आदिवासी महिलाओं को घूंघट की ओट से पहचान तक: रंजनबेन चौहान की पहल, कच्छ की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प

 

‘सखी मंडल’ के जरिए महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर लाकर शिक्षा, हुनर और स्वरोजगार से जोड़ने की पहल

✍️राकेश मीणा

गांधीधाम/कच्छ। स्मार्ट हलचल|समाज में महिलाओं की भूमिका केवल परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है। यदि उन्हें अवसर, शिक्षा, प्रशिक्षण और सही मार्गदर्शन मिले तो वे परिवार के साथ-साथ समाज और देश के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसी सोच के साथ भारतीय आदिम जाति सेवक संघ की राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष रंजनबेन चौहान ने कच्छ के गांधीधाम में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक नई पहल शुरू की है। इसके तहत महिला सेल्फ हेल्प ग्रुप ‘सखी मंडल’ की स्थापना की गई है।

रंजनबेन चौहान का कहना है कि महिलाओं को घूंघट की ओट में सीमित रखने के बजाय उन्हें शिक्षा, हुनर, रोजगार और सामाजिक पहचान के अवसर देने होंगे। जब महिला अपने हुनर के दम पर आर्थिक रूप से मजबूत होगी तो उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा और परिवार में भी उसकी भूमिका और निर्णय क्षमता मजबूत होगी।

घूंघट से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाने की कोशिश

ग्रामीण और पारंपरिक समाज में आज भी अनेक महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अपनी प्रतिभा और हुनर को सामने नहीं ला पातीं। ऐसी महिलाओं को आगे लाकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना ‘सखी मंडल’ का प्रमुख उद्देश्य है।

रंजनबेन चौहान ने कहा कि घूंघट हटाना केवल चेहरे से पर्दा हटाना नहीं, बल्कि सोच और संभावनाओं के दरवाजे खोलना है। महिलाओं को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि वे भी अपने निर्णय ले सकती हैं, अपना व्यवसाय चला सकती हैं और समाज में अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।

हुनर को रोजगार से जोड़ने का प्रयास

‘सखी मंडल’ के माध्यम से महिलाओं को स्थानीय स्तर पर ऐसे कामों का प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिनसे वे घर से या छोटे स्तर पर अपना रोजगार शुरू कर सकें। इनमें कच्छी हस्तवणाट, कच्छी भरत-गुंथण, सिलाई-कढ़ाई, फास्ट फूड, ब्यूटी पार्लर सहित विभिन्न गृह उद्योग शामिल हैं।

इसके साथ ही छोटी-बड़ी मशीनों से संचालित घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने की योजना है। उद्देश्य यह है कि महिलाओं को केवल प्रशिक्षण देकर छोड़ने के बजाय उनके हुनर को उत्पादन, बाजार और आमदनी से जोड़ा जाए।

शिक्षा और प्रशिक्षण पर भी रहेगा जोर

रंजनबेन चौहान ने बताया कि महिला सशक्तिकरण का आधार केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि शिक्षा और जागरूकता भी है। इसलिए ‘सखी मंडल’ के माध्यम से शैक्षणिक प्रशिक्षण केंद्र, रोजगारपरक प्रशिक्षण और सामाजिक जागरूकता से जुड़ी गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

महिलाओं को स्वास्थ्य, स्वच्छता और आरोग्य के प्रति जागरूक करने के साथ सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने पर भी जोर रहेगा। उनका मानना है कि शिक्षित, स्वस्थ और आत्मनिर्भर महिला ही मजबूत परिवार और मजबूत समाज की नींव रख सकती है।

जहां जरूरत होगी, वहां बनेंगे ‘स्वनिर्भर केंद्र’

रंजनबेन चौहान ने कहा कि महिलाओं की जरूरत केवल गांधीधाम तक सीमित नहीं है। जहां भी आवश्यकता महसूस होगी, वहां स्वनिर्भर केंद्र स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा। इन केंद्रों में महिलाओं को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और स्वरोजगार के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने की योजना है।

इन केंद्रों को स्थानीय महिलाओं की जरूरत के अनुसार विकसित किया जाएगा, ताकि किसी महिला को अपने हुनर को रोजगार में बदलने के लिए दूर न जाना पड़े।

‘सखी मंडल’ बनेगा महिलाओं की नई पहचान का मंच

रंजनबेन चौहान के अनुसार ‘सखी मंडल’ केवल एक सेल्फ हेल्प ग्रुप नहीं, बल्कि महिलाओं को घरेलू सीमाओं से सामाजिक भागीदारी और आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने का मंच बनाने का प्रयास है।

उनका कहना है कि समाज की महिलाओं को आगे बढ़ाना किसी एक परिवार या एक महिला का विकास नहीं है। जब एक महिला आत्मनिर्भर बनती है तो उसका पूरा परिवार मजबूत होता है और जब बड़ी संख्या में महिलाएं आत्मनिर्भर होती हैं तो पूरे समाज की तस्वीर बदल सकती है।

रंजनबेन चौहान का संदेश साफ है—महिलाओं को सहारे की नहीं, अवसर और मंच की जरूरत है। हुनर उनके भीतर है, जरूरत केवल उसे पहचान देने की है।

घूंघट से पहचान तक का यह सफर कच्छ की महिलाओं के लिए सामाजिक बदलाव की नई शुरुआत बन सकता है।

जय जोहार | जय आदिवासी 🏹🙏