( महेन्द्र नागौरी)
अंतिम दिन वोट की खातिर चरणवंदना… अब खामोश मतदाता सुनाएगा फैसला
भीलवाड़ा में भाजपा-
कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर, निर्दलीयों ने बिगाड़ा सीधा मुकाबले का गणित; ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ और ‘जनसेवा बनाम सियासत’ की चर्चाओं के बीच 9 सितम्बर को ईवीएम में बंद होगा प्रत्याशियों का भविष्य
भीलवाड़ा| स्मार्ट हलचल|नगर निगम चुनाव का प्रचार थमने से पहले मंगलवार को भीलवाड़ा का चुनावी रण पूरी तरह गर्म रहा। भाजपा, कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशियों ने अंतिम दिन अपनी पूरी ताकत झोंक दी। सुबह से देर शाम तक वार्डों की गलियों में प्रत्याशियों की दस्तक, समर्थकों की आवाजाही और मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क का दौर चलता रहा। पांच साल के लिए पार्षद बनने की दौड़ में शामिल उम्मीदवारों ने घर-घर पहुंचकर हाथ जोड़े, बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया और अपने पक्ष में मतदान की अंतिम अपील की।
चुनाव प्रचार के अंतिम दिन का नजारा यह बताने के लिए काफी था कि मैदान में मुकाबला आसान नहीं है। जिन प्रत्याशियों ने पूरे चुनाव अभियान में बड़े-बड़े दावे किए, उन्हें अंतिम दिन एक-एक मतदाता तक पहुंचने की जरूरत महसूस हुई। कई जगह प्रत्याशियों ने परिवारों के साथ बैठकर बातचीत की तो कहीं वार्ड की समस्याओं और विकास के मुद्दों को लेकर भरोसा दिलाया गया।
अब न नारा चलेगा, न भाषण… चलेगा सिर्फ वोट
प्रचार का शोर थमते ही चुनाव का असली और सबसे खामोश दौर शुरू हो गया है। अब प्रत्याशी खुले तौर पर वोट नहीं मांग सकेंगे, लेकिन राजनीतिक रणनीति का पहिया अंदरखाने घूमता रहेगा।
किस मोहल्ले में किसका प्रभाव है?
कौन सा परिवार किस तरफ झुक रहा है?
किस बूथ पर किस प्रत्याशी की पकड़ मजबूत है?
और सबसे अहम—कितने मतदाता घर से निकलकर वोट डालेंगे?
इन सवालों के जवाब ही 9 सितम्बर के मतदान में जीत-हार का गणित तय करेंगे।
‘स्थानीय बनाम बाहरी’ की चर्चा ने भी पकड़ा जोर
चुनावी मैदान में कई वार्डों में प्रत्याशियों की स्थानीय पहचान भी चर्चा का विषय बनी। मतदाताओं के बीच ‘स्थानीय कौन और वार्ड के सुख-दुख में साथ कौन?’ जैसे सवाल उठते रहे। कुछ जगह स्थानीयता को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश हुई तो कहीं व्यक्तिगत संपर्क और वर्षों से वार्ड में सक्रिय रहने का दावा प्रमुखता से सामने आया।
हालांकि अंतिम फैसला मतदाता को करना है कि वह स्थानीय पहचान, पार्टी, व्यक्तिगत छवि, विकास के वादे या किसी अन्य मुद्दे को कितना महत्व देता है।
करोड़पति से लेकर सामान्य कार्यकर्ता तक—हर कोई मैदान में
निकाय चुनाव में इस बार आर्थिक हैसियत और राजनीतिक पहुंच को लेकर भी चर्चाएं सुनाई दीं। कहीं संसाधनों से मजबूत उम्मीदवार मैदान में हैं तो कहीं सामान्य कार्यकर्ता अपनी व्यक्तिगत पकड़ और जनसम्पर्क के दम पर मुकाबला कर रहे हैं।
लेकिन निकाय चुनाव की खासियत यही है कि यहां बड़े राजनीतिक दावों से ज्यादा वार्ड की गली, मोहल्ले और परिवारों में बनी व्यक्तिगत पकड़ कई बार परिणाम बदल देती है।
यही वजह है कि अंतिम समय तक कोई भी प्रत्याशी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह निश्चिंत नजर नहीं आ रहा।
बागी और निर्दलीय बने समीकरणों का ‘एक्स फैक्टर’
भाजपा और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कई वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों से भी है। टिकट की दौड़ में पीछे रह गए दावेदारों अथवा स्थानीय स्तर पर अपनी पहचान रखने वाले उम्मीदवारों ने मुकाबले को कई जगह रोचक बना दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि निर्दलीय किसके वोट काटेंगे और किसका गणित बिगाड़ेंगे?
कुछ वार्डों में त्रिकोणीय मुकाबला दिखाई दे रहा है तो कुछ जगह दो प्रमुख दलों के साथ तीसरा प्रत्याशी निर्णायक स्थिति बनाने की कोशिश में है। ऐसे में कुछ दर्जन वोट भी परिणाम की दिशा बदल सकते हैं।
भाजपा-कांग्रेस के लिए सिर्फ पार्षद का चुनाव नहीं
नगर निगम के परिणाम दोनों प्रमुख दलों के स्थानीय संगठन के लिए भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। कितने वार्डों में पार्टी प्रत्याशी जीतते हैं, कितने बागी कितनी चुनौती देते हैं और निर्दलीय कितनी सेंध लगाते हैं—इन सबका असर आगे की स्थानीय राजनीति पर दिखाई दे सकता है।
इसी कारण चुनावी मुकाबला सिर्फ प्रत्याशी बनाम प्रत्याशी नहीं रह गया है। कई वार्डों में यह संगठन बनाम व्यक्तिगत जनाधार की परीक्षा भी बन गया है।
अब मतदाता की खामोशी में छिपा है पूरा चुनाव
अंतिम दिन तक प्रत्याशियों ने मतदाताओं को अपनी बात सुनाई। अब मतदाता की बारी है। किसे मौका देना है और किसे नकारना है, इसका फैसला 9 सितम्बर को मतदान केंद्रों पर होगा।
14 सितम्बर को मतगणना के दौरान ईवीएम खुलेंगी तो सामने आएगा कि किसका जनसम्पर्क वोट में बदला, किसका समीकरण धराशायी हुआ और किसने खामोश मतदाता का भरोसा जीता।
फिलहाल चुनावी शोर थम चुका है। प्रत्याशियों की धड़कनें तेज हैं, समर्थक गणित में उलझे हैं और मतदाता खामोश है।
9 सितम्बर को यही खामोशी ईवीएम में बोलेगी… और 14 सितम्बर को परिणाम बताएगा कि भीलवाड़ा की जनता ने किसके सिर जीत का सेहरा बांधा।