बजरी कारोबार में कथित एकाधिकार और मनमाने दामों के आरोप; कर्मचारियों के एपीओ व ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर वसूली की चर्चाओं से गरमाया माहौल
मांडलगढ़ (स्मार्ट हलचल)
मांडलगढ़ क्षेत्र में सत्ता के कथित प्रभाव और प्रशासनिक तंत्र पर पकड़ को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल और आरोप गहराते जा रहे हैं। मामला अब केवल निर्माण सामग्री या बजरी कारोबार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकारी महकमों में कर्मचारियों के स्थानांतरण और पदस्थापन (ट्रांसफर-पोस्टिंग) में कथित राजनीतिक दखलअंदाजी भी जनता के बीच खुली चर्चा का विषय बन चुकी है।
बजरी कारोबार में कथित एकाधिकार और मनमाने दाम
स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों का आरोप है कि क्षेत्र में बजरी कारोबार पर क्षेत्र के सबसे बड़े जनप्रतिनिधि का राजनीतिक कथित दबदबा बना हुआ है। आरोप है कि राजनीतिक रसूख के बल पर अन्य कारोबारियों को आगे नहीं बढ़ने दिया जाता और बजरी सप्लाई पर एकाधिकार जैसी स्थिति बना दी गई है, जिससे मनमाने रेट वसूले जा रहे हैं। इससे मकान निर्माण कराने वाले आम परिवारों की आर्थिक स्थिति चरमरा गई है।
एपीओ और ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर गंभीर सवाल
क्षेत्र में बड़ी संख्या में कर्मचारियों के अचानक एपीओ होने और फिर मनपसंद स्थानों पर ट्रांसफर किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि एलडीसी से लेकर पटवारी और पुलिस कांस्टेबल तक के कर्मचारियों से मनचाही पोस्टिंग के एवज में कथित तौर पर पैसों की मांग की जा रही है। अगर ये आरोप सही हैं तो सवाल यह है कि सरकारी कर्मचारियों की तैनाती नियमों व प्रशासनिक आवश्यकताओं से होगी या राजनीतिक पहुंच से?
🛑 मांडलगढ़ की जनता पूछ रही—क्या यही राजनीति है?
- बजरी के रेट और सप्लाई पर किसका कथित नियंत्रण है?
- कर्मचारियों के एपीओ और ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल किसके इशारे पर चल रहा है?
- मांडलगढ़ को भाषण नहीं—जवाब चाहिए।
- दबदबा नहीं—पारदर्शिता चाहिए।
- राजनीतिक संरक्षण नहीं—समान कानून चाहिए।
राजनीति सेवा का माध्यम, निष्पक्ष जांच की दरकार
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि राजनीति जनता की सेवा और विकास का जरिया है, किसी सरकारी व्यवस्था या कारोबार पर कथित दबदबा कायम करने का नहीं। अब आवश्यकता केवल आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि इन सभी बिंदुओं पर उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराकर पूरी जवाबदेही तय करने की है।