जीवन में बदलाव लाए चातुर्मास की सीख, 15 अक्टूबर को निकलेगी पंचमी गोटकाजी की शोभायात्रा

आचार्य रामदयालजी महाराज बोले—धर्म की बातों को जीवन में उतारें, तभी चातुर्मास की साधना होगी सार्थक
भीलवाड़ा, 11 अक्टूबर।स्मार्ट हलचल|चातुर्मास केवल धार्मिक प्रवचनों को सुनने का अवसर नहीं, बल्कि अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम है। चातुर्मास में सुनी गई धर्म की बातों को यदि जीवन में आत्मसात किया जाए, तो व्यक्ति का जीवन पवित्र और सार्थक बन सकता है। चातुर्मास की वास्तविक सफलता इसी में है कि इसके समापन के बाद भी धर्म के प्रति आस्था और आचरण में बदलाव दिखाई दे। यह विचार अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी रामदयालजी महाराज ने रविवार को माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग में व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने बताया कि आसोज शुक्ल पंचमी के अवसर पर 15 अक्टूबर को पंचमी गोटकाजी की शोभायात्रा निकाली जाएगी। यह शोभायात्रा चातुर्मास के समापन की ओर बढ़ने का संकेत होगी। उन्होंने कहा कि समय का चक्र निरंतर चलता रहता है। प्रसन्नता के पल कब बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता, लेकिन विदाई के क्षण हृदय को भावुक कर देते हैं। चातुर्मास 22 अक्टूबर को पूर्ण होगा। इस बीच श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री से दीपावली तक भीलवाड़ा में प्रवास कर आशीर्वाद प्रदान करने की भावपूर्ण विनती की है।
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज की इच्छा से भीलवाड़ा में पांच बार चातुर्मास का योग बना है। अगला चातुर्मास कहां होगा, यह कोई नहीं जानता। इस संबंध में अभी से कोई चर्चा करना निरर्थक है। रंग पंचमी के अभिजीत मुहूर्त में स्वामी रामचरणजी महाराज की प्रेरणा से ही चातुर्मास का स्थान तय होता है।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास का महत्व केवल धार्मिक आयोजन करने या प्रवचन सुनने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य जीवन में सद्भाव, संयम और धर्म के प्रति समर्पण बढ़ाना है। यदि चातुर्मास पूरा हो जाए और व्यक्ति के जीवन में कोई बदलाव नजर न आए, तो समझना चाहिए कि सुनी गई बातों को पूरी तरह आत्मसात नहीं किया गया। संत का कार्य सत्संग के माध्यम से धर्म का संदेश देना है, लेकिन उस संदेश को अपने आचरण में उतारना प्रत्येक श्रद्धालु की जिम्मेदारी है। जो व्यक्ति संतों की सीख को अंगीकार करता है, उसका जीवन पवित्र बन जाता है।
आचार्यश्री ने भीलवाड़ा चातुर्मास को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी श्रद्धालुओं की सराहना करते हुए उन्हें साधुवाद दिया। उन्होंने चातुर्मास के तीन प्रमुख आयोजक भामाशाह अजमेरा परिवार, गगरानी परिवार और ईनाणी परिवार की सेवा एवं भक्ति भावना की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि चातुर्मास संपत्ति देखकर नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और शुभ भक्ति भावों से प्राप्त होता है। जहां सच्ची आस्था और सेवा की भावना होती है, वहीं धर्म की प्रभावी साधना संभव होती है।
आचार्यश्री से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिए। प्रवचन के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
रामद्वारा धाम में प्रतिदिन सुबह 8.30 से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ किया जा रहा है। इसके बाद सुबह 9 बजे से दैनिक सत्संग आयोजित होता है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती तथा रामस्नेही संप्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल कथा का वाचन किया जा रहा है, जिसमें भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।