Homeअजमेरअजमेर शरीफ दरगाह में बसंत की रस्म, शामिल हुए सैकड़ों श्रद्धालु, दिखी...

अजमेर शरीफ दरगाह में बसंत की रस्म, शामिल हुए सैकड़ों श्रद्धालु, दिखी सांस्कृतिक एकता

(हरिप्रसाद शर्मा)

अजमेर /स्मार्ट हलचल|अजमेर शरीफ़ स्थित ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह में परंपरागत बसंत की रस्म श्रद्धा, आस्था और आपसी सौहार्द के माहौल में अदा की गई। यह आयोजन हजरत सज्जादानशीन साहब के जानशीन हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब की सदारत में सम्पन्न हुआ, जिसमें गंगा-जमुनी तहज़ीब की झलक साफ़ तौर पर देखने को मिली।बसंत की रस्म के दौरान दरगाह के निज़ाम गेट से मौरूसी क़व्वालों ने हाथों में बसंत का गड़बा लेकर बसंती कलाम पढ़ते हुए आस्तान-ए-शरीफ़ की ओर जुलूस के रूप में प्रस्थान किया। पूरे रास्ते सूफियाना कलाम और बसंत की रौनक से माहौल सराबोर रहा। आस्तान-ए-शरीफ पहुंचने पर हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब ने ख्वाजा गरीब नवाज के मजार पर बसंत पेश की।

इस अवसर पर अपने संबोधन में हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब ने कहा कि अजमेर शरीफ दरगाह में अदा की जाने वाली बसंत की रस्म भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यहां विभिन्न धर्मों और मजहबों के लोग प्रेम, भाईचारे और आपसी सम्मान के साथ एक-दूसरे की परंपराओं को निभाते हैं। भारत की संस्कृति और परंपराएँ सदियों से समाज को जोड़ने का कार्य करती आ रही हैं और सामाजिक सौहार्द को मज़बूती प्रदान करती हैं।

उन्होंने कहा कि सूफी संतों और बुज़ुर्गों ने मोहब्बत, अमन और इंसानियत का जो पैग़ाम दिया, वही संदेश आज भी दरगाहों के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। बसंत जैसे आयोजन उन ताक़तों को स्पष्ट संदेश देते हैं, जो धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाने की कोशिश करते हैं।
हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने कहा कि हिंदुस्तान एक अनमोल माला की तरह है, जिसमें विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के मोती पिरोए गए हैं और यही विविधता देश को विश्व पटल पर एक अलग पहचान दिलाती है। अंत में उन्होंने कहा कि पिछले लगभग 800 वर्षों से अजमेर शरीफ दरगाह मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैगाम देती आ रही है और आगे भी यह दरगाह इसी संदेश के साथ समाज को जोड़ने का कार्य करती रहेगी।

wp-17693929885043633154854019175650
RELATED ARTICLES