ओम जैन
शंभूपुरा।स्मार्ट हलचल |चित्तौड़गढ़ शहर के उपनगरीय क्षेत्र सेन्थी स्थित शांति भवन में पर्यूषण पर्व के सप्तम् दिवस श्री प्रेरणा श्री जी म० सा० ने अन्तगढ़ दशांक सूत्र का वाचन किया।स्पष्टवक्ता श्री प्रेक्षा श्री जी ने अपने व्याख्यान मे फरमाया कि धर्म की शरण से ही मुक्ति सम्भव है। दान शील तप तीनों ही भाव पर टिके हुए है। जब तक हमारे शुभ भाव नही बनेंगे सारी क्रियाए अर्थात् दान शील व तप बेकार है। भावना दो प्रकार की होती है शुभ व अशुभ। तराजू में एक तरफ पाप व दूसरी तरफ पुण्य है तो हमें पुण्य का पलड़ा भारी करना चाहते है। इसके लिए मन के विचारों को हल्का करना पड़ेगा। किसी को आगे बढ़ते देखने की प्रवृति आप मे होनी चाहिए पर वर्तमान परिपेक्ष में ऐसा नही है क्योंकि हम अशुभ भाव से ग्रस्त है। आवश्यकता इस बात की है कि धर्म आराधना के क्षेत्र मे हम एक दूसरे की होड़ करे। एक व्यक्ति शिकार के लिए पक्षियों को दाना डालता है व दूसरा परोपकार के लिए। क्रिया वही है किन्तु भाव मे अन्तर है। कागज के फूल जैसी हमारी क्रियाऐं है किन्तु उस क्रिया मे सुगन्ध रूपी भावना का अभाव है।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे, श्रीसंघ सेन्थी ने तपस्वियों का बहुमान किया एवं अतिथियों का अभिनन्दन किया।