लखनऊ में चार दिवसीय ‘ओशो गीता ध्यान यज्ञ’ का शुभारंभ

स्मार्ट हलचल।लखनऊ (ब्यूरो) राजधानी लखनऊ में चार दिवसीय ‘ओशो गीता ध्यान यज्ञ’ का आयोजन 1- 4 अक्टूबर 2026 तक किया जा रहा है। कानपुर हाईवे स्थित आनंदी मैजिक वर्ल्ड रिसॉर्ट में आयोजित इस आध्यात्मिक शिविर में देश के विभिन्न हिस्सों से करीब 250 साधक-साधिकाएं भाग लेने पहुंचे हैं।
दिव्य प्रेम ध्यान साधना फाउंडेशन लखनऊ की ओर से आयोजित इस शिविर में ओशो द्वारा भगवद्गीता के 18 अध्यायों पर वर्ष 1970 से 1975 के बीच दिए गए प्रवचनों और उनकी व्याख्याओं को ध्यान एवं साधना के माध्यम से समझने का प्रयास किया जा रहा है।
शिविर में साधकों को ध्यान और साधना की विभिन्न प्रक्रियाओं के साथ ओशो के गीता दर्शन से परिचित कराया जा रहा है। साधकों से सहज साधना के लिए सफेद या मैरून रंग के ढीले वस्त्र पहनकर आने का अनुरोध किया गया है।
शिविर में संबोधित करते हुए ओशो रजनीश के अनुज (छोटे भाई) स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने कहा कि हजारों वर्षों से लोग गीता का अध्ययन और चिंतन करते आए हैं, लेकिन उसके संदेश को जीवन में उतारना अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति पाक-कला की पुस्तक पढ़कर उस पर बहस करता रहे, लेकिन भोजन बनाए ही नहीं, तो केवल पुस्तक पढ़ने से उसकी भूख नहीं मिटेगी। इसी प्रकार आध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन के साथ उनके संदेश को जीवन में अनुभव करना भी आवश्यक है।
उन्होंने ने गीता के 13वें अध्याय का उल्लेख करते हुए शरीर और आत्मा के संबंध को समझाया। उन्होंने कहा कि शरीर को ‘क्षेत्र’ और उसे जानने वाली चेतना को ‘क्षेत्रज्ञ’ कहा गया है। उन्होंने साधकों से जीवन में प्रकृति के तीन गुणों, सत्व, रजस और तमस को समझते हुए आत्मबोध की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया।
स्वामी चैतन्य सागर ने ओशो की पुस्तक ‘गीता दर्शन’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें भगवद्गीता के संदेश की व्याख्या को मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया गया है।
मां मंजूशा ने कहा कि व्यक्ति जब तक अपने दुखों के कारणों को समझने और स्वयं को देखने की प्रक्रिया शुरू नहीं करता, तब तक उससे मुक्ति का मार्ग स्पष्ट नहीं होता। उन्होंने गीता में बताए गए ‘साक्षी भाव’ को साधना का महत्वपूर्ण आधार बताया।
वहीं स्वामी दिगम्बर ने ओशो के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि आध्यात्मिक जीवन में केवल मान्यता के बजाय अनुभव और विवेक को महत्व दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार व्यक्ति को विश्वास के साथ-साथ स्वयं जानने और समझने की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहिए।
चार दिवसीय इस शिविर में ध्यान, गीता दर्शन, प्रवचन और साधना से जुड़े विभिन्न सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। आयोजकों के अनुसार, इसका उद्देश्य गीता के संदेश को केवल बौद्धिक अध्ययन तक सीमित न रखते हुए ध्यान और आत्म-अनुभव के माध्यम से समझने का अवसर उपलब्ध कराना है।
मुख्य आयोजिका मां दिव्य ज्योति ने बताया कि ध्यान यज्ञ का संचालन देश-विदेश से आए ओशो संन्यासियों और साधकों द्वारा किया जा रहा है। इनमें हरियाणा से स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती, गुरु मां अमृत प्रिया, मां मंजूशा, नेपाल से मां अनामिका, दिल्ली से स्वामी चैतन्य सागर तथा महाराष्ट्र से स्वामी दिगम्बर प्रमुख रूप से शामिल हैं।
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