गंभीरी नदी ब्रिज सुधार कार्य में नगर परिषद के इंजीनियर्स का खेल बेनकाब……….
ऑडिट ने तत्कालीन कमिश्नर, एक्सएन और एएन से व्यक्तिगत वसूली व आपराधिक मुकदमे की दी अनुशंसा
विशेष खोजी रिपोर्ट-आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ । स्मार्ट हलचल|नगर परिषद चित्तौड़गढ़ का निर्माण विभाग भ्रष्टाचार और नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाने का ऐसा केंद्र बन चुका है, जहां चहेते ठेकेदारों की तिजोरियां भरने के लिए न केवल सरकारी खजाने पर बेखौफ डाका डाला जा रहा है, बल्कि सरकार की नाक के नीचे करोड़ों का चूना लगाने का एक और सनसनीखेज महा-घोटाला बेनकाब हुआ है। स्थानीय निधि अंकेक्षण विभाग की नवीनतम और गोपनीय ऑडिट रिपोर्ट ने नगर परिषद के भीतर चल रहे ‘अफसर-ठेकेदार नेक्सस’ का ऐसा प्रामाणिक पोस्टमार्टम किया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। इस चौंकाने वाले दस्तावेजी खुलासे में सामने आया है कि कैसे ‘गंभीरी नदी पर 2-Lane हाई लेवल ब्रिज सुधार कार्य’ में तत्कालीन आला प्रशासनिक हुक्मरानों और तकनीकी अभियंताओं की चौकड़ी ने मिलीभगत कर तकनीकी और वित्तीय धांधली का ऐसा ‘कागजी जादू’ खेला, जिसने राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता (RTPP) अधिनियम की आत्मा को ही तार-तार कर दिया। वित्तीय बोलियां खुलने के बाद टेंडर की मूल शर्तों और आधार वर्ष (BSR) को ही बदल देने का यह अपने आप में एक ऐसा अनोखा और आपराधिक कृत्य है, जिसे लेकर खुद अंकेक्षण दल ने तत्कालीन कमिश्नर और अधिशासी अभियंतों की व्यक्तिगत गर्दन नापने, उनसे पाई-पाई की रिकवरी करने और उनके खिलाफ नामजद क्रिमिनल केस (FIR) दर्ज कराने की कड़क अनुशंसा कर दी है।
क्या था पूरा मामला और तकनीकी हेरफेर?
अंकेक्षण प्रतिवेदन के पैरा 12 में दर्ज आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, नगर परिषद चित्तौड़गढ़ द्वारा गटियावली रोड से चामटी का खेड़ा रोड के मध्य २-लेन हाई लेवल ब्रिज सुधार कार्य हेतु 148.00 लाख (1.48 करोड़ रुपये) की निविदा आमंत्रित की गई थी। इस पूरी निविदा प्रक्रिया का वैधानिक आधार BSR वर्ष 2019 तय किया गया था।
जब इस कार्य की तकनीकी और वित्तीय बोलियां खोली गईं, तो न्यूनतम बोलीदाता (L-1) के रूप में सामने आई, जिसकी दरें परिषद द्वारा तय शुदा BSR से 32.33% अधिक थीं । सार्वजनिक धन की शुचिता का नियम कहता है कि इतनी ऊंची दरों पर टेंडर को तत्काल निरस्त किया जाना चाहिए था, लेकिन नगर परिषद के तकनीकी कारिंदों ने संवेदक को उपकृत करने के लिए नियमों को ही बदल डाला।
वित्तीय बोली खुलने के बाद बदल दिया टेंडर का ‘बेस’
दस्तावेजों के अनुसार, वित्तीय बोलियां सार्वजनिक होने के बाद, उपापन समिति और तकनीकी विंग ने नियमों के विपरीत जाकर टेंडर का मूल आधार वर्ष ही बदल दिया। BSR वर्ष 2019 को हटाकर उसे जबरन BSR वर्ष 2022 कर दिया गया। नियमों के विरुद्ध किए गए इस हेरफेर का एकमात्र मकसद संवेदक फर्म की ऊंची दरों 32.33% को कागजों में कम दिखाना था, जो सीधे तौर पर एक आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है ।
सरकार को लगा 48 लाख का चूना, 1.16 करोड़ का हुआ भुगतान
इस प्रशासनिक और तकनीकी जादूगरी का सीधा खमियाजा राजकोष को भुगतना पड़ा । जो काम 1.48 करोड़ की मूल निविदा दर पर होना चाहिए था, उसकी कागजी लागत सीधे बढ़कर 1.96 करोड़ रुपये हो गई। यानी सीधे-सीधे 48,11,518/- की अतिरिक्त वित्तीय चपत सरकार को लगाई गई। इतना ही नहीं, ऑडिट आक्षेप के अनुसार, इस हेरफेर वाले टेंडर को आधार मानकर परिषद द्वारा संवेदक फर्म को 1,16,11,821/- का नियम विरुद्ध भुगतान भी जारी कर दिया गया। इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजस्थान विधानसभा सत्र 2024-25 में भी इस पर सवाल उठ चुके हैं और जांच दल द्वारा जारी मीमो संख्या 549 दिनांक 05.05.2026 का परिषद द्वारा दिया गया प्रत्युत्तर पूरी तरह असंतोषजनक पाया गया है ।
ये अधिकारी आए ऑडिट के रडार पर
अंकेक्षण विभाग ने इस गंभीर वित्तीय और तकनीकी अनियमितता को अक्षम्य मानते हुए निर्माण अनुभाग के उन शीर्ष चेहरों को नामजद किया है, जिनकी कलम से इस विसंगतिपूर्ण खेल को अंजाम दिया गया । रिन्कल गुप्ता तत्कालीन आयुक्त प्रशासनिक मुखिया होने के नाते निविदा प्रक्रिया की इस गंभीर विसंगति को अंतिम प्रशासनिक व वित्तीय स्वीकृति देने की मुख्य दोषी । महेन्द्र प्रकाश व्यास (अधिशासी अभियंता – कार्य अवधि) मुख्य तकनीकी अधिकारी, जिनके कार्यकाल में टेंडर का परीक्षण हुआ और वित्तीय बोलियां खुलने के बाद नियमों के विपरीत BSR बदलने की नोटशीट को आगे बढ़ाया गया । जितेन्द्र मीणा (अधिशासी अभियंता – भुगतान) बिना वैधानिक शुद्धता जांचे, संवेदक को 1.16 करोड़ से अधिक के रनिंग बिल धड़ाधड़ पास करने के जिम्मेदार। मुनीर अली (सहायक अभियंता – AEN) मौके पर तकनीकी विसंगति और मापन पुस्तिका (MB) के सत्यापन में लापरवाही बरतने के दोषी ।
ऑडिट टीम की कड़क अनुशंसा, FIR दर्ज हो और जेब से हो वसूली !
निदेशक और उपनिदेशक, स्थानीय निकाय विभाग को प्रेषित विशेष अंकेक्षण निष्कर्ष में साफ तौर पर निर्देश दिए गए हैं कि इस पूरे टेंडर घोटाले और लागत वृद्धि की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। राज्य सरकार को हुई वित्तीय हानि के अनुपात में इन चारों जिम्मेदार अधिकारियों ( रिन्कल गुप्ता, महेन्द्र प्रकाश व्यास, जितेन्द्र मीणा, मुनीर अली ) की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय कर इनकी जेब/वेतन से रिकवरी वसूली की जाए । राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता (RTPP) अधिनियम 2012 की धारा 41 व 42 के तहत इन अधिकारियों के खिलाफ नामजद आपराधिक मुकदमा FIR दर्ज किया जाए । भविष्य में बिना भूमि स्वामित्व और सक्षम वित्तीय स्वीकृति के कोई भी कार्य न किए जाने के कठोर निर्देश जारी किए जाएं।
यह तो महज़ एक बानगी है । नगर परिषद के अन्य विभागों के साथ-साथ निर्माण विभाग में ठेकेदारों और अफसरों के इस ‘सिंडिकेट’ ने शहर के विकास के नाम पर और कहाँ-कहाँ चूना लगाया है इसके एक-एक प्रामाणिक पन्ने हम लगातार खोलते रहेंगे। जुड़े रहिए हमारे साथ…