शाहपुरा में वोटिंग खत्म, अब दावों की जंग शुरू

भाजपा-कांग्रेस दोनों के बहुमत के दावे, लेकिन बोर्ड की चाबी निर्दलीयों के हाथ में!
35 वार्डों में मतदान शांतिपूर्ण संपन्न; 40 निर्दलीयों ने बिगाड़े दोनों दलों के गणित
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|शाहपुरा नगर पालिका की सत्ता किसके हाथ में जाएगी, इसका फैसला अब ईवीएम के पेट में कैद हो चुका है। शुक्रवार को नगर पालिका के 35 वार्डों के लिए मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। मतदान समाप्त होते ही जहां प्रत्याशियों और समर्थकों ने राहत की सांस ली, वहीं शाहपुरा की राजनीति में असली खेल अब शुरू हो गया है।
मैदान में भाजपा और कांग्रेस जैसे दो प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रत्याशी थे, लेकिन 40 निर्दलीयों की मौजूदगी ने चुनाव को दोतरफा मुकाबले से निकालकर कई वार्डों में पूरी तरह उलझा दिया। अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है अगर किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो बोर्ड की चाबी आखिर किसके हाथ होगी? जवाब है निर्दलीय।
भाजपा के पास खोने को बहुत है मगर कांग्रेस को तो कुछ भी मिलता है तो वह लाभ की स्थिति में रहने वाली है।
शुक्रवार को मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की आवाजाही तो रही, लेकिन पिछले चुनावों की तुलना में ऐसा कोई खास उत्साह नजर नहीं आया। खास तौर पर युवा मतदाताओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम दिखाई दी। जिस पीढ़ी को राजनीति का नया चेहरा और लोकतंत्र की नई ताकत माना जा रहा है, उस जेन-जी वर्ग की मौजूदगी मतदान केंद्रों पर अपेक्षाकृत कम रही। इस बार चुनाव में कई जगहों पर पुराने राजनीतिक समीकरण, व्यक्तिगत संपर्क, जातीय-सामाजिक समीकरण और प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई दी।
मतदान के दौरान भाजपा और कांग्रेस के स्थानीय पदाधिकारी तथा कार्यकर्ता अपने-अपने प्रत्याशियों के पक्ष में सक्रिय नजर आए। लेकिन इस चुनाव की सबसे दिलचस्प तस्वीर यह रही कि दोनों ही दलों को अपने भीतर के असंतोष और बागियों से जूझना पड़ा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जहां भाजपा-कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर कम होगा, वहां बागी प्रत्याशी परिणाम की दिशा बदल सकते हैं। ऐसे में चुनाव जीतने वाला प्रत्याशी भले एक वोट से आगे निकले, लेकिन उसकी जीत के पीछे किसी तीसरे प्रत्याशी द्वारा काटे गए वोटों की कहानी भी छिपी हो सकती है।

विधायक बैरवा का दावा-भाजपा बनाएगी स्पष्ट बहुमत का बोर्ड
शाहपुरा विधायक डॉ. लालाराम बैरवा ने भाजपा के पक्ष में बड़ा दावा किया। उनका कहना है कि भाजपा शाहपुरा नगर पालिका में स्पष्ट बहुमत हासिल कर बोर्ड बनाएगी। विधायक के मुताबिक शाहपुरा में ट्रिपल इंजन की सरकार बनने से विकास कार्यों को और गति मिलेगी। उनका दावा है कि उनके द्वारा शुरू की गई विकास की राजनीति को नगर पालिका में भाजपा बोर्ड मिलने के बाद मजबूती मिलेगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या मतदाताओं ने इस राजनीतिक फॉर्मूले पर मुहर लगाई है? इसका जवाब ईवीएम खुलने के बाद ही मिलेगा।

कांग्रेस का पलटवार-जनता ने भाजपा को नकार दिया-
भाजपा के बहुमत के दावे के जवाब में कांग्रेस भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। कांग्रेस के विधायक प्रत्याशी नरेंद्र कुमार रेगर और नगर कांग्रेस अध्यक्ष रमेश सेन ने दावा किया कि इस बार शाहपुरा में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत के साथ बोर्ड बनाएगी। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि मतदाताओं ने प्रदेश सरकार के कथित कुशासन, शाहपुरा विधायक के कार्यकाल में कथित भ्रष्टाचार, शाहपुरा को जिला बनाए जाने की मांग, मूलभूत सुविधाओं की समस्याओं और भाजपा के आंतरिक सत्ता संघर्ष को ध्यान में रखकर मतदान किया है। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम फैसला राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि मतदाताओं की ईवीएम में दर्ज पसंद करेगी।

35 वार्डों वाली नगर पालिका में स्पष्ट बहुमत के लिए कम से कम 18 पार्षदों की जरूरत होगी। ऐसे में अगर भाजपा या कांग्रेस 18 के जादुई आंकड़े से पीछे रह जाती है तो दोनों दलों को निर्दलीयों की तरफ देखना पड़ेगा। और यही इस चुनाव का सबसे बड़ा ट्विस्ट है।
40 निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में थे। इनमें से कितने जीतेंगे, कितने बड़े दलों का खेल बिगाड़ेंगे और कितने जीत के बाद किस खेमे में जाएंगे यह अभी भविष्य के गर्भ में है।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर भाजपा के भीतर हुए टिकट वितरण पर भी है। चुनाव से ऐन वक्त पहले टिकटों को लेकर बनी परिस्थितियों और कई प्रभावशाली दावेदारों के टिकट से वंचित रहने को पार्टी के भीतर असंतोष का कारण माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह भी रही कि पिछले चुनाव में भाजपा के खिलाफ बगावत कर चुके पांच वार्डों के कुछ चेहरों को इस बार भाजपा ने प्रत्याशी बनाया। इस फैसले ने पार्टी की रणनीति पर भी सवाल खड़े किए।
कांग्रेस भी गुटबाजी से अछूती नहीं रही ऐसा नहीं है कि कांग्रेस का घर पूरी तरह व्यवस्थित रहा। कांग्रेस में भी टिकटों को अंतिम रूप देने में आखिरी समय तक खींचतान की चर्चाएं बनी रहीं। पूर्व नगर कांग्रेस अध्यक्ष बालमुकुंद तोषनीवाल को भी ऐन वक्त पर टिकट मिलने की बात राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रही।
शाहपुरा नगर पालिका की निवर्तमान चेयरमैन रघुनंदन सोनी का स्वयं और परिवार के सदस्यों के चुनाव नहीं लड़ने का फैसला भी इस चुनाव की बड़ी राजनीतिक घटनाओं में गिना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में इसे सत्ता व संगठनात्मक समन्वय की कमी और अंदरूनी परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया।
10 वार्डों में सीधी भिड़ंत, 12 में त्रिकोण और 13 में बहुकोणीय मुकाबला-
शाहपुरा के चुनावी नक्शे को देखें तो मुकाबला हर वार्ड में एक जैसा नहीं था। 10 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली। इन वार्डों में मुकाबला मूल रूप से दो प्रमुख दलों के बीच रहा। वार्ड संख्या 2, 6, 7, 9, 10, 15, 16, 19, 22, 31 और 32 में भाजपा-कांग्रेस प्रत्याशियों के बीच सीधा मुकाबला बताया गया। वहीं 12 वार्डों में त्रिकोणीय संघर्ष ने मुकाबले को और रोचक बना दिया। इन वार्डों में तीसरे प्रत्याशी की भूमिका परिणाम बदलने वाली हो सकती है। वार्ड 3, 4, 12, 17, 20, 21, 23, 27, 29, 33 और 35 में त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति रही।
अध्यक्ष की कुर्सी की हॉट सीट वार्ड 6, 7, 15 और 16 पर सबकी निगाह
चुनाव परिणाम आने से पहले ही अध्यक्ष पद को लेकर राजनीतिक जोड़-तोड़ की संभावनाएं शुरू हो गई हैं। इनके अलावा अध्यक्ष पद के लिए अन्य दावेदार भी मैदान में हो सकते है।
अब ईवीएम बोलेगी, नेताओं के दावे नहीं-
शुक्रवार शाम मतदान समाप्त होते ही ईवीएम को सुरक्षित प्रक्रिया के तहत पैक कर दिया गया। अब प्रत्याशियों की किस्मत मशीनों में बंद है। मतदान के बाद समर्थकों के बीच अपने-अपने आंकड़े चल रहे हैं। कोई 20 पार्षदों का दावा कर रहा है तो कोई 22 का। कहीं बूथवार वोटों का हिसाब लगाया जा रहा है तो कहीं जातीय समीकरणों के आधार पर जीत-हार का अनुमान लगाया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार चुनाव लड़ने वाले कई प्रत्याशियों को परिणाम से पहले सुरक्षित रखने के लिए बाड़ाबंदी में ले जाने की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। अगर यह कवायद सच साबित होती है तो यह इस बात का संकेत होगा कि दोनों प्रमुख दलों को अपने-अपने पार्षदों के साथ-साथ बहुमत के बाद की राजनीति की भी चिंता सताने लगी है।
शाहपुरा की राजनीति में असली रोमांच अब शुरू हुआ है। क्योंकि चुनाव सिर्फ 35 पार्षद चुनने का नहीं है। मुकाबला नगर पालिका की सत्ता का है। भाजपा अपने ट्रिपल इंजन के भरोसे मैदान में है। कांग्रेस सरकार के खिलाफ कथित नाराजगी और शाहपुरा जिला बहाली जैसे मुद्दों को अपनी ताकत मान रही है। और अध्यक्ष की कुर्सी के दावेदारों की निगाहें अब उन वार्डों पर टिकी हैं जहां से सत्ता की चाबी निकल सकती है।
और अगर बहुमत नहीं आया तो किसकी होगी पहली दस्तक निर्दलीयों के दरवाजे पर? ईवीएम खुलेगी तो दावों की हवा निकलेगी और शाहपुरा की अगली शहरी सरकार की असली तस्वीर सामने आएगी।