माली समाज में बदली परंपरा की मिसाल, बेटी के सिर बंधी पिता की पगड़ी

बेटा नहीं था तो बड़ी बेटी सगुन ने संभाली पिता की जिम्मेदारी; मुखाग्नि से लेकर पगड़ी रस्म तक बेटी ने निभाए संस्कार

भीलवाड़ा|स्मार्ट हलचल|बदलते दौर में जब बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार और जिम्मेदारियां देने की बात होती है, तब भीलवाड़ा के माली समाज के एक परिवार ने इसे रस्मों और संस्कारों के जरिए जमीन पर उतारकर अनूठी मिसाल पेश की है। सड़क हादसे में असमय दुनिया छोड़ गए भरत कुमार माली के निधन के बाद उनके परिवार ने बेटे के अभाव में बड़ी बेटी सगुन को पगड़ी बंधवाकर पिता की सामाजिक जिम्मेदारियों का उत्तराधिकारी बनाया।
भरत कुमार माली (38) निवासी चांदली माताजी, हाल पटेल नगर विस्तार योजना, भीलवाड़ा का 29 जुलाई 2026 को सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। परिवार में उनके माता-पिता, पत्नी और दो बेटियां हैं। कोई पुत्र नहीं होने के बावजूद परिवार ने परंपरा को बेटी के आड़े नहीं आने दिया।
बेटी ने दी मुखाग्नि, अब सिर पर सजी जिम्मेदारी की पगड़ी
परिवार के अनुसार भरत की बड़ी बेटी सगुन ने पिता को मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद सामाजिक रीति के तहत पगड़ी रस्म में भी बेटे का इंतजार करने के बजाय परिवार ने बेटी को ही यह सम्मान देने का निर्णय लिया।
मृतक के पिता महावीर माली ने बताया कि माली सैनी महासभा राजस्थान प्रदेश के कोटा जिलाध्यक्ष मेवालाल बलांडिया, प्रदेश उपाध्यक्ष शंकरलाल सैनी (बूंदी), पूर्व पार्षद रघुनाथ माली और छोटूलाल माली की पहल पर समाज के प्रबुद्धजनों तथा परिवार की सहमति से सगुन को पगड़ी बंधवाई गई।
कई जिलों से पहुंचे समाजबंधु
पगड़ी रस्म में माली सैनी महासभा राजस्थान प्रदेश के प्रदेश उपाध्यक्ष धन्नालाल सैनी सहित कोटा, बूंदी, टोंक, अजमेर, जयपुर और भीलवाड़ा समेत विभिन्न जिलों से समाजबंधु मौजूद रहे। बेटी के सिर पर पगड़ी बंधने का दृश्य मौजूद लोगों के लिए भावुक भी था और सामाजिक बदलाव का संदेश देने वाला भी।
हरिद्वार नहीं, बीसलपुर में किया अस्थि विसर्जन
परिवार ने सिर्फ पगड़ी रस्म में ही बदलाव नहीं किया, बल्कि मृत्यु से जुड़ी अन्य परंपराओं को भी परिस्थितियों और वर्तमान जरूरतों के अनुरूप सरल बनाया। अस्थि विसर्जन हरिद्वार के बजाय गोकर्णेश्वर महादेव, बीसलपुर में किया गया।
बारहवें दिन पारंपरिक घड़ी दस्तूर के स्थान पर पुष्पांजलि कार्यक्रम रखा गया। परिवार ने मृत्यु भोज भी नहीं किया। बाहर से आने वाले समाजबंधुओं के लिए केवल सादा भोजन की व्यवस्था की गई।
रस्मों में बदलाव, समाज को बड़ा संदेश
भरत माली के परिवार ने बेटे-बेटी के भेद से ऊपर उठकर बेटी को अंतिम संस्कार से लेकर सामाजिक जिम्मेदारी तक समान अधिकार देकर यह संदेश दिया कि संस्कार किसी एक लिंग की जागीर नहीं हैं।
बेटी के हाथों मुखाग्नि, सिर पर पगड़ी और मृत्यु भोज जैसी परंपराओं में बदलाव के जरिए परिवार ने न केवल अनावश्यक सामाजिक खर्च से दूरी बनाई, बल्कि बदलते समय के साथ रीति-रिवाजों में सकारात्मक बदलाव की जरूरत को भी सामने रखा।
यह पहल महज एक परिवार का फैसला नहीं, बल्कि उस सोच को चुनौती है जिसमें पिता की जिम्मेदारी और संस्कार निभाने का अधिकार सिर्फ बेटे तक सीमित मान लिया जाता है।