डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर टिकी दोनों दलों की चुनावी संभावनाएं, 14 सितंबर को परिणामों से खुलेगा जनता का फैसला
अनिल कुमार खींची
ब्यावर। स्मार्ट हलचल|नगर निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस की ओर से प्रत्याशियों की घोषणा के बाद दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों में असंतोष और विरोध के स्वर सामने आने लगे हैं। टिकट वितरण के बाद कार्यकर्ताओं एवं दावेदारों के बीच उपजे विरोध को लेकर अब दोनों दलों के सामने डैमेज कंट्रोल की चुनौती खड़ी हो गई है। सोशल मीडिया से लेकर वार्डों और चुनावी मैदान तक टिकटों को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक विजेन्द्र प्रजापति ‘जॉली’ के अनुसार, चुनाव में टिकट वितरण के बाद उठे विरोध के वास्तविक असर का पता 14 सितंबर को सामने आने वाले परिणामों से होगा। उन्होंने अपने राजनीतिक विश्लेषण में कहा कि जिस दल का डैमेज कंट्रोल मजबूत रहेगा, उसे चुनावी मैदान में इसका लाभ मिल सकता है।
भाजपा में विधायक रावत के रणनीतिक प्रभाव की चर्चा
भाजपा के टिकट वितरण को लेकर विधायक शंकरसिंह रावत की रणनीतिक भूमिका को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं हैं। विश्लेषण के अनुसार, टिकट वितरण में विधायक रावत का प्रभाव प्रमुख रूप से दिखाई दिया है। वहीं भाजपा जिलाध्यक्ष आशीष सांड की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक हलकों में अलग-अलग चर्चाएं सामने आ रही हैं।
टिकट वितरण के बाद कुछ वार्डों में पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति बनी है। ऐसे में अब पार्टी नेतृत्व के सामने बागी दावेदारों और नाराज कार्यकर्ताओं को साधने की चुनौती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधायक रावत के सामने अपने अनुभव और संगठनात्मक रणनीति के जरिए असंतोष को नियंत्रित कर पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
कांग्रेस में टिकट चयन को लेकर उठे सवाल
वहीं कांग्रेस में भी टिकट वितरण के बाद कुछ वार्डों में विरोध के स्वर तेज हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषण में कांग्रेस की टिकट प्रक्रिया को लेकर जिलाध्यक्ष किशोर चौधरी, ब्लॉक अध्यक्ष अजय शर्मा और आशिषपाल पदावत सहित अन्य स्थानीय नेताओं की भूमिका का उल्लेख किया गया है।
टिकट वितरण से पहले कांग्रेस कार्यकर्ताओं में दिखाई दे रहे अनुशासन और एकजुटता को लेकर सकारात्मक माहौल था, लेकिन प्रत्याशियों की सूची सामने आने के बाद कुछ स्थानों पर असंतोष खुलकर सामने आया। कई दावेदारों और समर्थकों द्वारा टिकट चयन पर सवाल उठाए जाने की चर्चा है।
जिताऊ प्रत्याशी की जगह दूसरे नामों को लेकर नाराजगी
कांग्रेस के कुछ वार्डों में पार्टी पैनल में शामिल संभावित जिताऊ प्रत्याशियों को टिकट नहीं मिलने और अन्य नामों को प्राथमिकता दिए जाने को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराजगी की बात सामने आ रही है। पार्टी के भीतर यह चर्चा भी है कि कुछ वार्डों में स्थानीय स्तर पर मजबूत दावेदारों की अनदेखी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
राजनीतिक विश्लेषण में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि पैनल में मजबूत प्रत्याशी उपलब्ध थे तो कुछ वार्डों में बाहरी अथवा अपेक्षाकृत नए चेहरों को मौका देने के पीछे क्या रणनीति रही। हालांकि इन दावों पर कांग्रेस की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
एक-एक वोट और एक-एक वार्ड महत्वपूर्ण
ब्यावर नगर परिषद के 60 वार्डों में होने वाले चुनाव में बहुमत हासिल करने के लिए प्रत्येक वार्ड महत्वपूर्ण है। ऐसे में टिकट वितरण से उपजे असंतोष को समय रहते नियंत्रित करना दोनों दलों के लिए जरूरी माना जा रहा है। बागी प्रत्याशियों का मैदान में उतरना अथवा नाराज कार्यकर्ताओं का निष्क्रिय होना किसी भी पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के समीकरण बिगाड़ सकता है।
अब चुनावी मुकाबला केवल प्रत्याशियों के बीच ही नहीं, बल्कि दोनों दलों के डैमेज कंट्रोल मैनेजमेंट की भी परीक्षा बन गया है। आगामी दिनों में कौन-सा दल अपने असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को मनाने और बागियों को नियंत्रित करने में सफल रहता है, इसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है।
14 सितंबर को आने वाले वार्डवार परिणाम और 21 सितंबर को सामने आने वाला राजनीतिक परिदृश्य ब्यावर की स्थानीय राजनीति में टिकट वितरण के फैसलों और दोनों प्रमुख दलों की रणनीति की वास्तविक परीक्षा माने जा रहे हैं।
