी पूरी होने की कगार पर हैं, लेकिन अभी तक हमने गांव में रोडवेज बस को नहीं देखा।ऐसे में हमारा यह सपना आजादी के बाद भी अधूरा है।
