वास्तविक अत्याचार के मामलों में कठोर कार्रवाई के साथ निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की मांग
कोटा। स्मार्ट हलचल।अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के कथित दुरुपयोग और इसके संभावित प्रभावों को लेकर समता आंदोलन समिति ने मुख्यमंत्री के नाम जिला कलेक्टर के माध्यम से ज्ञापन सौंपा। समिति ने स्पष्ट किया कि उसका विरोध किसी जाति या समुदाय के संवैधानिक अधिकारों से नहीं, बल्कि ऐसे मामलों में कानून के निष्पक्ष, समान और प्रमाण-आधारित प्रयोग की मांग से है।समिति ने ज्ञापन में कहा कि वास्तविक जातिगत अत्याचार और भेदभाव की घटनाओं में कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन व्यक्तिगत विवाद, शैक्षणिक या संस्थागत विवाद, सेवा संबंधी मामलों अथवा वैचारिक मतभेदों में कानून के प्रावधानों के प्रयोग की प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है। समिति के अनुसार केवल शिकायत या FIR दर्ज होने के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी मानना उचित नहीं होना चाहिए और जांच के दौरान निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भी रक्षा की जानी चाहिए।
ज्ञापन में हाल के कुछ मामलों का उल्लेख करते हुए समिति ने स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया। IIT Bombay के छात्र साहिल वाकोडे की मृत्यु के मामले में उनके परिवार की शिकायत के आधार पर प्रोफेसर सूर्यनारायण डुल्ला के विरुद्ध FIR में SC/ST Act की धाराएं भी लगाई गई थीं। IIT Bombay ने जातिगत भेदभाव की शिकायत किए जाने के संबंध में अलग पक्ष रखा था और मामले की जांच आगे बढ़ी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार जांच में विभिन्न छात्रों एवं संस्थान के कर्मचारियों के बयान भी दर्ज किए गए। समिति ने कहा कि इस मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही निकलना चाहिए।
इसी प्रकार यूट्यूबर अजीत भारती के मामले का उल्लेख करते हुए समिति ने कहा कि यह प्रकरण भी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को SC/ST Act से जुड़े मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज की थी। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि यदि FIR और उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथमदृष्टया SC/ST Act के तहत अपराध बनता है तो अधिनियम में अग्रिम जमानत पर लागू वैधानिक बाधाएं प्रभावी होती हैं।
समिति ने मुख्यमंत्री से मांग की कि SC/ST Act से जुड़ी शिकायतों की निष्पक्ष एवं वरिष्ठ स्तर पर समीक्षा की व्यवस्था विकसित की जाए। जांच एजेंसियां उपलब्ध साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शी बयानों, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और घटनाक्रम की वास्तविक पृष्ठभूमि का निष्पक्ष परीक्षण करें। समिति ने यह भी मांग की कि जांच में शिकायत झूठी या दुर्भावनापूर्ण सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
ज्ञापन में कहा गया कि वास्तविक जातिगत अत्याचार और सामान्य व्यक्तिगत, व्यावसायिक, शैक्षणिक या वैचारिक विवाद के बीच कानूनी अंतर स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाना चाहिए। केवल किसी व्यक्ति की सामाजिक श्रेणी या शिकायत के आधार पर घटना को स्वतः विशेष कानून के अंतर्गत मानने के बजाय उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण किया जाना चाहिए।
समता आंदोलन समिति ने सरकार से यह भी आग्रह किया कि कानून के कठोर प्रावधानों के कारण निर्दोष व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा प्रभावित न हो, इसके लिए विधि विशेषज्ञों, न्यायविदों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाए। समिति ने संसद एवं संबंधित सरकार से भी कानून के मूल उद्देश्य, यानी वास्तविक अत्याचार से संरक्षण, को कायम रखते हुए दुरुपयोग की शिकायतों से निपटने के लिए प्रभावी और स्पष्ट सुरक्षा उपायों पर विचार करने की मांग की।
समिति ने कहा कि वास्तविक जातिगत अत्याचार के दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन केवल आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी मान लेना भी न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। उसका आग्रह है कि कानून का प्रयोग समानता, निष्पक्षता और प्रमाण के आधार पर हो। जिला कलेक्टर कोटा के अनुपस्थिति में संभागीय अध्यक्ष डॉक्टर अनिल शर्मा के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने अतिरिक्त जिला कलेक्टर को ज्ञापन दिया इस अवसर पर जिला अध्यक्ष गोपाल गर्ग संभागीय महामंत्री कमल सिंह महामंत्री रासबिहारी पारीक संयोजक राजेंद्र गौतम व एससी एसटी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष छितर लाल, ओबीसी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष हरिशंकर सैनी शहर अध्यक्ष शंकरलाल सिंघल,मंत्री श्रवण सोनी सहित कोटा में सभी विभागों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। सभी प्रतिनिधियो ने इसके दुरपयोग पर आक्रोश व्यक्त कर इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।