निकाय चुनाव का रण शुरू: पहले दिन निर्दलीयों ने ठोकी ताल, भाजपा-कांग्रेस में टिकट की ‘टिकटिकी’ तेज

महेन्द्र नागौरी

बगावत के साये में टिकटों का गणित, निष्ठावान कार्यकर्ता पूछ रहे—“पार्टी के लिए खड़े रहे तो आखिर मिला क्या?”

भीलवाड़ा ।स्मार्ट हलचल|राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के 10,245 वार्डों में निकाय चुनाव का सियासी रण गुरुवार से नामांकन के साथ शुरू हो गया। नामांकन की शुरुआत के साथ ही चुनावी तस्वीर का पहला रंग भी सामने आ गया—पार्टी के झंडे अभी शांत हैं, लेकिन निर्दलीयों ने मैदान में उतरकर ताल ठोक दी है।
भाजपा और कांग्रेस ने अधिकांश वार्डों में अभी प्रत्याशियों के नाम घोषित नहीं किए हैं। ऐसे में टिकट के दावेदार पार्टी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं और नेताओं के दरवाजे खटखटा रहे हैं। दूसरी ओर, टिकट नहीं मिलने की आशंका वाले कई चेहरे पहले ही निर्दलीय मैदान में उतरने की रणनीति बनाने लगे हैं।
पांच दिन का नामांकन, लेकिन हाथ में सिर्फ तीन दिन—क्यों?
नामांकन के लिए कागज पर पांच दिन का समय है, लेकिन व्यवहार में उम्मीदवारों को महज तीन दिन ही मिलेंगे। 28 अगस्त को रक्षाबंधन और 30 अगस्त को रविवार होने के कारण 27, 29 और 31 अगस्त को ही नामांकन दाखिल किए जा सकेंगे।
यानी भाजपा-कांग्रेस के सामने टिकट वितरण और संभावित बगावत को साधने के लिए समय बेहद कम है। “एक टिकट से कितने चेहरे नाराज होंगे और नाराज चेहरों में से कितने बागी बनेंगे?” यही सवाल दोनों दलों के रणनीतिकारों के सामने सबसे बड़ा है।
भाजपा-कांग्रेस के दफ्तर बने ‘सियासी अड्डे’
टिकट वितरण को लेकर दोनों प्रमुख दलों में लॉबिंग तेज है। दावेदार अपने-अपने राजनीतिक आकाओं, स्थानीय नेताओं और संगठन के प्रभावशाली पदाधिकारियों की शरण में पहुंच रहे हैं।
किस वार्ड में कौन मजबूत है? किसके पीछे संगठन की ताकत है? कौन जीताऊ चेहरा है? और कौन सिर्फ सिफारिश के दम पर टिकट मांग रहा है? इन सवालों पर बंद कमरों में मंथन चल रहा है।
प्रदेशभर में करीब एक लाख दावेदारों द्वारा आवेदन किए जाने के दावों के बीच टिकट वितरण किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक वार्ड, कई दावेदार और टिकट सिर्फ एक—तो बाकी दावेदार जाएंगे कहां?
टिकट से ज्यादा डर ‘बगावत’ का
निकाय चुनाव में असली सियासत टिकट घोषित होने के बाद शुरू होगी। भाजपा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा खतरा विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही घर से निकलने वाला बागी उम्मीदवार बन सकता है।
स्थानीय चुनावों में एक मजबूत निर्दलीय प्रत्याशी पूरे वार्ड का समीकरण पलटने की क्षमता रखता है। कई वार्डों में जीत-हार का अंतर कुछ दर्जन वोटों तक सिमट जाता है। ऐसे में टिकट कटने के बाद नाराज दावेदार का निर्दलीय मैदान में उतरना अधिकृत प्रत्याशी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
“टिकट एक को मिलेगा, लेकिन क्या बाकी चेहरे पार्टी के साथ खड़े रहेंगे?”
‘निष्ठावान कार्यकर्ता का नंबर कब आएगा?’
सत्तारूढ़ दल से जुड़े कार्यकर्ताओं में टिकट वितरण को लेकर अंदरखाने बेचैनी दिखाई दे रही है। वर्षों से संगठन के साथ खड़े कार्यकर्ताओं का सवाल है—“पार्टी के लिए झंडा उठाते रहे, बूथ संभालते रहे, हर चुनाव में साथ खड़े रहे… तो टिकट की बारी आने पर हमारी परीक्षा क्यों?”
कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि चुनावी राजनीति में मजबूत वोट बैंक या व्यक्तिगत प्रभाव रखने वाले चेहरों को कई बार संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं पर तरजीह मिल जाती है।
इसी संदर्भ में कार्यकर्ताओं की जुबान पर लादूलाल पितलिया, उदयलाल भड़ाना और ओम नारानिवाल जैसे नामों के उदाहरण भी चर्चा में हैं। सवाल उठ रहा है—“अगर बगावत या मजबूत वोट बैंक के बाद भी राजनीतिक चेहरों के लिए रास्ते खुले रहते हैं, तो वर्षों से निष्ठा निभाने वाले कार्यकर्ता के लिए टिकट की कसौटी आखिर क्या है?”
‘जीताऊ’ चेहरा भारी या ‘निष्ठावान’ कार्यकर्ता?
टिकट वितरण के साथ भाजपा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक द्वंद्व यही है—निष्ठा या जीत की गारंटी?
पार्टी नेतृत्व के सामने सवाल है कि वर्षों से संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता को मौका दिया जाए या ऐसे चेहरे को मैदान में उतारा जाए, जिसका व्यक्तिगत जनाधार अधिक हो।
लेकिन “जीत के लिए लिया गया चेहरा अगर पार्टी का पुराना कार्यकर्ता ही नाराज कर दे तो क्या होगा?” यही वह समीकरण है जो चुनाव के बाद नहीं, टिकट बंटने के तुरंत बाद सामने आएगा।
तीन दिन का नामांकन, प्रचार के लिए भी दौड़
नामांकन प्रक्रिया के बाद जांच, नाम वापसी और चुनाव चिन्ह आवंटन की प्रक्रिया तेजी से पूरी होगी। प्रत्याशियों को प्रचार के लिए भी सीमित समय मिलेगा।
ऐसे में जिस उम्मीदवार को पार्टी का टिकट अंतिम दौर में मिलेगा, उसके सामने समय के साथ दौड़ लगाने की चुनौती होगी। “टिकट देर से मिला तो क्या प्रचार में पिछड़ना तय है?” यह सवाल भी दावेदारों के बीच चर्चा में है।
यानी इस चुनाव में सिर्फ टिकट हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा—टिकट मिलते ही कितनी तेजी से मैदान संभाला जाता है, यही जीत की दिशा तय कर सकता है।
बुजुर्ग मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने की चुनौती
इस बार लोकसभा चुनाव की तरह बुजुर्ग और बीमार मतदाताओं के लिए घर से मतदान की सुविधा नहीं होगी। ऐसे मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचकर वोट डालना होगा।
इससे प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों के चुनावी प्रबंधन की भूमिका और बढ़ जाएगी। कौन अपने बुजुर्ग मतदाताओं को बूथ तक पहुंचा पाता है और कौन नहीं? मतदान के दिन यह भी चुनावी गणित का अहम हिस्सा बन सकता है।
असली सियासी बारूद टिकट बंटने के बाद फूटेगा
पहले दिन निर्दलीयों ने अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है। अब निगाहें भाजपा और कांग्रेस की टिकट सूची पर टिकी हैं। टिकट घोषित होते ही कई वार्डों में राजनीतिक समीकरण बदलने की पूरी संभावना है।
कौन अधिकृत प्रत्याशी बनेगा? कौन टिकट से वंचित होकर बागी होगा? किसके साथ संगठन खड़ा होगा? कौन व्यक्तिगत जनाधार के भरोसे मैदान में उतरेगा? और कौन पार्टी के भीतर रहकर नाराजगी जताएगा और कौन बाहर निकलकर पार्टी को ही चुनौती देगा?
भीलवाड़ा में इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस तक सीमित रहने के आसार नहीं हैं। कई वार्डों में तीसरा कोण—निर्दलीय और बागी प्रत्याशी—दोनों प्रमुख दलों का गणित बिगाड़ सकता है।
फिलहाल चुनावी रण में पहली ताल निर्दलीयों ने ठोकी है, लेकिन असली सियासी धमाका टिकट बंटने के बाद होगा। सवाल सिर्फ यह है—टिकट किसे मिलेगा और टिकट कटने के बाद कौन किसके खिलाफ ताल ठोकेगा?