राजपुरा में मौत के साये में पढ़ रहे नौनिहाल: आंगनबाड़ी की छत से निकल रही सरिया, प्लास्टर गिरा, विभाग मौन

गुरला:-स्मार्ट हलचल|ग्राम पंचायत रामपुरिया के राजपुरा में 3 से 6 साल के मासूमों को जान जोखिम में डालकर आना पड़ता आंगनबाड़ी है राजस्थान सरकार एक तरफ पढ़ेगा राजस्थान, बढ़ेगा राजस्थान और हर बच्चे को सुरक्षित बचपन का नारा दे रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग आंगनबाड़ी केंद्रों को बच्चों का दूसरा घर बताता है। लेकिन धरातल पर हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। भीलवाड़ा जिले के *ग्राम पंचायत रामपुरिया के राजपुरा* का आंगनबाड़ी केंद्र इसका जीता-जागता सबूत है। यहां की छत से प्लास्टर उखड़कर गिर रहा है, लोहे की सरिया बाहर निकल आई हैं, दीवारों में दरारें हैं। और इसी मौत के साये में रोज 12-14 नौनिहाल पढ़ने को मजबूर हैं। यदि समय रहते प्रशासन नहीं जागा तो किसी भी दिन एक बड़ा हादसा हो सकता है।छत का प्लास्टर पूरी तरह से उखड़ चुका है। जगह-जगह सीमेंट के नीचे की लोहे की सरिया पूरी तरह से खुली हुई दिख रही हैं, जिन पर जंग लगा हुआ है।छत में जगह-जगह बड़ी-बड़ी दरारें हैं, जिससे पानी रिस रहा है।
प्लास्टर का मलबा नीचे फर्श पर बार बार गिरता है यह किसी पुराने खंडहर की फोटो नहीं, बल्कि उस आंगनबाड़ी केंद्र की है जहां सरकार द्वारा बच्चों को पोषाहार, प्रारंभिक शिक्षा और स्वास्थ्य जांच की सुविधा दी जाती है। *नौनिहालों को जान जोखिम में डालकर भेजना पड़ता है आंगनबाड़ी*
राजपुरा आंगनबाड़ी केंद्र में कुल 16 बच्चे नामांकित हैं। रोजाना 12 से 14 बच्चे आते हैं। इनकी उम्र 3 साल से 6 साल के बीच है। इसके अलावा 9 गर्भवती महिलाएं और 3 धात्री महिलाएं भी यहां पोषाहार और जांच के लिए आती हैं।स्थानीय अभिभावक बताते हैं, “हम अपने बच्चों को सुबह आंगनबाड़ी भेजते तो हैं, पर मन में डर लगा रहता है। *आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की पीड़ा – “हम भी डर-डर कर ड्यूटी करते हैं”*
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता राधा देवी गुर्जर ने बताया, “मैं पिछले 12 साल से यहां कार्यरत हूं। पिछले 3 साल से छत की हालत खराब है। पिछले एक साल से तो बहुत ज्यादा खराब हो गई है। रोज थोड़ा-थोड़ा प्लास्टर गिरता है। मैंने सीडीपीओ ऑफिस, सुपरवाइजर और सरपंच साहब को कही बार लिखित में दिया है। मौखिक तो हर मीटिंग में बताती हूं। कहते हैं – बजट नहीं है आएगा तो देखेंगे। अब मैं क्या करूं? नौकरी करनी है तो डर-डर कर करनी पड़ रही है। बच्चों को अंदर से बुलाना तो दूर, बिठाने में भी डर लगता है। बारिश में तो पानी टपकता है, इसलिए पूरा सामान भी खराब हो जाता है
*जिम्मेदार कौन? विभागों में फुटबॉल*
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी लापरवाही जिम्मेदारी तय न होना है।इस फुटबॉल में पिस रहे हैं मासूम बच्चे।राजपुरा आंगनबाड़ी केंद्र की यह जर्जर छत सिर्फ एक भवन की कहानी नहीं है, यह सिस्टम की लापरवाही की कहानी है। हम 16 बच्चों की जान को आंगनबाड़ी की मरम्मत के लिए दांव पर लगा रहे हैं