पान का बीड़ा, काला चश्मा …………. “बिना ‘पति’ की सभा और सभा के नए ‘पति’!” मुकेश्या नंद महाराज… .

एक बेबाक राजनीतिक व्यंग्य #18 — आकाश शर्मा
स्मार्ट हलचल|राजनीति के रणक्षेत्र से जब चुनावी चौसर सिमटती है, तो सिंहासन पर मुकद्दर के सिकंदर बैठते हैं। मगर चित्तौड़गढ़ नगर परिषद के गलियारों में इस बार ताजपोशी का अंदाज़ कुछ ऐसा अनोखा रहा, जिसने शहरभर में सियासी चर्चाओं के बाजार गर्म कर दिए हैं। बुधवार का सूरज उगते ही, बिना किसी तामझाम या बुजुर्गों के साए के, अनिल ईनाणी ने चुपचाप पदभार तो संभाल लिया; लेकिन असली आतिशबाजी शाम के उस ‘भव्य समारोह’ में फूटी, जहाँ मंत्री, सांसद, विधायक और चुनाव प्रभारी तक अपनी कुर्सियों पर वक्त की नजाकत भांपते हुए किसी अनुशासित सिपाही की तरह मुस्तैद बैठे थे !
जब मंच पर उतरा ‘सियासी सूनापन’
जब सभापति और उपसभापति की ‘ग्रैंड एंट्री’ हुई, राम-राम, जय राजाराम, राम-राम, जय सीताराम तो उनके तेवर और जलवे ने वहाँ बैठे जनसमूह के बीच जैसे चर्चाओं के तीर छोड़ दिए। मंच सचमुच एक सियासी जलसा था, मगर उस माहौल में कुछ ऐसा गज़ब का नाटकीय खालीपन तैर रहा था कि हर जुबान पर एक ही दबी हुई मुस्कान थी “सभा तो पूरी भव्य थी, लेकिन ‘पति’ नदारद था !” और फिर क्या था, इसी एक दृश्य ने उस पूरे माहौल को एक ऐसी दिलचस्प दास्तां में बदल दिया, जहाँ पर्दे के पीछे के असली रणनीतिकार ने बिना नाम लिए अपनी पैनी राजनीतिक चालों से चित्तौड़गढ़ के कई ‘अभेद्य किलों’ को एक ही झटके में नेस्तनाबूद कर डाला ।
बाबाजी का दरबार ‘नाइट शिफ्ट’
हमने भी तुरंत बाबाजी मुकेश्या नंद महाराज को याद किया और बाबाजी भी अपनी अनूठी शैली में हाजिर हो गए “वत्स… राम-राम, जय राजाराम, राम-राम, जय सीताराम !” यह कहकर बाबाजी जोर-जोर से हंसने लगे। हम समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर बाबाजी को अचानक क्या हो गया है । बाबाजी ठहाका लगाते हुए बोले “अरे बेटा, नगर परिषद अब रात में भी काम किया करेगी !” हमने हैरानी से पूछा, “बाबाजी, ऐसा क्यों ?” बाबाजी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया “अरे बेटा, जब दिन की धूप शहर की बुनियादी समस्याओं को देखने से इंकार कर दे, तो फाइलें भी अंधेरे में ही घूमती हैं और सीनियर नागरिकों की चिंताएं भी रात के सन्नाटे में ही जगती हैं ! “वत्स………. एक बात और अभी जन्मदिवस भी निकला इसमें भी एक खेंल हुआ खेल करनें वालें नयें शहर के हाकम के खासम खास नें की करतुत अब उन्ही पर भारी पडनें वाली है ।
तंज की परतें और जनता की ताकत
बाबाजी का यह व्यंग्य और शहर की जमीनी हकीकत पर यह सटीक कटाक्ष वाकई गहरी चोट करता है । जब जनता की बुनियादी समस्याओं को दरकिनार कर सिर्फ अपनी सुविधाओं और कमरों के उच्चीकरण ( ऊपर नए आशियाने बनवाने ) पर सारा ध्यान केंद्रित कर लिया जाए, तो जनता और विपक्ष दोनों का सुलगना लाजिमी है। बाबाजी भले ही इसे सीनियर नागरिकों की नींद हराम होने का तंज मान रहे हों, लेकिन बात बिल्कुल दो टूक है अब विपक्ष कमजोर नहीं है ! आने वाले दिनों में नगर परिषद के इन गलियारों में केवल फाइलों के सरकने की आवाज नहीं सुनाई देगी, बल्कि शहर के हर एक नागरिक के अधिकारों की गूंज इन दीवारों को चीरकर बाहर आएगी। सिंहासन भले ही बदल गए हों, पर जनता का पहरा अब पहले से कहीं ज्यादा सख्त है !