जहरीले तालाब पर प्रशासन का शिकंजा, सैकड़ों मछलियों की मौत के बाद पानी के उपयोग पर रोक

भीलवाड़ा। मूलचन्द पेसवानी

स्मार्ट हलचल।भीलवाड़ा जिले के बनेड़ा उपखंड क्षेत्र की बेरा ग्राम पंचायत के जसवंतपुरा गांव का धर्म तालाब इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय संकट का केंद्र बन गया है। तालाब के दूषित पानी ने जहां सैकड़ों जलीय जीवों और मछलियों की जान ले ली, वहीं अब प्रशासन ने भी जांच रिपोर्ट के बाद तालाब के पानी के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा दी है। गांव में माइक से घोषणा कर लोगों को तालाब के पानी से दूर रहने और अपने पशुओं को भी यह पानी नहीं पिलाने की हिदायत दी जा रही है।
इस गांव में पिछले करीब पंद्रह दिनों से तालाब में लगातार मछलियों और अन्य जलीय जीवों के मरने की घटनाएं सामने आ रही थीं। तालाब की सतह पर तैरती मृत मछलियां और उनसे उठती दुर्गंध ने ग्रामीणों का जीना मुश्किल कर दिया था। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि गांव के लोगों को स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के साथ-साथ धार्मिक गतिविधियों में भी परेशानी का सामना करना पड़ा। तालाब की पाल पर स्थित धार्मिक स्थल पर आने वाले श्रद्धालुओं को भी बदबू और दूषित वातावरण से दो-चार होना पड़ा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जसवंतपुरा की एएनएम मल्ला मीणा ने पहल करते हुए बनेड़ा के ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी को लिखित सूचना भेजी। उन्होंने तालाब में जलीय जीवों के असामान्य रूप से मरने की जानकारी देते हुए पानी के नमूने जांच के लिए भेजने का आग्रह किया। इसके बाद चिकित्सा विभाग सक्रिय हुआ और धर्म तालाब से पानी के नमूने लेकर जिला मुख्यालय स्थित प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजे गए।

जांच रिपोर्ट आने के बाद स्थिति और भी चिंताजनक साबित हुई। पीएचईडी विभाग के वरिष्ठ रसायनज्ञ द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि तालाब का पानी पीने योग्य नहीं है। रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए तालाब के पानी के उपयोग पर रोक लगा दी। उपखंड अधिकारी के निर्देश पर ग्राम पंचायत को चेतावनी बोर्ड लगाने तथा ग्रामीणों को जागरूक करने के निर्देश दिए गए।
इसके बाद पंचायत प्रशासन ने तालाब के आसपास चेतावनी बोर्ड लगाए और गांव में माइक के माध्यम से घोषणा कर लोगों से अपील की कि वे स्वयं भी इस पानी का उपयोग न करें और अपने गाय, बैल, भैंस, बकरी सहित अन्य पालतू पशुओं को भी यह पानी न पिलाएं। प्रशासन को आशंका है कि दूषित पानी का उपयोग करने से मनुष्यों और पशुओं के स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ग्रामीणों ने भी जिम्मेदारी का परिचय दिया। तालाब में बड़ी संख्या में मछलियों के मरने से फैल रही दुर्गंध को देखते हुए ग्रामीणों ने जनसहयोग से राशि एकत्रित की। इसके बाद मृत मछलियों को तालाब किनारे से हटाकर जंगल क्षेत्र में गहरे गड्ढों में दफन कराया गया ताकि संक्रमण और दुर्गंध का खतरा कम किया जा सके।
ग्रामीणों का कहना है कि तालाब के समीप स्थित देवनारायण मंदिर के पास लगे हैंडपंप से पूरे गांव के लोग पानी भरकर ले जाते थे। लेकिन तालाब में सैकड़ों मछलियों की मौत के बाद लोगों में भय का माहौल है और एहतियातन अधिकांश ग्रामीणों ने हैंडपंप का पानी भी लेना बंद कर दिया है। उन्हें आशंका है कि कहीं दूषित जल का प्रभाव भूजल स्रोतों तक न पहुंच गया हो।
ग्रामीणों ने इस पूरे मामले के लिए बेरा क्षेत्र के पास संचालित एक फैक्ट्री को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि फैक्ट्री से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट और केमिकल खुले में छोड़े जाने के कारण तालाब का पानी जहरीला हुआ है। ग्रामीणों का दावा है कि पूर्व में भी फैक्ट्री प्रबंधन को केमिकल युक्त पानी खुले क्षेत्र में छोड़ते हुए पकड़ा गया था, लेकिन उस समय कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
अब जब सैकड़ों जलीय जीवों की मौत हो चुकी है और पूरा तालाब प्रदूषण की चपेट में आ गया है, तब ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और तालाब को प्रदूषित करने वाले दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई और तालाब को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वे बड़े जनआंदोलन के लिए मजबूर होंगे। जसवंतपुरा का यह मामला अब केवल मछलियों की मौत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।