आचार सहिता की उड़ रही धज्जिया…
विशेष लेख – आकाश शर्मा
मंडफिया ।स्मार्ट हलचल|मैं कलम हूँ… सत्ता के दरबार की नहीं, जनता की आवाज हूँ।
सृजन से विसर्जन तक का सच लिखता हूँ। मेरी स्याही किसी सिंहासन की अनुचर नहीं है, बल्कि यह वक्त की खींची गई वह लकीर है, जिससे तख्त हिलते हैं और ताज बनते हैं।
सत्ता के गलियारों में गूंज, जनता की खामोशी में सुलगता हुआ एक तीखा सवाल है। खबरें नहीं, उनके पीछे छिपी हकीकत लिखता हूँ। सत्ता का बनना और मिटना जनता तय करती है और मैं उसी संघर्ष का इतिहास लिखता हूँ । मेरा धर्म और कर्म सवाल पूछना और राह दिखाना है। मेरी ताकत कोई सत्ता नहीं, बल्कि जनता है ।
मेवाड़ के सुप्रसिद्ध कृष्णधाम श्री सांवलियाजी की पावन नगरी मंडफिया में इन दिनों विकास के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, उसने श्रद्धालुओं की आस्था और जनता के पैसों का मज़ाक बनाकर रख दिया है। एक तरफ जहां प्राकृतिक जलस्रोतों और जमीनों पर अवैध कब्जों का खेल जारी है, वहीं दूसरी तरफ खुद मंदिर मंडल और प्रशासनिक तंत्र द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई से खड़े किए गए जनउपयोगी ढांचों को बुलडोजर से रौंदा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि आखिर इस अंधेरगर्दी के पीछे असली साजिश किसकी है ?
श्रद्धालुओं के लिए बने शौचालयों पर चला बुलडोजर, जल्दबाजी क्यों ?
ताजा मामला सांवलियाजी मंदिर के समीप पार्किंग स्थल के पास का है, जहाँ श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए करीब 10 साल पहले मंदिर मंडल द्वारा ही सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण कराया गया था । हैरानी की बात यह है कि मंदिर मंडल प्रबंधन ने बिना किसी पूर्व योजना या सार्वजनिक सूचना के इन शौचालयों को जेसीबी की मदद से रातों-रात जमींदोज कर दिया । तोड़फोड़ की इस कार्रवाई में इतनी जल्दबाजी दिखाई गई कि वहां लगे नल, पाइपलाइन, बिजली कनेक्शन और दरवाजों तक को सुरक्षित बाहर निकालने की जहमत नहीं उठाई गई। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिन शौचालयों के इलेक्ट्रिक सामान और नलों को हाल ही में संपन्न हुए मेले से ठीक पहले दुरुस्त करवाया गया था, उन्हें भी बिना सोचे-समझे मलबे में मिला दिया गया । जनता के पैसे से बने इन निर्माणों को इस तरह नेस्तनाबूद करने से स्पष्ट राजकोषीय हानि हुई है, लेकिन इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है ।
विकास का कौन सा मॉडल या रसूखदारों को बचाने का खेल ?
मंदिर मंडल की इस तोड़फोड़ नीति के पीछे आखिर कौन सी कार्ययोजना है, इसकी कोई भी रूपरेखा, स्वीकृति या अनुमानित लागत जनता के सामने सार्वजनिक नहीं की गई है । क्या यह किसी विकास का हिस्सा है या फिर इसके पीछे कोई गहरा षड्यंत्र है ? स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, जिस क्षेत्र में इन शौचालयों को तोड़ा गया है, उसी के आसपास नाले पर बने निजी होटलों और अवैध निर्माणों पर प्रशासन की आंखें पूरी तरह बंद हैं। रसूखदारों के अवैध निर्माणों को बचाने के लिए यदि जनता और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को बलि चढ़ाया जा रहा है, तो यह प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता पर एक बहुत बड़ा कलंक है ।
लूट और संरक्षण की राजनीति में पिसती जनता
मंडफिया में चाहे तालाबों का अस्तित्व मिटाना हो, बरसाती नालों की दिशा बदलकर चहेतों को फायदा पहुंचाना हो, या फिर मंदिर मंडल की संपत्तियों और शौचालयों को जमींदोज करना हो—यह सब इस बात का प्रमाण है कि सत्ता में चाहे कोई भी दल आए, आम जनता और भगवान के भक्तों की आस्था का दोहन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। एक तरफ श्रद्धालुओं के लिए बनी बुनियादी सुविधाएं उजाड़ी जा रही हैं, और दूसरी तरफ भू-माफियाओं व अतिक्रमणकारियों को खुली छूट दी जा रही है।
सांवलिया जी की जनता पूछना चाहती है l
सांवलियाजी की यह नगरी केवल एक व्यापारिक केंद्र या राजनीतिक अखाड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों आस्थावानों का तीर्थ है। इस तरह की मनमानी और प्रशासनिक तानाशाही को अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
हमारी स्पष्ट मांग है कि श्वेत पत्र जारी हो,शौचालयों को अचानक तोड़ने के पीछे के वास्तविक कारणों, लागत के नुकसान और मंदिर मंडल की कार्ययोजना को सार्वजनिक किया जाए ।
जवाबदेही तय हो….
एक तरफ जनहित के शौचालयों को तोड़ना और दूसरी तरफ उसी क्षेत्र में नाले पर बने अवैध होटलों को संरक्षण देना,इस दोहरे रवैये की निष्पक्ष जांच हो । जनता के धन की बर्बादी और मंदिरों की व्यवस्थाओं के साथ खिलवाड़ करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों व नुमाइंदों पर सख्त कार्रवाई की जाए।