“फाइल पूरी, प्रक्रिया पूरी, फिर पट्टा अधूरा क्यों? शाहपुरा में ‘शहरी सेवा’ पर बड़ा सवाल”
मूलचन्द पेसवानी, शाहपुरा।
स्मार्ट हलचल|नगर पालिका शाहपुरा इन दिनों कुछ ऐसी परिस्थितियों से गुजर रही है कि शहरवासियों को पहली बार यह सवाल सताने लगा हैकृआखिर नगर पालिका बनी किसलिए है? रियासतकाल से चली आ रही पालिका व्यवस्था को शाहपुरा की जनता ने हमेशा अपनी जरूरतों का सहारा माना। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि जिस व्यवस्था को जनता की सुविधा का केंद्र होना चाहिए, वही व्यवस्था जनता के लिए चक्कर, इंतजार और सवालों का केंद्र बनती दिखाई दे रही है।
सरकारी योजनाओं और अभियानों में अक्सर ‘जनसेवा सर्वाेपरि’ का नारा सुनाई देता है। लेकिन शाहपुरा में चल रहे शहरी सेवा शिविर के कुछ अनुभव इस नारे की असली परीक्षा लेते नजर आ रहे हैं। सरकार ने जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए शिविर लगाया, पट्टे जारी करने और लंबित मामलों को निपटाने का अभियान चलाया। राजनीतिक स्तर पर इसकी उपलब्धियां भी गिनाई गईं। जनप्रतिनिधि पहुंचे, पट्टे बांटे गए और तस्वीरें भी सामने आईं।
जिन लोगों को पट्टे मिले, उन्हें निश्चित रूप से बधाई और पालिका प्रशासन को साधुवाद। लेकिन असली सवाल उन लोगों का है जिनके आवेदन लिए गए, शुल्क जमा हुआ, फाइल चली, मौका निरीक्षण हुआ, ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी हुई, समाचार पत्रों में उजरदारी की सूचना तक प्रकाशित हो गईकृफिर भी पट्टा हाथ में नहीं आया।
यही वह जगह है जहां शहरी सेवा शिविर की पूरी अवधारणा सवालों के घेरे में खड़ी हो जाती है।
फाइल ‘प्रोसेस’ में है… लेकिन आखिर कितने दिन?
आवेदक पालिका में आवेदन करता है। निर्धारित शुल्क जमा करता है। उसे बताया जाता है कि फाइल प्रक्रिया में है। आवेदक सोचता हैकृचलो, सरकार ने शिविर लगाया है तो अब काम हो जाएगा।
फिर मौका निरीक्षण होता है। कागजी प्रक्रिया पूरी होती है। ऑनलाइन काम पूरा होता है। उजरदारी की सूचना प्रकाशित होती है। कोई आपत्ति भी सामने नहीं आती। इसके बाद आवेदक स्वाभाविक रूप से पूछता हैकृअब पट्टा कब मिलेगा?
यहीं से ‘सेवा’ का असली इम्तिहान शुरू होता है।
कभी नियमों का हवाला, कभी प्रक्रिया की बात, कभी इंतजार की सलाह और कभी यह एहसास कि जैसे आवेदक ने कोई असाधारण मांग कर दी हो। जनता का सवाल सीधा हैकृजब सरकार ने स्वयं सेवा शिविर लगाया है और प्रक्रिया पूरी करने के बाद पट्टा देने का उद्देश्य रखा है तो फिर अंतिम चरण में फाइलें क्यों अटक रही हैं?
क्या सेवा शिविर का मतलब सिर्फ आवेदन लेना है? या फिर उसका मतलब यह भी है कि आवेदन का अंतिम परिणाम आवेदक के हाथ में पहुंचाया जाए?
बैनर लगा है… शिविर कहां है?
शहरी सेवा शिविर के लिए नगर पालिका सभागार में बाकायदा व्यवस्था की गई है। बैनर भी लगा है। तारीख बदलती है, वार्ड संख्या बदलती है और सरकारी अभियान चलता रहता है।
लेकिन जनता पूछ रही हैकृशिविर में जनता की सुनवाई कौन करेगा?
आवेदक अपनी फाइल का स्टेटस पूछने पहुंचता है तो कई बार उसे ही फाइलों के ढेर में अपनी फाइल तलाशने की मशक्कत करनी पड़ती है। यह दृश्य किसी व्यंग्य से कम नहीं है।
जिस व्यवस्था का उद्देश्य नागरिक को सुविधा देना था, उसमें नागरिक ही अपनी फाइल का ‘लोकेशन ट्रैकर’ बन जाए तो फिर इसे सेवा कहें या व्यवस्था का नया प्रयोग?
सरकारी दफ्तर में फाइल का ढेर कोई नई बात नहीं है। लेकिन शहरी सेवा शिविर का उद्देश्य ही यही था कि फाइलें ढेर में न रहें, बल्कि जनता की समस्या समाधान की मेज तक पहुंचे।
पद खाली हैं तो हर काम क्यों नहीं रुकता?
पालिका स्तर पर अक्सर कर्मचारियों और अधिकारियों के पद रिक्त होने की बात सामने आती है। यह निश्चित रूप से व्यवस्था की गंभीर समस्या है। लेकिन जनता का सवाल यह भी है कि जब किसी काम को करना जरूरी होता है तो क्या पदों की कमी हमेशा बाधा बनती है?
सरकार को यदि अपने अभियान की सफलता दिखानी है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शिविर सिर्फ उद्घाटन और प्रचार तक सीमित न रहे।
जनता को भाषण नहीं, परिणाम चाहिए। बैनर नहीं, पट्टा चाहिए। आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए।
और सबसे बड़ी बातकृसम्मानजनक व्यवहार चाहिए।
राजनीति के लिए भी खतरे की घंटी
शहरी सेवा शिविर कोई सामान्य प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं है। इसके पीछे सरकार की राजनीतिक मंशा भी साफ हैकृजनता को सरकारी सेवाएं उसके द्वार तक पहुंचें, लोगों के पुराने काम पूरे हों और शासन के प्रति विश्वास मजबूत हो।
ऐसे में यदि शिविर के अंतिम दिनों में भी बड़ी संख्या में आवेदन लंबित रहते हैं तो इसका नुकसान केवल पालिका को नहीं, बल्कि सरकार और जनप्रतिनिधियों की छवि को भी उठाना पड़ेगा।
शाहपुरा के विधायक डॉ. लालाराम बैरवा को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जनता के सामने आंकड़े रखने चाहिए।
कितने आवेदन आए?
कितने पट्टे बने?
कितने आवेदन लंबित हैं?
कितनी फाइलों की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है?
कितने मामलों में आपत्तियां हैं?
और कितने ऐसे आवेदन हैं जिनमें प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद पट्टे जारी नहीं हुए?
इन सवालों के सार्वजनिक जवाब से ही शहरी सेवा शिविर की वास्तविक सफलता सामने आएगी।
प्रशासक का राज, तो जवाबदेही भी उसी व्यवस्था की
नगर पालिका में फिलहाल निर्वाचित बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासक व्यवस्था लागू है। ऐसे समय में प्रशासनिक जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
जनता यह जानना चाहती है कि शिविर में लंबित मामलों की नियमित समीक्षा हो रही है या नहीं? फाइलें किस स्तर पर अटकी हैं? किस कारण से प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी परिणाम नहीं मिल रहा?
यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ सवाल नहीं है। यह पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल है।
और इस सवाल का जवाब भी व्यवस्था को ही देना होगा।
जनता को ‘सेवा’ नहीं, सेवा का परिणाम चाहिए
शाहपुरा की जनता बहुत कुछ सहन कर सकती है, लेकिन अपने ही काम के लिए बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाना और हर बार नई उम्मीद लेकर लौटना अब आसान नहीं है।
सरकार ने शिविर लगाया है तो उसे सार्थक भी बनाना होगा।
शिविर के अंतिम दिनों में प्रशासन को लंबित फाइलों की वार्डवार समीक्षा करनी चाहिए। पूर्ण दस्तावेज वाले मामलों को प्राथमिकता से निपटाना चाहिए और जहां कोई कमी है, वहां आवेदक को स्पष्ट रूप से लिखित जानकारी देनी चाहिए कि कमी क्या है और समाधान कैसे होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता किसी अधिकारी या कर्मचारी की कृपा की पात्र नहीं है। सरकारी सेवा उसका अधिकार है।
शाहपुरा में अब जरूरत है कि शहरी सेवा शिविर की फोटो से आगे बढ़कर उसकी फाइलों का एक्स-रे किया जाए।
कितनी फाइलें आईं, कितनी चलीं और कितनी मंजिल तक पहुंचींकृयह हिसाब जनता के सामने आना चाहिए।
वरना सवाल उठेगा कि शिविर जनता की सुविधा के लिए लगा था या सिर्फ सरकारी फाइलों में एक और उपलब्धि जोड़ने के लिए?
शाहपुरा को बैनर वाला शिविर नहीं चाहिए। शाहपुरा को परिणाम वाला शिविर चाहिए।
और अगर जनता को अपनी ही फाइल ढूंढनी पड़े, अपना ही स्टेटस पूछना पड़े और अपने ही काम के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ें तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक हैकृ
‘शहरी सेवा शिविर’ में सेवा आखिर किसकी हो रही है?
यह सवाल आज प्रशासन से है। कल राजनीति से भी पूछा जाएगा। और आने वाले चुनावों में जनता इसका जवाब अपने तरीके से देगी।
