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एक बेबाक राजनीतिक व्यंग्य # 9— आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ नगर परिषद के चुनाव का ढोल क्या थमा, शहर की हर नुक्कड़, चौराहे और चाय की थड़ी पर एक ही कड़कती हुई बहस छिड़ गई है आखिरकार उस लाल गद्दे वाली सभापति की कुर्सी पर कौन सा सूरमा आकर बैठेगा ? मतदान की स्याही अभी उंगली से उतरी भी नहीं थी कि दोनों प्रमुख दलों के रणनीतिकारों ने अपने-अपने ‘जिताऊ मोहरों’ को ऐसे भूमिगत किया है, मानो कोई टॉप-सीक्रेट परमाणु परीक्षण चल रहा हो । सुना है, इस बार बाड़ेबंदी के मैदान में सिर्फ बड़ी पार्टियां ही नहीं, बल्कि तीन निर्दलीय सूरमाओं ने भी अपने-अपने किलेबंदी के बाड़े कस लिए हैं । अब जनता पूछ रही है कि भाई साहब, अभी तो एवंएम मशीनें स्ट्रांग रूम में सांस ले रही हैं, रिजल्ट आया नहीं और सभापति के गणित पर माथापच्ची अभी से शुरू ?
तो सुनिए, मुकेश्यानंद महाराज अपने कमंडल से न्याय की डुगडुगी बजाते हुए शहर की इस जनता से सीधा सवाल पूछते हैं हार-जीत चाहे जिसकी हो, बोर्ड किसी का भी सजे, पर क्या कुर्सी पर बैठने वाले के पास शहर के विकास का कोई ‘विजन’ उसके मानस पटल पर है भी या सिर्फ तिजोरी भरने का ब्लूप्रिंट तैयार है ?
दोनों ही पार्टियों के आकाओं को अपने जीते हुए पार्षदों के साथ बैठकर सिर्फ संख्या बल गिनने की बजाय उनसे शहर के भविष्य का रोडमैप मांगना चाहिए । जो लोग सचमुच इस रेस में हैं, उनसे पूछिए कि शहर की बर्बादी पर उनका क्या प्लान है ? अगर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस वैचारिक सिद्धांत को अपना लिया गया, तो आने वाला वक्त दोनों पार्टियों के लिए स्वर्णिम काल कहलाएगा, वरना पांच साल जनता केवल आंसू बहाएगी और पार्षद महोदय अपनी गाड़ियां बदल रहे होंगे ।
शहर के बिगड़ते हुए हालात अब किसी से छिपे हैं क्या ? सड़कों की छातियां छलनी हैं, सीवर लाइनें अपनी पोल खुद खोल-खोलकर बदबू मार रही हैं, नालियां ओवरफ्लो होकर रास्तों पर तैर रही हैं और बिजली के पोलों की बत्तियां सिर्फ चुनाव के दिनों में ही टिमटिमाती हैं। जब ये सारी व्यवस्थाएं चुनाव के उन चंद दिनों में रातों-रात दुरुस्त की जा सकती हैं, तो फिर पूरे पांच साल तक प्रशासन को लकवा क्यों मार जाता है ?
आप सबको, हमको, हम सबको मिलकर सोचना होगा क्या आप अपने बहुमूल्य वोट से शहर का विकास देखना चाहते हैं, या फिर इन दलों को सरकारी खजाना लूटने और कागजों पर लीपापोती करने का खुला लाइसेंस देना चाहते हैं ?
जरा सीने पर हाथ रखकर सोचिए संगमरमर, सीमेंट हब, हिंदुस्तान जिंक की दौलत और विश्व धरोहर की ऐतिहासिक पहचान रखने वाला हमारा यह चित्तौड़गढ़ आज इन मक्कार नेताओं का मोहताज क्यों बन गया है ? लोकतंत्र में हर नागरिक का वोट अनमोल है, लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम और आप मिलकर इन जन-प्रतिनिधियों को ‘गांधी छाप गुलाबी नोटों’ की गहरी और आरामदायक नींद से बाहर खींचकर लाएं । इन्हें शहर के विकास के लिए जागना ही होगा !
एक कड़वी बात और कान खोलकर सुन लीजिए हमारे शहर को किसी भी सरकार के रहमो-करम या भीख की आस लगाने की कोई जरूरत नहीं है। जब आपके शहर की अपनी धरती सोना उगल रही हो, और यहां की कोख से बड़े उद्योगपति अरबों कमा रहे हों, तब हमारे सांसद और विधायक हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे हैं ? इनसे सवाल पूछिए ! सीएसआर (CSR) यानी सामाजिक दायित्व का पैसा सबसे पहले हमारे अपने शहर के विकास पर खर्च होना चाहिए, न कि नेताओं के निजी चुनावी विज्ञापनों या दूसरी जगहों पर ठिकाने लगाया जाए ।
अगर जनता ने एक बार अपने इन सोए हुए प्रतिनिधियों को हिलाकर जगा दिया, और जब तक सारी कंपनियों का सालाना सीएसआर फंड पाई-पाई शहर के विकास में नहीं लग जाता, तब तक सवाल पूछना बंद मत करिए। जिस दिन शहर का यह धन यहीं लगना शुरू हो गया, चित्तौड़गढ़ को राज्य की अग्रणी पंक्ति में आकर खड़ा होने से कोई माई का लाल नहीं रोक सकता ! बाबाजी की जय हों ….जय हों…..जय हों….जय.