जलियांवाला बाग से छह साल पहले हुए मानगढ़ गोलीकांड को राष्ट्रीय इतिहास में उचित स्थान देने की उठी आवाज, पाठ्य-पुस्तकों में भी शामिल करने की मांग
✍️राकेश मीणा
भीलवाड़ा।स्मार्ट हलचल|मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग को लेकर अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने निर्णायक आवाज बुलंद की है। भीलवाड़ा के रामेश्वरम भवन में 30 सितंबर से चल रही केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक में मानगढ़ धाम को अविलंब राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र सरकार से मानगढ़ के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व के अनुरूप संरक्षण और विकास सुनिश्चित करने की मांग की गई।बैठक में मानगढ़ के बलिदानी इतिहास को देश की मुख्यधारा के इतिहास में उचित स्थान देने, राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के स्कूल-कॉलेजों की पाठ्य-पुस्तकों में मानगढ़ की गौरवगाथा को शामिल करने तथा इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाने पर जोर दिया गया।
1913 का मानगढ़ गोलीकांड, आज भी जिंदा है बलिदान की गाथा
प्रस्ताव में कहा गया कि 17 नवंबर 1913 को वागड़ क्षेत्र में संत गोविंद गुरु के नेतृत्व में चल रहे भगत आंदोलन को कुचलने के लिए ब्रिटिश शासन ने मानगढ़ धाम में भीषण गोलीकांड किया था। संगठन के अनुसार इस घटना में 1500 से अधिक जनजातीय महिला, पुरुष और बच्चे मारे गए थे।
मानगढ़ की पहाड़ियों पर हुआ यह नरसंहार 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड से छह वर्ष पहले हुआ था। इसके बावजूद मानगढ़ की बलिदान गाथा को वह राष्ट्रीय पहचान नहीं मिल सकी, जिसकी वह हकदार है। अब वनवासी कल्याण आश्रम ने इस इतिहास को राष्ट्रीय स्मृति में प्रतिष्ठित करने की मांग उठाई है।
संत गोविंद गुरु के नेतृत्व में जगी थी जनजातीय चेतना
बैठक में कहा गया कि संत गोविंद गुरु के नेतृत्व में चला भगत आंदोलन केवल अंग्रेजी शासन के दमनकारी कानूनों के खिलाफ संघर्ष नहीं था, बल्कि इसने जनजातीय समाज में अपनी संस्कृति, आस्था, परंपराओं और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूकता भी पैदा की।
मानगढ़ का आंदोलन राजस्थान के दक्षिणी क्षेत्र से निकलकर गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के जनजातीय क्षेत्रों तक पहुंचा। इस आंदोलन ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष की चेतना को व्यापक किया और जनजातीय समाज को अपने अधिकारों तथा अस्मिता के लिए संगठित किया।
आजादी के बाद भी नहीं मिला मानगढ़ को उचित सम्मान
केंद्रीय कार्यकारी मंडल ने प्रस्ताव में कहा कि स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेक स्थलों और घटनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली, लेकिन जनजातीय समाज के अनेक बलिदानों को इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिला।
मानगढ़ इसी पीड़ा का प्रतीक है। प्रस्ताव में कहा गया कि जिस जनजातीय समाज ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया, उसकी शहादत को राष्ट्रीय इतिहास में सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए।
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी कर चुके हैं मानगढ़ का दौरा
प्रस्ताव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 1 नवंबर 2022 को मानगढ़ धाम पहुंचकर बलिदानी जनजातीय समाज को श्रद्धांजलि देने और राष्ट्रपति के 4 अक्टूबर 2024 को मानगढ़ धाम पहुंचकर बलिदानियों को नमन करने का उल्लेख किया गया।
संगठन ने कहा कि देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा मानगढ़ पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित किया जाना इस स्थल के राष्ट्रीय महत्व को दर्शाता है। ऐसे में अब मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की दिशा में ठोस निर्णय लिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मान्यता की संस्तुति का भी हवाला
प्रस्ताव में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की ओर से मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मान्यता देने की सिफारिश का भी उल्लेख किया गया। वनवासी कल्याण आश्रम ने कहा कि ऐतिहासिक महत्व, जनजातीय समाज के बलिदान और उपलब्ध अध्ययन-सामग्री को देखते हुए केंद्र सरकार को अब इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
सिर्फ स्मारक नहीं, संरक्षण और विकास भी हो
वनवासी कल्याण आश्रम ने मांग की कि मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने के साथ ही इसके ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व के अनुरूप संरक्षण और विकास किया जाए। मानगढ़ से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्यों और स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए विशेष प्रयास किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सकें।
स्कूल-कॉलेज की किताबों में पढ़ाई जाए मानगढ़ की गाथा
प्रस्ताव में राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश सरकारों से विशेष आग्रह किया गया कि इन राज्यों के स्कूल-कॉलेजों की पाठ्य-पुस्तकों में मानगढ़ के इतिहास और जनजातीय समाज के बलिदान को उचित स्थान दिया जाए।
संगठन का कहना है कि इतिहास केवल बड़े शहरों, राजाओं और राजनीतिक आंदोलनों तक सीमित नहीं है। देश की स्वतंत्रता में जंगलों और पहाड़ों में रहने वाले जनजातीय समाज का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए विद्यार्थियों को मानगढ़ की वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका से अवगत कराया जाना जरूरी है।
350 से अधिक पदाधिकारी भीलवाड़ा में जुटे
केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक के बाद 2 और 3 अक्टूबर को भीलवाड़ा के रामेश्वरम भवन में देशभर के प्रांत पदाधिकारियों की व्यापक बैठक भी आयोजित की गई, जिसमें 350 से अधिक पदाधिकारियों के शामिल होने की जानकारी दी गई। बैठक में संगठन के विभिन्न स्तरों पर वनवासी समाज के लिए किए जा रहे कार्यों और आगामी योजनाओं पर भी चर्चा हुई।
पत्रकार वार्ता में वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने संबंधी प्रस्ताव की जानकारी दी। इस दौरान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तेची गुबिन, संयुक्त महामंत्री विष्णुकांत, राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद के अध्यक्ष डॉ. थावरचंद डामोर, प्रचार प्रमुख प्रमोद पेठकर और बैठक के मीडिया एवं प्रचार-प्रसार संयोजक कैलाश सोनी सहित पदाधिकारी मौजूद रहे।
अब मानगढ़ को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की मांग
भीलवाड़ा की बैठक से उठी यह मांग अब केंद्र सरकार के सामने एक स्पष्ट प्रस्ताव के रूप में पहुंची है। मानगढ़ की पहाड़ियों पर 1913 में हुए जनजातीय बलिदान को राष्ट्रीय स्मृति में सम्मानजनक स्थान देने की मांग के साथ वनवासी कल्याण आश्रम ने केंद्र और राज्य सरकारों से मिलकर काम करने का आह्वान किया है।
मानगढ़ की शहादत को इतिहास के पन्नों तक सीमित रखने के बजाय राष्ट्रीय स्मारक के रूप में संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक उसकी गौरवगाथा पहुंचाने की मांग अब भीलवाड़ा की बैठक से मजबूती से उठी है।