(बद्री लाल माली)
गुरला:- स्मार्ट हलचल।भीलवाड़ा जिले के सुवाणा पंचायत समिति की ग्राम पंचायत गुरला का एक ऐसा मार्ग जो विकास की सारी कहानी बयां करता है। हम बात कर रहे हैं *टीला का खेड़ा से राजपुरा होते हुए नेशनल हाईवे को जोड़ने वाली मुख्य सड़क* की। करीब आधा किलोमीटर से ज्यादा लंबी यह सड़क आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। सरकार कहती है गांव-गांव को सड़कों से जोड़ दिया, लेकिन इस सड़क की हकीकत देखकर लगता है जैसे आजादी के बाद से यहां एक ईंट भी नहीं लगी।
*12 साल पुरानी सड़क, अब नामोनिशान मिटा:*
स्थानीय ग्रामीण राम देव गुर्जर ने बताया कि इस सड़क का निर्माण आज से लगभग 12 से 13 साल पहले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना या ग्राम पंचायत के माध्यम से हुआ था। उसके बाद से आज तक इस सड़क की कभी मरम्मत तक नहीं हुई। ऊपर से कुछ महीनों पहले चंबल पेयजल परियोजना की बड़ी पाइपलाइन डालने के लिए इस पूरी सड़क को बीच से खोद दिया गया। ठेकेदार ने पाइपलाइन तो डाल दी, लेकिन सड़क को वापस ठीक करना जरूरी नहीं समझा। जेसीबी से खोदी गई मिट्टी को ऐसे ही छोड़ दिया गया, जिससे पहली बरसात में ही सड़क दलदल में तब्दील हो गई।
*फोटो गवाही दे रही है – बच्चे कैसे जाते हैं स्कूल:*
आपके द्वारा भेजी गई तस्वीर इस पूरे भ्रष्टाचार और लापरवाही की जीती-जागती गवाह है। फोटो में तीन स्कूली छात्राएं बस्ता टांगे, स्कूल ड्रेस में कीचड़ और गंदे पानी से बचते हुए किनारे-किनारे चल रही हैं। सड़क के बीच में बड़ा गड्ढा है जिसमें बरसात का पानी भरा है और उसमें कीचड़ ही कीचड़ है। दोनों तरफ कच्चे मकान और दीवारें हैं। सुबह-सुबह बच्चे जब स्कूल जाते हैं तो उन्हें रोज इसी नरक से गुजरना पड़ता है।
एक छात्रा ने बताया कि कई बार वह कीचड़ में फिसल कर गिर जाती है, जिससे उसकी स्कूल ड्रेस खराब हो जाती है और उसे वापस घर जाकर ड्रेस बदलनी पड़ती है, जिससे वह स्कूल में लेट हो जाती है। शिक्षक डांटते हैं सो अलग।
*स्कूली बच्चों के साथ-साथ महिलाओं और बुजुर्गों का भी बुरा हाल:*
यह सड़क सिर्फ टीला का खेड़ा की नहीं, बल्कि राजपुरा, गुरला और आसपास के कई गांवों को नेशनल हाईवे से जोड़ने वाला एकमात्र सीधा रास्ता है। इस पर दिनभर सैकड़ों लोगों का आना-जाना लगा रहता है। महिलाओं को दूध लेकर डेयरी पर जाना, मजदूरों को काम पर जाना, बीमार लोगों को अस्पताल ले जाना, सब इसी रास्ते से होता है। लेकिन सड़क टूटी होने से कोई भी ऑटो, टेंपो या एम्बुलेंस इस गली में नहीं आती। मजबूरी में बीमार व्यक्ति को खाट पर लादकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। बरसात में तो स्थिति ऐसी हो जाती है कि दोपहिया वाहन भी नहीं निकल पाता।
*प्रशासन की अनदेखी, पंचायत बनी मूकदर्शक:*
ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने इस बारे में कई बार ग्राम पंचायत गुरला के सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी, पंचायत समिति सुवाणा के विकास अधिकारी और यहां तक कि भीलवाड़ा जिला कलेक्टर को भी लिखित में शिकायत दी है, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई। सब एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं। पंचायत कहती है यह पीडब्ल्यूडी की रोड है, पीडब्ल्यूडी कहता है यह पंचायत की है और चंबल परियोजना वाले कहते हैं हमारा काम तो पाइपलाइन डालना था, सड़क बनाना हमारा काम नहीं। इस कागजी फुटबॉल में पिस रही है आम जनता।
*चंबल परियोजना बनी अभिशाप:*
जिस चंबल परियोजना से लोगों को उम्मीद थी कि घर-घर मीठा पानी आएगा, वही परियोजना अब उनके लिए अभिशाप बन गई है। ठेकेदार की मनमानी से पूरी सड़क तबाह हो गई। नियम कहता है कि जहां भी सड़क खोदो, उसे 48 घंटे में वापस पहले जैसी बना दो, लेकिन यहां 6 महीने हो गए, सड़क जस की तस पड़ी है। मिट्टी धंस गई है, गड्ढे हो गए हैं। *विकास के दावे खोखले:* सरकार हर मंच से कहती है – बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। लेकिन इस रोड की हालत देखकर लगता है कि कैसे बेटियां पढ़ पाएंगी? जब स्कूल जाने का रास्ता ही कीचड़ से भरा हो तो शिक्षा का अधिकार कैसे मिलेगा? यह सड़क स्वच्छ भारत मिशन, शिक्षा के अधिकार और ग्रामीण विकास के सारे दावों की पोल खोल रही है टीला का खेड़ा, राजपुरा और गुरला के समस्त ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि इस सड़क का तुरंत सर्वे करवाया जाए और इसे सीसी रोड या डामरीकरण कर पक्का बनाया जाए। साथ ही दोनों तरफ नाली निर्माण भी किया जाए ताकि पानी सड़क पर न भरे। अगर जल्द ही इस सड़क का निर्माण नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने आंदोलन करने और जिला कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है।
अब देखना यह है कि इस खबर के बाद प्रशासन की नींद खुलती है या फिर बच्चों को इसी तरह कीचड़ में अपना भविष्य तलाशना पड़ेगा।