प्रशासनिक मिलीभगत और अनियोजित विकास का ‘काला दौर’

प्राकृतिक नालों भ्रष्टाचारियों को अभयदान
अवैध निर्माण पर नगर परिषद की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल

खोजी रिपोर्ट -आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़।स्मार्ट हलचल|राजस्थान का ऐतिहासिक और स्वाभिमानी जिला मुख्यालय चित्तौड़गढ़ आज अपनी बदहाली, अनियोजित विकास और प्रशासनिक-राजनीतिक मिलीभगत के सबसे काले दौर से गुजर रहा है। पूर्व में भी समाचार पत्र एवं जागरूक नागरिकों द्वारा शहर के प्रमुख नालों पर हो रहे अवैध अतिक्रमणों की ओर आयुक्त एवं जिला प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया गया था, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों के कान पर ‘जूँ तक नहीं रेंगी’। प्रशासनिक बेपरवाही का ताजा और सबसे शर्मनाक उदाहरण गंभीरी पुलिया पार सुभाष चौक से लेकर गोल प्याऊ के बीच (सूचना केंद्र के बाहर) देखने को मिल रहा है। जहाँ एक प्राकृतिक नाले का अस्तित्व समाप्त कर उस पर धड़ल्ले से पक्का निर्माण खड़ा किया जा रहा है। पुर्वकाल में हुई बारिश के दौरान शहर में हुए भीषण जलभराव का मुख्य कारण प्राकृतिक नालों से की गई छेड़छाड़ और नियम-विरुद्ध दिए गए अतिक्रमण ही हैं, जिसने पूरे शहर का नक्शा और फिजा बिगाड़ कर रख दी है।
पुराने ढक्कन, नया षड्यंत्र ,भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा
सूत्रों के अनुसार, इसी प्राकृतिक नाले पर पूर्व में नगर परिषद द्वारा एक विवादास्पद निर्माण अनुमति जारी की गई थी। उसी पुरानी अनुमति का आड़ लेकर निर्माणकर्ता ने पुराने ढांचे को ध्वस्त कर नए सिरे से विशाल निर्माण कार्य शुरू कर दिया। जब मौके का मुआयना किया गया, तो नाले के ऊपर बड़े-बड़े सीमेंट के ढक्कन (स्लैब) डालकर नाले को पूरी तरह ढकने का षड्यंत्र सामने आया। मामले की तहकीकात करने पर जो तथ्य सामने आए, वे नगर परिषद के दावों की धज्जियां उड़ाने वाले हैं ।
राजस्व एवं अतिक्रमण शाखा की त्वरित रिपोर्ट- अतिक्रमण अधिकारी एवं राजस्व अधिकारी ने मौके का निरीक्षण कर स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तुरंत अपने उच्च अधिकारियों (आयुक्त) को रिपोर्ट सौंप दी ।
निर्माण स्वीकृति की वैधता समाप्त- गुरुवार को जब निर्माण स्वीकृति अधिकारी से सीधा संवाद किया गया, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि पूर्व में जारी की गई अनुमति अब पूरी तरह अमान्य हो चुकी है, क्योंकि निर्माण अनुमति की समय-सीमा अधिकतम 5 वर्ष होती है। वर्तमान में नगर परिषद द्वारा इस निर्माण के लिए कोई नई स्वीकृति जारी नहीं की गई है।
जब स्वीकृति ही नहीं, तो निर्माण कैसे ? आयुक्त पर संदेह
यहाँ सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि जब निर्माण की कोई वैध स्वीकृति ही नहीं है, तो दिन-दिहाड़े शहर के मुख्य मार्ग पर यह अवैध निर्माण किसकी शह पर चल रहा है ? निचले स्तर के अधिकारियों ने अपना दायित्व निभाते हुए रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी, लेकिन आयुक्त महोदय ने अब तक इस अवैध निर्माण को ध्वस्त करने या काम रुकवाने का कोई औपचारिक आदेश क्यों जारी नहीं किया ? नगर परिषद में जब से नया बोर्ड गठित हुआ है, तब से एक अजीबोगरीब ‘प्रथा’ ने जन्म ले लिया है। आम जनता या पीड़ित व्यक्ति जब भी अपनी जायज शिकायत लेकर आयुक्त के पास जाता है, तो उनका रटा-रटाया जवाब होता है: ” सभापति जी से बात कीजिए !”
माननीय आयुक्त महोदय को यह याद दिलाने की जरूरत है कि प्रशासनिक और कार्यपालक अधिकार शासन की नियमावली के तहत आयुक्त के पास निहित होते हैं, न कि बोर्ड के राजनीतिक प्रमुख के पास । परंतु, ऐसा प्रतीत होता है कि भ्रष्टाचारी तंत्र और नगर परिषद को घुन की तरह चाट रही राजनीतिक दीमक ने प्रशासनिक तंत्र के हाथ पूरी तरह बांध दिए हैं ।
दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली है !
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू ‘नेतानगरी’ का सीधा हस्तक्षेप है। जैसे ही इस अवैध निर्माण पर जांच की आंच पहुंची, वैसे ही ‘वाया-वाया’ एक प्रभावशाली नेताजी का फोन गनगनाने लगा, और एक सीधा फोन भी दबाव बनाने की नीयत से आया । नेताओं का इस तरह अवैध निर्माणकर्ताओं के बचाव में कूद पड़ना यह साफ बयान करता है कि ‘दाल में कुछ काला नहीं है, बल्कि पूरी की पूरी दाल ही काली है!’ शहर के प्राकृतिक संसाधनों को बेचकर अपनी जेबें भरने का यह खेल अब बेनकाब हो चुका है।
खुद संज्ञान लें जिलाधिकारी
नगर परिषद के ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ वाले रवैये से अब शहरवासियों का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। नगर परिषद का नया बोर्ड और प्रशासनिक मुखिया दोनों ही कर्तव्यविमूढ़ स्थिति में नजर आ रहे हैं। अब चित्तौड़गढ़ की जनता की अंतिम उम्मीद जिला कलेक्टर एवं जिला प्रशासन पर टिकी है। प्रशासन से पुरजोर मांग है कि इस पूरे प्रकरण पर स्वयं संज्ञानलेते हुए । सूचना केंद्र के बाहर हो रहे इस अवैध निर्माण को तत्काल प्रभाव से सीज/ध्वस्त कराया जाए । प्राकृतिक नालों पर दिए गए पुराने व नए अवैध आवंटनों की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। राजनीतिक दबाव में काम करने वाले या मौन स्वीकृति देने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए।