2017 से 2025 के बीच 35 आवेदनों में कथित अनियमितताओं का उल्लेख, छह नाम एफआईआर में दर्ज; दस्तावेजों के सत्यापन और सरकारी राशि के भुगतान की प्रक्रिया जांच के दायरे में
चित्तौड़गढ़, स्मार्ट हलचल। निम्बाहेड़ा नगर परिषद से जुड़ी दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM) की कौशल प्रशिक्षण योजना में कथित फर्जी एवं कूटरचित शैक्षणिक दस्तावेजों के इस्तेमाल का मामला सामने आया है। पुलिस थाना कोतवाली निम्बाहेड़ा में दर्ज एफआईआर संख्या 0311/2026 के बाद सरकारी योजनाओं के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों के सत्यापन और उनके आधार पर राशि जारी किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
मामला वर्ष 2017 से 2025 के बीच का बताया जा रहा है। एफआईआर के साथ प्रस्तुत दस्तावेजों में 35 आवेदन/विद्यार्थियों से संबंधित कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है। इनमें आवेदन पत्रों में दर्ज जानकारी और अंकतालिकाओं अथवा अन्य रिकॉर्ड में कथित अंतर सामने आने का दावा किया गया है। कुछ मामलों में जन्मतिथि में अंतर तो कुछ में अंकतालिकाओं और संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणिकता पर सवाल उठाए गए हैं।
आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर शिकायत
प्रकरण में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से प्राप्त दस्तावेजों को महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। शिकायत के साथ इन दस्तावेजों की प्रतियां पुलिस को उपलब्ध कराए जाने का उल्लेख है। ऐसे में जांच का एक प्रमुख बिंदु यह रहेगा कि आवेदन के समय प्रस्तुत दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया और यदि रिकॉर्ड में कोई अंतर था तो उसके बावजूद प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ी।
एफआईआर में छह नामों का उल्लेख
एफआईआर में देवाशीष महर्षि, अजय तोसावड़ा, मनीष शर्मा, तत्कालीन आयुक्त नगर परिषद निम्बाहेड़ा, मेनेजर तथा डीएम डे-एनयूएलएम के नामों का उल्लेख किया गया है। प्रकरण के तार स्वायत्त शासन विभाग, राजस्थान सरकार जयपुर तथा एमएसएमई मेरठ से जुड़े होने का भी उल्लेख सामने आया है।
हालांकि, एफआईआर में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज होना अपने आप में अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और आरोपों की वास्तविकता का निर्धारण पुलिस जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।
सरकारी राशि का रिकॉर्ड भी जांच का अहम बिंदु
प्रकरण में यदि दस्तावेजों की जांच के दौरान अनियमितता प्रमाणित होती है तो कथित कूटरचित दस्तावेजों के अलावा सरकारी योजना के तहत जारी राशि की भी जांच महत्वपूर्ण होगी। पुलिस जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि संबंधित आवेदनों के आधार पर कितनी राशि स्वीकृत अथवा वितरित हुई, राशि किन लाभार्थियों तक पहुंची और भुगतान के लिए कौन-कौन से दस्तावेज सत्यापित किए गए।
मूल रिकॉर्ड की जांच से सामने आएगी वास्तविक स्थिति
मामले में मूल अंकतालिकाओं, संबंधित शिक्षण संस्थानों के रिकॉर्ड, आवेदन पत्रों, सत्यापन रिपोर्ट, भुगतान विवरण और नगर परिषद से जुड़ी सरकारी फाइलों की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दस्तावेजों में दर्ज कथित अंतर किस स्तर पर और किस कारण से सामने आए।
35 आवेदनों से जुड़े दस्तावेजों का उल्लेख होने के कारण जांच का दायरा भी महत्वपूर्ण हो गया है। अब अनुसंधान के दौरान यह सामने आने की संभावना है कि कथित अनियमितताएं व्यक्तिगत स्तर तक सीमित थीं या प्रक्रिया में अन्य आवेदन भी प्रभावित हुए।
फिलहाल पूरे मामले की वास्तविकता पुलिस अनुसंधान और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगी। एफआईआर में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होना अभी जांच का विषय है।
