मुकेश्या नंद महाराज……………..
एक बेबाक राजनीतिक व्यंग्य # 12— आकाश शर्मा
स्मार्ट हलचल|चित्तौड़गढ़ नगर निकाय चुनाव के नतीजे कई मायनों में चौंकाने वाले रहे। भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत का आंकड़ा पार कर 33 सीटों पर जरूर कब्जा जमा लिया, लेकिन इस जीत की चमक पार्टी के दो दिग्गजों की हार ने फीकी कर दी। वहीं, कांग्रेस भी एक मजबूत विपक्ष की भूमिका में खड़ी नजर आ रही है, हालांकि उसके कई धुरंधर इस रण में धराशायी हो गए।
पूर्व उपसभापति कैलाश पंवार खुद तो हारे ही, अपने पूरे वार्ड के साथ-साथ उनके चार प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। इसके बावजूद, कांग्रेस ने जिस दूरदर्शी रणनीति के तहत टिकट बांटे, उसने पार्टी के घटते जनाधार को थामते हुए 2014 के मुकाबले खुद को एक मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है। अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सदन में एक धारदार नेता प्रतिपक्ष चुनने की है। इस रेस में मुख्य रूप से दो नाम उभर कर आ रहे हैं नगेंद्र सिंह राठौड़ और धर्मेंद्र मूंदड़ा । खास बात यह है कि ये दोनों ही पहली बार चुनावी मैदान में उतरे थे। इनमें से एक के चुनाव प्रचार में तो सुरेंद्र सिंह जाड़ावत ने मंच से यहां तक ऐलान कर दिया था कि “तुम चुनाव जिताओ, कुर्सी पर नगेंद्र ही बैठेगा !” हालांकि, अब समीकरण बदल चुके हैं और सभापति की कुर्सी की बजाय इन्हें विपक्ष की भूमिका संभालनी होगी।
भाजपा के दिग्गजों का चित्त होना, हार या सुनियोजित षड्यंत्र ?
शहर में 1994 से लगातार छह बार जीत का रिकॉर्ड बनाने वाले और गत बोर्ड में उपसभापति रहे कैलाश पंवार अपने ही गढ़ (वार्ड 6) में हार गए। यही नहीं, वे वार्ड 7 से अपनी पत्नी सावित्री और वार्ड 58 से अपनी करीबी उमा कंवर को भी नहीं जिता पाए। उधर, सबसे हॉट और चर्चित सीट मानी जाने वाली वार्ड 17 से भाजपा के कद्दावर नेता सुरेश झंवर का महज 26 वोटों से चुनाव हार जाना और वार्ड 12 से दो बार के पार्षद रहे हरीश ईनाणी की शिकस्त ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमने एक बार फिर ‘बाबाजी’ मुकेश्या नंद महाराज का रुख किया। बाबाजी अपनी चिर-परिचित रहस्यमयी मुस्कान के साथ बोले, “वत्स, मैं जानता हूं तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है। सभापति की कुर्सी और उसके पीछे का खेल बहुत बड़ा है! पार्टी द्वारा किसी को पद से नवाजना, तो कभी व्यक्ति विशेष द्वारा पद का त्याग कर खुद चुनाव में उतरना… सब सोची-समझी बिसात का हिस्सा है।”
बाबाजी ने आगे खुलासा करते हुए कहा, “इधर, दो बार के पार्षद हरीश ईनाणी को टिकट देना मजबूरी था, दिया भी लेकिन उनके अपने वार्ड 15 से नहीं, बल्कि वार्ड 12 से ! बस, यहीं से पूरी कहानी की शुरुआत होती है। अगर हरीश को वार्ड 15 से टिकट मिलता, तो उनकी जीत पक्की थी, जहां उनके खुद के परिवार के ही करीब 150 वोट हैं। लेकिन ‘भानजी’ ने उन्हें वार्ड 12 में भेजकर उलझा दिया। ठीक ऐसा ही सुरेश झंवर के साथ हुआ,पूरी प्लानिंग के तहत उन्हें उनके ही वार्ड में फंसा दिया गया। वत्स ! राजनीति में कौन सा प्यादा कब चलना है, यही तो असली खेल है, और ‘भानजी’ ने अपने मोहरे बिल्कुल सटीक जगह पर उतारे हैं।”
‘पान का बीड़ा, काला चश्मा’ और पर्दे के पीछे के खिलाड़ी
जब हमने बाबाजी से उस रहस्यमयी इशारे यानी “पान का बीड़ा, काला चश्मा और…” के बारे में विस्तार से बताने का आग्रह किया, तो उनके तेवर और तल्ख हो गए।
बाबाजी बोले, “बेटा वत्स! कल एक चश्मा खोला था, आज एक और पर्दा उठा देता हूं। जिन्हें भी पान खाने और काला चश्मा पहनने का शौक है, और जो भाजपा के कद्दावर नेता हैं वे चुनाव हार गए या फिर ‘हराए’ गए ? हार, आखिरकार हार होती है। पार्टी भले इसकी समीक्षा करे, लेकिन ये सब खेल कराने वाला सूत्रधार भी वही है जो पान का बीड़ा चबाता है और काला चश्मा लगाता है ? ” वत्स जों खेंल कुर्सी के लिए रचा गया अब यही खेल पार्टी के लिए गलें की हडडी बन जायेंगा आनें वालें दिनों में पार्टी में घमासान होना तय है ? पूर्व उपसभापति कैलाश पंवार खुद तो हारे ही, अपने पूरे वार्ड के साथ-साथ उनके चार प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए, बाबाजी …ऐसा कैसे हो सकता है.. बेटा वत्स… चुनाव जीतनें वालों को तों पैसा दिया ही जाता है लेकिन यहां चुनाव हारनें के लिए भी बडी मात्रा में धनबल का उपयोग किया गया है । जग जानता है आज पंवार की गेद किसके पालें में है ?
बाबाजी ने एक और सनसनीखेज पर्दाफाश करते हुए कहा, “वत्स, एक और जानकारी ले लो पान का बीड़ा और काला चश्मा पहनने वाले महाशय ने हाल ही में सरकारी धन के कुबेरों से 9 करोड़ रुपये झटके हैं ! जनता का पैसा, चुनाव पर खर्च, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद इस पैसे की वसूली जनता से ही की जाएगी क्योंकि सरकारी धन कुबेरों नें तो पैसा कुछ समय के लिए ही दिया है ।”
और अंत में बाबाजी मुस्कुराते हुए बोले, “वत्स, एक बात और ! राजनीति का भूत कुछ ऐसा सिर चढ़कर बोला कि एक ने अपने घर-बार और जमीनें तक गिरवी रख दीं, तब जाकर चुनाव जीता जा सका है…”
अब देखना यह है कि इस मची उथल-पुथल के बीच सत्ता के गलियारों में सभापति और विपक्ष के मोर्चे पर कौन सा नया समीकरण आकार लेता है !