महिलाओं ने हर्षौल्लास एवं पारंपरिक मंगलगीतों से मनाया वत्स द्वादशी का त्योहार…

 

गौ माता को लुगड़ी ओढ़ाई,दही-चावल से तिलक लगाया, चने-गुड़ का भोग लगाकर उतारी आरती…गोबर से औघड़ महा

किशन वैष्णव

शाहपुरा। स्मार्ट हलचल।बछ बारस का दिन महिलाओं के लिए ऐसा पर्व, जिसमें पूजा के साथ परिवार, संतान और गौवंश के प्रति सम्मान की भावना जुड़ी हुई है। खामोर सहित क्षेत्र के बिलिया, तहनाल,नई राज्यास, घरटा,डाबला क्षेत्र में बछ बारस पर महिलाओं ने गौ माता और बछड़े को पूजा के लिए तैयार किया। दही-चावल, कुमकुम से तिलक लगाया, लच्छा बांधा, लुगड़ी और कपड़े का बटका ओढ़ाया,आरती उतारी और चने-गुड़ का भोग लगाया। इसके बाद महिलाओं ने बछ बारस की पारंपरिक कथा सुनी।ग्रामीण महिलाओं के अनुसार बछ बारस को वत्स द्वादशी भी कहा जाता है।वत्स का अर्थ बछड़ा होता है। महिलाओं के लिए यह पर्व विशेष रूप से परिवार और संतान के मंगल से जुड़ा माना जाता है।ग्रामीण महिला शीला वैष्णव ने बताया कि लोकमान्यता के अनुसार इस दिन गौ माता और बछड़े की पूजा कर महिलाएं संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।इस पर्व में महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहती है। घर की पूजा की तैयारी से लेकर गौ माता और बछड़े के पूजन,आरती और कथा श्रवण तक की परंपराएं महिलाएं ही निभाती हैं। कई घरों में बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को पूजा की विधि और पर्व से जुड़ी मान्यताओं के बारे में बताती हैं।ग्रामीण शीला जाट के अनुसार बछ बारस पर गौ माता के साथ उसके बछड़े की पूजा की गई इसके पीछे धार्मिक मान्यता के साथ ग्रामीण जीवन से जुड़ा महत्व भी है। गाय को भारतीय लोकपरंपरा में मातृस्वरूप माना गया है और बछड़ा गौवंश की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।इसी मान्यता के चलते महिलाएं गौ माता और बछड़े का पूजन कर उनके प्रति सम्मान प्रकट करती हैं। साथ ही परिवार और संतान के मंगल की प्रार्थना करती हैं। गांवों में पशुधन हमेशा से परिवार की जीवनशैली और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, इसलिए इस पर्व का ग्रामीण समाज में विशेष महत्व बना हुआ है।

बछ बारस के दिन महिलाएं इस दिन गाय के दूध से बनी वस्तुओं का सेवन नहीं करतीं। दूध, दही, घी सहित दूध से बनी चीजों से पूरे दिन परहेज रखा जाता है। पर्व के नियमों का पालन करते हुए महिलाएं पूजा और कथा श्रवण करती हैं।बछ बारस के अवसर पर गाय व बछड़ा पूजन के बाद महिलाएं एक स्थान पर एकत्रित हुई और परंपरा के अनुसार गोबर से घोल कुएं जैसा औघड़ महाराज का स्वरूप बनाया। इसमें पानी भरकर दही,कुमकुम, लच्छा, गुड़ और दीपक से विधि-विधान से पूजा की। पूजा के बाद महिलाओं ने बछ बारस की कथा सुनी। कथा पूर्ण होने पर बच्चों से तालाब स्वरूप औघड़ महाराज को तुड़वाने की परंपरा निभाई गई। इसके बाद महिलाओं ने उसी स्थान पर फिर से गोबर से औघड़ महाराज का स्वरूप बनाया।गाय व बछड़ा पूजते समय गांव की अनेक महिलाएं मौजूद रही