व्यंग्य … हम.. रामभरोसे और विरोधाभास

कार्तिकेय त्रिपाठी ‘राम’

स्मार्ट हलचल|मतों की भिन्नता ही जीवन है,जिस पर सवार होकर हर आमो-खास अपने जीवन की अंतिम श्वांस तक कुछ-न-कुछ पा लेने की उत्कंठा में लगा रहता है।भले ही वह धन हो,पद,ऐश्र्वर्य,सुख,
खोज,द्वैष,जलन,अहम
हो इन जैसी सीढि़यों से ऊपर-नीचे, आना-जाना लगा रहता है।पर यहां हमारे लिए तो आत्मिक संतोष इन सबसे बीसा ही साबित होता है।
उस दिन घर में एक पारिवारिक कार्यक्रम था।और वे नववधुओं को -दूधों नहाओ पूतों फलो का अमर आशीर्वाद दे रही थीं, अकस्मात नजदीक खडे़ रामभरोसे बुदबुदा उठे-‘ कभी कभी बेटी फलो भी कह दिया करो माई।
कई जगह वैवाहिक संबंधों को तय करने से पहले लड़का संयुक्त परिवार में रहता है या एकल,यह पहले देखा जाता है।मां भले तीन-चार बहुओं का सुख भोग रही हो पर बेटी के लिए तो इकलोता बेटा ही वर के रूप में सही पसंद होता है। यहां बेटी पराया धन हो जाती है और बेटा धन का स्त्रोत।
कुछ मित्र उस रात्रि घर आ गए,मां के पलंग का सिरहाना पश्चिम की ओर देख वे बोल उठे,इस दिशा में सिर रख कर सोने से तो उम्र का क्षय होता है।तब 92 वर्षीय मां के कानों में भी यह स्वर पड़े,सुन कर वह होले से मुस्कुरा भर दी।
इस वर्ष के गणेशोत्सव में हमें भी आरती के आगाज करने का सुअवसर मिला।और जब बांझन को पुत्र देत .. की जगह .. बांझन को संतान देत ..का बदलाव किया तो कई धुंधली पड़ती आंखें हमें वक्र दृष्टि से देखने लगीं।
सदन की ही बात करें तो वेतन,भत्ते व अन्य सुविधाओं की बढ़ोतरी पर वे सब तुरंत एकमत हो जाते हैं,पर समाज के नौकरी-पैसा कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने में वे सब एक मत हो का नारा बुलंद करने लगते हैं।
कहीं भूखे को दो-जून की रोटी नसीब नहीं होती और वे जेल में रहकर भरपेट भोजन तो भोजन,बाद में हाजमें की गोली भी खाते हैं।हमसे हजार-पांच सौ की चूक हो जाए तो धब्बा और वे करोड़ों खाकर अखबार की सुर्खियां बन जाते हैं।
काव्य साहित्य लेखन में हिंदी साहित्य रत्न..पीएचडी, साहित्य विषारदों को ही लेखन का अधिकारी माना जाता है, एमबीबीएस,एमकांम, किसान, पनवाड़ी,सुनार, लुहार ,के बस में लेखन नहीं होता,पर लेखनी अब धारणाएं बदल रही है।हम हिन्दुस्तान में हैं,हम दो हमारे दो या बस एक की सोच बदली है। यहां तक की बेटी भी भविष्य में मोक्ष का घोतक बन चुकी है।तो वहीं दूसरी और कुछ कुंठाएं जरूर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अभी भी मात्र बेटे की लालसाएं लेकर बलवती हो रही हैं।
रामभरोसे के घर की बिजली गई तो पड़ोस में देखकर खुश हो रहे हैं कि उनकी भी गई।अपने-अपने तरीके हैं खुश होने के। कभी प्राकृतिक हंसी फूट पढ़ें तो कहा जाएगा,अरे बस..बस, क्या लाटरी निकल गई है,और योग केन्द्र में नकली हास्य बटोरकर लाइलाज बीमारियों का निदान खोजा जा रहा है।
भिन्न-भिन्न रसायन द्रव्य लेपों द्वारा चेहरे को सुन्दर बनाने से पहले बेहद डरावना बना दिया जाता है।अपने रामभरोसे तो-“तन की सुन्दरता को क्या तू चिर जीवन दे पाएगा,मन का जो श्रृंगार किया तो तू जीवन पा जाएगा ” जैसी पंक्तियां लिखकर सौंदर्य की नई परिभाषा गढ़कर मनभर आत्मसंतुष्टि का अहसास पा रहे हैं।
सच ही है हांथी के दांत खाने के और होते हैं और दिखाने के और ..पर हम तो यही कहेंगे-संतोषी सदा सुखी।फिर मिलते हैं राम-राम…।