वन्दे मातरम् भारत की प्राण शक्ति, आज भी प्रासंगिक : धर्मराज

बांसवाड़ा के कुशलबाग मैदान में एक समय, एक लय और एक स्वर में हुआ सामूहिक गायन

बांसवाड़ा, 26 सितम्बर । स्मार्ट हलचल|राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में शनिवार को विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, नई दिल्ली के आह्वान पर देशभर में एक समय, एक लय और एक स्वर में सामूहिक गायन कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसी क्रम में विद्या भारती संस्थान, बांसवाड़ा की ओर से शनिवार को कुशलबाग मैदान में जिला स्तरीय सामूहिक कार्यक्रम आयोजित हुआ।

कार्यक्रम में बांसवाड़ा नगर के विभिन्न राजकीय एवं निजी विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के विद्यार्थी, शिक्षक, प्रधानाचार्य और अभिभावक बड़ी संख्या में शामिल हुए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता नगर परिषद सभापति मुकेश रावत ने की। जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह यादव मुख्य अतिथि रहे, जबकि भारतमाता परियोजना बांसवाड़ा के प्रमुख धर्मराज ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में विद्या भारती संस्थान बांसवाड़ा के जिला मंत्री नवनीत शुक्ला एवं वन्दे मातरम् आयोजन समिति के जिला संयोजक गजेन्द्र आचार्य उपस्थित रहे।

दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। अतिथि परिचय एवं स्वागत जिला सचिव ललित कुमार दवे ने किया। कार्यक्रम का संचालन विद्या निकेतन मंदारेश्वर के प्रधानाचार्य शिवगिरि गोस्वामी ने किया। इसके बाद विद्यार्थियों एवं उपस्थित जनसमूह ने राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ का सामूहिक गायन किया।

*स्वाधीनता आंदोलन में ‘वन्दे मातरम्’ बना था राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष*

मुख्य वक्ता धर्मराज ने ‘वन्दे मातरम्’ के इतिहास और इसके 150 वर्ष पूर्ण होने के संदर्भ में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ‘वन्दे मातरम्’ की रचना का काल 1875-76 माना जाता है। इसके रचनाकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय थे और इसका प्रकाशन वर्ष 1882 में उनके उपन्यास आनंदमठ में हुआ।

उन्होंने बताया कि वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ‘वन्दे मातरम्’ का सार्वजनिक गायन किया। इसके बाद यह गीत स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्रीय चेतना और संघर्ष का प्रमुख उद्घोष बन गया।

धर्मराज ने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना और मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार रामचरितमानस की रचना के सदियों बाद भी उसकी पंक्तियां जन-जन के जीवन का हिस्सा हैं, उसी प्रकार ‘वन्दे मातरम्’ भी भारतीय जनमानस में गहरे रूप से प्रतिष्ठित है।

उन्होंने कहा कि समय के साथ ‘वन्दे मातरम्’ के केवल प्रारंभिक दो अंतरों के सार्वजनिक गायन की परंपरा रह गई थी, लेकिन इसकी 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर राष्ट्रगीत के गौरव और भाव को व्यापक रूप से जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि “वन्दे मातरम् भारत की सांस्कृतिक आत्मा का जयगान है, जो आज भी प्रासंगिक है। यह नई पीढ़ी को भारत के गौरवशाली इतिहास से जोड़ते हुए राष्ट्र के प्रति समर्पण और गौरव की भावना के लिए प्रेरित करता है।”

*विद्यालयों में नियमित रूप से गायन और भावार्थ सिखाने का आह्वान*

जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह यादव ने उपस्थित जनसमूह से विद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थानों में ‘वन्दे मातरम्’ के नियमित गायन के साथ विद्यार्थियों को इसके भाव और अर्थ से परिचित कराने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि देश प्रत्येक क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रहा है और ऐसे समय में युवाओं एवं विद्यार्थियों में राष्ट्र के प्रति गौरव और समर्पण की भावना विकसित करना आवश्यक है। ‘वन्दे मातरम्’ इसके लिए प्रभावी माध्यम हो सकता है।

नगर परिषद सभापति मुकेश रावत ने अपने विद्यार्थी जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि विद्या भारती के विद्यालय में अध्ययन के दौरान उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ को पूर्ण रूप से गाया और इसके भावों को आत्मसात किया। उन्होंने विद्यार्थियों से प्रतिदिन राष्ट्रगीत का सस्वर गायन करने का आग्रह किया।

वन्दे मातरम् आयोजन समिति के जिला संयोजक गजेन्द्र आचार्य ने बताया कि बांसवाड़ा जिले के विभिन्न राजकीय एवं निजी विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में भी एक समय, एक स्वर और एक लय में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ का सामूहिक गायन किया गया।

कार्यक्रम के अंत में विद्या भारती संस्थान के जिला मंत्री नवनीत शुक्ला ने सभी अतिथियों, विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं उपस्थित जनसमूह का आभार व्यक्त किया। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ शांति मंत्र के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।