1939 में राजाधिराज उम्मेद सिंह द्वितीय ने रखी थी स्थानीय लोकतंत्र की नींव, कांग्रेस के वर्चस्व से भाजपा की दस्तक तक बदली राजनीति; 11 सितंबर शुक्रवार को 110 प्रत्याशियों के बीच मुकाबला, अध्यक्ष की कुर्सी के लिए बनेगा नया समीकरण
शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|शाहपुरा नगर पालिका चुनाव को लेकर 11 सितंबर को होने वाला मतदान सिर्फ 35 वार्डों में पार्षद चुनने का चुनाव नहीं है। यह शाहपुरा की 87 साल पुरानी नगर राजनीति की अगली कड़ी भी है। 1939 में 13 सदस्यों से शुरू हुआ नगर पालिका का सफर आज 35 वार्ड और 110 प्रत्याशियों तक पहुंच गया है। इस बार भाजपा और कांग्रेस ने सभी 35-35 वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि 40 निर्दलीय भी मैदान में हैं। ऐसे में मुकाबला दिलचस्प है। क्योंकि जनता पहले पार्षद चुनेगी और इसके बाद निर्वाचित पार्षदों में से अध्यक्ष चुना जाएगा। लिहाजा वार्डों में जीत के साथ-साथ अध्यक्ष पद का सियासी गणित भी इस चुनाव का सबसे बड़ा केंद्र रहेगा।
शाहपुरा की नगरपालिका का इतिहास बताता है कि यहां स्थानीय शासन की परंपरा आजादी से पहले ही शुरू हो गई थी। तत्कालीन राजाधिराज उम्मेद सिंह द्वितीय ने शहर की बिगड़ती सफाई व्यवस्था और दोहरी प्रशासनिक व्यवस्था को देखते हुए फरवरी 1939 में 13 सदस्यीय म्यूनिसिपल बोर्ड की स्थापना की थी। खास बात यह थी कि जनता को अपने-अपने वार्ड से प्रतिनिधि चुनकर बोर्ड में भेजने का अधिकार दिया गया। उस समय मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और किशनगढ़ जैसी रियासतों में भी ऐसी व्यवस्था नहीं थी।
राजाधिराज की सोच थी- नगरपालिका लोकतंत्र की पहली पाठशाला-
उस समय सफाई व्यवस्था हेल्थ ऑफिसर के अधीन थी और दफा 34 से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका थी। अलग-अलग व्यवस्थाओं के कारण शहर की सफाई और प्रशासन प्रभावित हो रहा था। सड़कों पर गंदगी रहती थी और सफाई कर्मचारियों की संख्या भी कम थी। इसे देखते हुए राजाधिराज ने स्थानीय लोगों की भागीदारी वाली व्यवस्था खड़ी की। उनकी सोच थी कि नगरपालिका ऐसी प्रारंभिक संस्था है, जो नागरिकों को शासन में भागीदारी और शासन का भार अपने कंधों पर उठाने की शिक्षा देती है। पहले बोर्ड में छह सदस्य जनता ने चुने, जबकि सात सदस्यों को राजाधिराज ने मनोनीत किया। इनमें पांच राज्य कर्मचारी और दो किसान थे। कुशल सिंह चौधरी सर्वसम्मति से नगरपालिका के पहले अध्यक्ष चुने गए।
1944 में दूसरा चुनाव, 44 स्ट्रीट लाइट और 22 सफाई कर्मचारी थे–
1 अक्टूबर 1944 को नगरपालिका का दूसरा चुनाव हुआ। इसमें मनोहर सिंह अध्यक्ष चुने गए। जनता द्वारा चुने गए सदस्यों में सदाशंकर शर्मा, भंवरलाल न्याती, मांगीलाल तोशनीवाल, चिरंजीलाल शर्मा, गोविंदराम और छितर पटेल शामिल थे। पं. सदाशंकर को सचिव की जिम्मेदारी दी गई। उस समय नगरपालिका की कार्यप्रणाली भले ही सीमित संसाधनों में चलती थी, लेकिन कामकाज का रिकॉर्ड उल्लेखनीय था। बोर्ड की 16 बैठकें हुईं और 305 में से 290 मामलों का निस्तारण किया गया। नगरपालिका का सालाना खर्च 3462 रुपए 11 आने 6 पैसे था। कस्बे में 44 स्ट्रीट लाइट और 22 सफाई कर्मचारी थे। आज शहर का आकार, आबादी और जरूरतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। इसी के साथ नगरपालिका की जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं।
आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी भी बने पालिका अध्यक्ष-
1948 में कुशल सिंह चौधरी फिर अध्यक्ष बने और 1951 तक रहे। इसके बाद 1951 से 1956 तक रघुनाथ सिंह चौरसिया अध्यक्ष रहे। वर्ष 1956 से 1961 तक स्वतंत्रता सेनानी पंडित लादूराम व्यास ने नगरपालिका की कमान संभाली। यही वह दौर था जब शाहपुरा का नाम राष्ट्रीय स्तर की गतिविधियों से भी जुड़ा।
8 मार्च 1959 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू शाहपुरा हवाई अड्डे पर उतरे थे। वे भारत सेवक समाज के अधिवेशन में भाग लेने भीलवाड़ा आए थे। उस समय भीलवाड़ा में भी विमान उतरने की ऐसी सुविधा नहीं थी। नेहरू ने शाहपुरा में जनता को संबोधित किया और बाद में शाहपुरा से ही विमान द्वारा दिल्ली लौटे।
आज शाहपुरा की प्रमुख मांगों में रेल लाइन से जुड़ना शामिल है। ऐसे में इतिहास का यह अध्याय अपने आप में सवाल खड़ा करता है कि जिस शहर में कभी प्रधानमंत्री का विमान उतर चुका था, वह आज रेल कनेक्टिविटी के लिए क्यों तरस रहा है? इसी वर्ष 16 फरवरी को प्रसिद्ध संत विनोबा भावे भी शाहपुरा आए। तत्कालीन राजाधिराज सुदर्शन देव द्वारा 301 बीघा भूमि ग्रामदान में दिए जाने की घटना भी शाहपुरा के इतिहास में दर्ज है।
1961 से 1973 तक रामनारायण तीन बार अध्यक्ष रहे-
1961 से 1973 तक रामनारायण तीन बार अध्यक्ष चुने गए। उनके कार्यकाल में शाहपुरा के शिक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम हुए। 31 मार्च 1963 को शाहपुरा महाविद्यालय का शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने किया। 26 जनवरी 1968 को शिक्षामंत्री शिवचरण माथुर ने इसका उद्घाटन किया। 14 अक्टूबर 1971 को मुख्यमंत्री सुखाड़िया का शाहपुरा में भव्य स्वागत हुआ। इस दौर से साफ है कि नगरपालिका की राजनीति का दायरा केवल सड़क, नाली और सफाई तक सीमित नहीं था। शिक्षा और शहर के विकास की दिशा भी नगर राजनीति का हिस्सा थी।
1973 से 1982 तक रहा प्रशासकों का दौर-
1973 से 1982 के बीच नगरपालिका बोर्ड का स्थायित्व नहीं रहा। अलग-अलग समय में प्रशासकों को जिम्मेदारी दी गई। इस दौरान ज्ञानचंद सिंधी, भूरे खां कायमखानी, स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मीदत्त काटिया और बालमुकुंद चौधरी जैसे नाम नगरपालिका की व्यवस्था से जुड़े रहे। 1982 से 1986 तक बालमुकुंद चौधरी अध्यक्ष रहे। इस समय तक शाहपुरा की नगर राजनीति में कांग्रेस समर्थित नेतृत्व का प्रभाव मजबूत था। लेकिन इसके बाद राजनीतिक तस्वीर बदलने लगी।
1990 में पहली बार भाजपा का अध्यक्ष, यहीं से बदले समीकरण-
सन् 1990 में शाहपुरा नगरपालिका की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। पहली बार भाजपा के कन्हैयालाल धाकड़ अध्यक्ष बने। वे मीसा बंदी भी रहे थे और 1995 तक अध्यक्ष पद पर रहे। इसके बाद कमला काबरा भाजपा से अध्यक्ष बनीं और वर्ष 2000 तक पद पर रहीं। यह वह दौर था जब नगरपालिका में कांग्रेस के लंबे वर्चस्व को भाजपा ने चुनौती देकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की। 28 अगस्त 2000 को फिर समीकरण बदले और कांग्रेस पार्षदों के समर्थन से अनिल चौधरी अध्यक्ष बने। इसके बाद 2005 से 2010 तक कन्हैयालाल धाकड़ फिर अध्यक्ष रहे।
2010 के बाद चेहरों के साथ बदली प्राथमिकताएं-
2010 से 2015 तक रघुनंदन सोनी चेयरमैन रहे। उनके कार्यकाल में शाहपुरा में सुंदर गार्डन का निर्माण हुआ। 2015 से 2020 तक किरण तोषनीवाल अध्यक्ष रहीं। कोरोना काल में चुनाव नहीं होने के कारण कुछ समय के लिए प्रशासक नियुक्त किया गया। इसके बाद 1 फरवरी 2021 से रघुनंदन सोनी फिर अध्यक्ष बने। अब नगर पालिका का नया चुनाव सामने है और शहर की राजनीतिक तस्वीर फिर बदलने की संभावना बनी हुई है।
35 वार्ड, भाजपा-कांग्रेस के 70 प्रत्याशी और 40 निर्दलीय-
इस बार शाहपुरा नगरपालिका के 35 वार्डों में भाजपा के 35 और कांग्रेस के 35 प्रत्याशी मैदान में हैं। इनके अलावा 40 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। कुल 110 प्रत्याशी मतदाताओं के बीच हैं। यही 40 निर्दलीय इस चुनाव के समीकरण को खास बना रहे हैं। कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय है। कहीं पार्टी प्रत्याशियों को बागियों की चुनौती है तो कहीं स्थानीय चेहरे मुकाबले को रोचक बना रहे हैं। इसलिए चुनाव परिणाम में सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के आंकड़े ही महत्वपूर्ण नहीं होंगे। निर्दलीयों की जीत की संख्या भी अध्यक्ष पद के चुनाव में निर्णायक साबित हो सकती है।
पार्षद का चुनाव जनता करेगी, अध्यक्ष का फैसला पार्षद करेंगे-
शाहपुरा के नगर चुनाव की सबसे अहम बात यही है कि जनता सीधे अध्यक्ष का चुनाव नहीं कर रही। 11 सितंबर को जनता 35 वार्डों में पार्षद चुनेगी। इसके बाद निर्वाचित पार्षदों में से अध्यक्ष चुना जाएगा। यानी चुनाव के दो चरण हैं। पहला चरण-वार्ड की लड़ाई। दूसरा चरण-अध्यक्ष की कुर्सी का गणित। यदि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिला तो तस्वीर साफ होगी। लेकिन परिणाम करीबी रहे तो निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अचानक महत्वपूर्ण हो सकती है। यहीं से चुनावी नतीजों के बाद समर्थन, संपर्क और राजनीतिक रणनीति का दौर शुरू होने की संभावना रहेगी।
इतिहास समृद्ध, लेकिन विकास के सवाल आज भी कायम-
शाहपुरा का इतिहास और विरासत इसे अलग पहचान देती है। 14 दिसंबर 1631 को महाराणा प्रताप के प्रपौत्र सुजानसिंह सिसोदिया ने शाहपुरा की स्थापना की थी। रामस्नेही संप्रदाय की परंपरा, स्वामी दयानंद सरस्वती का प्रवास, जैन समाज की धार्मिक विरासत, आर्य समाज की मजबूत उपस्थिति, विश्व प्रसिद्ध फड़ चित्रकला, राजमहल की स्थापत्य कला और बारहठ हवेली से जुड़ी स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियां शाहपुरा की पहचान हैं। क्रांतिकारी केसर सिंह बारहठ, जोरावर सिंह और प्रताप सिंह बारहठ की गौरवगाथा भी शाहपुरा की मिट्टी से जुड़ी है। लेकिन अब शहर अपने इतिहास के साथ भविष्य का हिसाब भी मांग रहा है।
रेल, जिला, उद्योग और पर्यटन… नए बोर्ड के सामने होंगे बड़े सवाल-
शाहपुरा की प्रमुख मांगों में सबसे ऊपर रेल लाइन से जोड़ने और जिला बहाली का मुद्दा है। इसके अलावा नगर पालिका को नगर परिषद का दर्जा दिलाना, शाहपुरा को पर्यटन स्थल घोषित करवाना, रीको क्षेत्र में उद्योग स्थापित करना, सब्जी मंडी व बस स्टैंड को व्यवस्थित करना, शहर को एजुकेशन हब के रूप में विकसित करना तथा पिवनिया तालाब और बगरू क्षेत्र को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना प्रमुख मांगों में शामिल हैं। यानी आने वाला नगर बोर्ड केवल शहर की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान करने वाला बोर्ड नहीं होगा। उसके सामने शाहपुरा की आर्थिक, शैक्षणिक, औद्योगिक और पर्यटन पहचान को मजबूत करने की चुनौती भी होगी।
1939 में सफाई से शुरू हुआ सफर, 2026 में विकास के एजेंडे तक-
1939 में जब नगरपालिका बनी थी तो सबसे बड़ी चिंता थी, शहर की सफाई कैसे हो? तब 44 स्ट्रीट लाइट थीं और 22 सफाई कर्मचारी। आज शहर बदल चुका है। जरूरतें बदल चुकी हैं। राजनीति बदल चुकी है। पार्टियों का प्रभाव बदला है। अध्यक्षों के चेहरे बदले हैं। लेकिन एक सवाल आज भी वही है क्या नगर राजनीति शहर की जरूरतों के मुताबिक अपनी प्राथमिकताएं बदल पाई है? 11 सितंबर को जनता 35 वार्डों में अपना फैसला देगी। इसके बाद 35 पार्षद तय करेंगे कि पालिका की कमान किसके हाथ होगी। भाजपा…कांग्रेस… या फिर निर्दलीय पार्षदों के सहारे बनेगा कोई नया राजनीतिक समीकरण? यह तस्वीर चुनाव परिणाम के बाद साफ होगी।
लेकिन इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल अध्यक्ष की कुर्सी से भी आगे का है। शाहपुरा के पास 87 साल का नगरपालिका इतिहास है…अब सवाल है अगले पांच साल का भविष्य कौन लिखेगा?